मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

पितृ सत्ता



पितृसत्ता

विनय गुप्ता किदवई नगर के अपने छोटे से घर की बालकनी में बैठे हुए थे। रोज सुबह यहाँ बैठकर चाय पीते हुए समाचार-पत्र पढ़ना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा था, पर न जाने क्यों आज की सुबह एकदम अलग थी। चाय तिपाई पर रखी ठंडी हो चुकी थी। कुर्सी पर बैठे हुए उनके हाथों में समाचार-पत्र ज्यों का त्यों रखा था। सामने हनुमान मंदिर की तरफ से आने वाली सड़क पर चलते हुए वाहन और लोग रोज की तरह आ-जा रहे थे। सूर्य की रोशनी काफी फैल चुकी थी, लेकिन फिर भी सुबह कुछ अलसाई-सी थी। उनकी आँखें जैसे अनंत में टँकी हुई थीं। निष्क्रिय-से वे न जाने कब से इसी एक मुद्रा में बैठे थे, जिसका उन्हें शायद अहसास भी नहीं था।

जब उनकी तंद्रा टूटी तो उन्हें लगा कि कानपुर का मौसम अचानक बदल गया है। बरसात हो चुकी है, चारों तरफ पानी ही पानी है। सड़कें भीगी हैं, पेड़-पौधे भीगे हैं और आसपास पानी ही पानी दिखाई दे रहा है। सब कुछ पानी से तरबतर है। कुछ भी साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था।

उन्हें आश्चर्य हुआ कि कानपुर के मौसम में इतना परिवर्तन अचानक तो नहीं होता। नाक पर नीचे खिसक गए अपने चश्मे को ऊपर खिसकाते हुए उन्होंने ठीक से देखने की कोशिश की, लेकिन फिर भी कुछ साफ दिखाई नहीं दिया। उन्होंने साफ करने के लिए चश्मा उतारा तो दिखाई पड़ा कि बाहर तो सब कुछ ठीक है, पानी उनके चश्मे में है।

शायद उनके अंतर्मन में उमड़ते-घुमड़ते हुए बादल आँखों के रास्ते बरसकर चश्मे को पूरी तरह तरबतर कर चुके थे। इसीलिए उन्हें सब कुछ भीगा-भीगा-सा और अस्त-व्यस्त दिख रहा था। उन्होंने चश्मा भी पोंछा और आँखें भी, और जल्दी से दाएँ-बाएँ देखा कि किसी ने उनकी भीगी आँखें तो नहीं देखीं। फिर उन्हें याद आया कि घर में तो उनके अलावा कोई है ही नहीं। वे तो अकेले हैं।

यही पितृसत्ता है, जो पुरुष को रोने नहीं देती और भूले-भटके आँसू भी आ जाएँ तो छिपाना पड़ता है कि कोई देख न पाए। पुरुष चाहे पुत्र हो, पति हो या पिता हो, उसे बचपन से ही इस मानसिकता का बोध कराया जाता है और मजबूत होने का आभास देते रहने का अभ्यास कराया जाता है।

जैसे-जैसे जीवन एक पुत्र, पति और पिता की ओर अग्रसर होता है, पितृसत्ता का क्रमिक विकास होता रहता है। दुखद से दुखद, विषम से विषम परिस्थितियों में भी न रोना और न आँसू बहाना उसके मजबूत दिखने का आधार बन जाता है। पुरुष अंदर से मजबूत भले ही न हो, लेकिन मजबूत दिखना उसकी मजबूरी है और शायद जिम्मेदारी भी, क्योंकि अगर पिता ही रोएगा तो और लोग क्या करेंगे? उनको ढाँढस कौन बँधाएगा? यही कारण है कि सामान्यतः किसी ने किसी पुरुष को रोते-बिलखते हुए नहीं देखा होगा।

पितृसत्ता की यही मजबूती और स्वभाव की इतनी दृढ़ता, भले ही दिखावटी हो, मातृसत्ता को भरपूर संबल देती है और इसीलिए माँ अपनी करुणा में निर्बाध रूप से बह सकती है या स्वयं ममता के सागर में स्वच्छंद हिलोरे ले सकती है। लेकिन जब कभी करुणा के इन तारों को कोई उसके अपने अस्वाभाविक रूप से झंकृत कर देता है तो माँ के आँसू निकल आते हैं। माँ रोती भी है, बिलखती भी है और फिर आँचल से स्वयं ही आँसू पोंछ लेती है और जैसे यह सब कुछ स्वाभाविक रूप से खुद सामान्य करने का प्रयास होता है।

लेकिन पिता तो पिता है, रो नहीं सकता, आँसू नहीं बहा सकता। कभी-कभी बाँध में अनायास अत्यधिक पानी आ जाता है और बाँध के ऊपर से निकलने लगता है तो यह बहुत ही असामान्य होता है। बाँध की ऊँचाई बढ़ाते जाना ही विकल्प होता है, जो उचित भले ही न हो, लेकिन मजबूरी है। बाँध चाहे कितने ही वैज्ञानिक तरीके से बने हों, ऊँचाई कितनी भी अधिक क्यों न हो, नमी तो फिर भी आ ही जाती है। सेफ्टी वाल्व से कभी-कभी बूँदें तो टपकती ही हैं। यदि पानी बाँध तोड़कर निकलने लगे तो परिस्थितियाँ बहुत विषम और असाधारण ही होती हैं।

विनय सोचने लगे कि अतीत में वे कब ऐसे आँसुओं के सैलाब में डूबे थे? शायद... कोई 15 साल पहले की बात होगी, जब वे अपने बड़े बेटे को इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दिलाने दिल्ली ले गए थे। बेटे को परीक्षा केंद्र छोड़ आने के बाद पहाड़गंज के एक छोटे से होटल के एक छोटे से कमरे में खुद को बंद कर बहुत आँसू बहाए थे।

यह वह समय था, जब कुछ समय पहले ही उन्हें लिवर कैंसर होने का पता चला था। काफी देर हो चुकी थी और अब उनके पास समय बहुत कम बचा था। उन्हें तो सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भगवान उनके साथ ऐसा भी कर सकता है और इसी विश्वास के साथ एक से दूसरे और तीसरे डॉक्टर को दिखाते रहे कि शायद कोई कह दे कि उन्हें कुछ भी नहीं है। लेकिन सबकी राय एक जैसी थी कि वे तेजी से बढ़ने वाले लिवर कैंसर से पीड़ित हैं और जितनी जल्दी हो सके, उन्हें ऑपरेशन करवा लेना चाहिए।

वे इसके लिए मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्हें मालूम था कि यदि ऑपरेशन करवाया गया तो उसके बाद कैंसर के इलाज की एक लंबी प्रक्रिया है। जितने भी आर्थिक संसाधन उनके पास हैं, सब उनके आसपास ही सिमट जाएँगे। फिर उनके बच्चों का क्या होगा? उनकी पत्नी का क्या होगा? वे आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध नहीं हैं।

उनकी बेचैनी का कारण था उनके अपने घर का इतिहास, जो एक बार फिर दोहराने के कगार पर खड़ा था। बचपन में ही उनके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी। कितनी मुश्किल और तंगहाली से उनकी माँ ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया। दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा और चौका-बर्तन का काम किया। खुद उन्होंने भी छोटे-मोटे काम किए और स्नातक के बाद नौकरी शुरू कर दी। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का समय भी नहीं मिला। किसी इंजीनियरिंग या मेडिकल कोर्स के बारे में सोचना भी मुश्किल था।

शायद उनकी माँ ने जो तपस्या की थी, उसी का यह सुखद परिणाम था कि उन्हें नौकरी मिल गई थी। वे सोचते थे कि अब सब अच्छा ही होगा और शायद सदा-सर्वदा के लिए उनका परिवार गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएगा। फिर पता नहीं भगवान क्यों इतना निष्ठुर है? बार-बार उनकी परीक्षा क्यों हो रही है?

इस समय उनका बेटा 12वीं में पढ़ रहा था और बेटी नौवीं कक्षा में। वे यह सोचकर परेशान हो रहे थे कि इस समय यदि उन्हें कुछ हो जाता है तो उनका पूरा आशियाना बिखर जाएगा। उनका अपना मकान नहीं और नौकरी में पेंशन नहीं, आमदनी का और कोई साधन नहीं। ऐसी स्थिति में बेटे की पढ़ाई तो छूटेगी ही। घर चलाने के लिए उसे छोटे-मोटे काम करने पड़ेंगे। बेटी भी पता नहीं क्या करेगी? उसे भी कुछ-न-कुछ करना पड़ेगा और पत्नी को भी हो सकता है कुछ छोटा-मोटा काम करना पड़े। यह सोचकर ही उनका कलेजा मुँह को आ रहा था।

जिन परिस्थितियों से निकलने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया है, एक बार फिर वही परिस्थितियाँ, समय का वही चक्र, फिर उनके दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।

वे ईश्वर से चाहते थे कि उन्हें कम-से-कम पाँच वर्ष का समय दे दे तो शायद उनका परिवार बर्बादी से बच जाए। पाँच साल का समय इसलिए कि बेटा इंजीनियरिंग पूरी करके किसी नौकरी में आ जाएगा और अगर उसने माँ और बहन को सहायता दी तो बेटी भी पढ़-लिख जाएगी और कोई नौकरी कर सकेगी। तब शायद घर-परिवार चलाने में बहुत मुश्किल नहीं आएगी।

पूरे जीवन में उन्होंने कभी किसी का अहित नहीं किया। भरपूर मेहनत की और भगवान पर पूरी आस्था रखी। सिर्फ इसलिए कि अच्छे व्यक्ति को अच्छे कार्य करने चाहिए, वैसा ही करने की कोशिश करते रहे। वे हारना नहीं चाहते थे, इसलिए आखिरी दम तक कोशिश करना चाहते थे।

वे लगातार एक के बाद एक डॉक्टर को दिखाते रहे, लेकिन लखनऊ में संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में एक डॉक्टर ने उनकी फाइल में एक ही मर्ज के लिए अनेक डॉक्टरों की रिपोर्ट और एक ही निष्कर्ष देखकर कहा, “क्या तुम किसी ऐसे डॉक्टर को खोज रहे हो, जो यह कह दे कि तुम्हें कुछ नहीं हुआ है और तुम्हें कुछ नहीं होगा? तो वह मैं नहीं हूँ। तुम्हें कैंसर है और अच्छा तो यह होगा कि तुम तुरंत ऑपरेशन करा लो। लेकिन चूँकि तुम मामले को टाल रहे हो, यहाँ के बाद फिर कहीं किसी डॉक्टर के पास जाओगे तो मैं इस पर पूर्ण विराम लगा देता हूँ।

“तुम अभी ऑपरेशन नहीं कराना चाहते हो तो मत कराओ। हफ्ते में एक बार अल्ट्रासाउंड करवाना होगा और वह एक ही पैथोलॉजी सेंटर में। लिवर में कैंसर की गाँठ का माप लेना होगा, ताकि यह पता लग सके कि कैंसर की वृद्धि कितनी तेज है। अगर वृद्धि बहुत तेजी से हो रही है तो ऑपरेशन का निर्णय लेंगे, अन्यथा जब तक टाला जा सकता है, टालते रहेंगे।

“ऑपरेशन के बाद भी ठीक होने की कोई गारंटी तो होती नहीं, इसलिए थोड़ा रिस्क लेकर इंतजार करना बुरा नहीं। जो दवाएँ लिखी हैं, लेते रहो। खान-पान का ध्यान रखो। कभी-कभी चमत्कार भी होते हैं, उनका इंतजार करो।”

यह सुनकर उन्हें बहुत शांति मिली, जैसे कि वे यही चाहते थे और फिर वैसा ही किया। हर हफ्ते एक पैथोलॉजी सेंटर में अल्ट्रासाउंड कराने का क्रम शुरू हो गया। घर में तो किसी को मालूम भी नहीं था कि उन्हें कैंसर की बीमारी है। जैसे-जैसे समय गुजर रहा था, कैंसर की वृद्धि हो रही थी, लेकिन जो सीमा उन्हें दी गई थी, उसमें अभी समय था। उनकी इच्छा अंतिम क्षण तक प्रतीक्षा करने की थी।

इसी समय स्वामी रामदेव का योग प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ। उन्होंने भी प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया और जैसा कि स्वामी दावा करते थे कि योग से कैंसर भी ठीक हो जाता है, इस आशा से अनुलोम-विलोम और कपालभाति से लेकर योग की जितनी भी क्रियाएँ वे कर सकते थे या करना उनके लिए संभव था, करना शुरू कर दिया।

उन्हें मालूम था कि उनके पास समय बहुत कम है। इसलिए बच्चों की पढ़ाई, घर में पैसे की बचत और सारे कार्य समय पर पूरे करने का बहुत ही कठोर परियोजना-प्रबंधन शुरू कर दिया, ताकि सब कुछ जितना भी संभव हो, समय से हो।

बच्चों की पढ़ाई में छोटी-मोटी त्रुटियों को भी वे बहुत गंभीरता से लेते थे और कई बार न चाहते हुए डाँटते भी थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि थोड़ी-सी असावधानी उनके पूरे प्रोजेक्ट का सत्यानाश कर देगी।

कुछ महीनों बाद पैथोलॉजी के डॉक्टर ने हर सप्ताह के बजाय महीने में एक बार अल्ट्रासाउंड करवाना शुरू किया और एक साल बाद यह क्रम मासिक के स्थान पर त्रैमासिक हो गया। अल्ट्रासाउंड करने वाला डॉक्टर भी उन्हें बहुत दिलासा देता था कि अभी समय है, चिंता की बात नहीं है।

ऐसा लगता था कि जैसे ईश्वर उन्हें कुछ समय दे रहा है और फिर समय मिलता गया। इस बीच बड़े बेटे की इंजीनियरिंग पूरी हो गई। उसे अच्छा काम भी मिल गया। शादी भी हो गई और बेटी की भी पढ़ाई पूरी होकर उसे भी नौकरी मिल गई और शादी भी हो गई। तो उन्हें लगा, शायद अब उनका प्रोजेक्ट पूरा हो गया है।

उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और प्रार्थना की कि ईश्वर चाहे तो अब अपना काम कर सकता है। उन्होंने जो समय माँगा था, वह पूरा हो गया है और सारे काम भी पूरे हो गए हैं।

अब तो उनकी जिंदगी जैसे बोनस की जिंदगी थी। सब कुछ हो चुका था और एक और जो इच्छा माँ-बाप की होती है, वह भी पूरी होने वाली थी। वे दादा बनने वाले थे।

एक सप्ताह पहले ही वे और उनकी पत्नी बेंगलुरु में बेटे के पास गए हुए थे, क्योंकि बहू की डिलीवरी होने वाली थी। इस समय पितृपक्ष चल रहा था। सामान्यतः इस समय वे किसी यात्रा से बचते थे, क्योंकि इस समय वे अनिवार्य रूप से रोज सुबह अपने पूर्वजों का तर्पण करते थे।

पिता को तो उन्होंने देखा जरूर था, लेकिन ठीक से याद नहीं। लेकिन माँ जरूर उनके लिए आराध्य थीं और पूर्वजों के लिए तर्पण शायद माँ को धन्यवाद ज्ञापित करने का एक तरीका था।

इस पितृपक्ष में एक बहुत असामान्य घटना हुई। एक दिन सपने में उन्हें माँ दिखाई दीं और बताया कि वह उनके घर आ रही हैं। इशारा था कि घर में पोती के रूप में आ रही थीं।

एक सप्ताह पहले ही पति-पत्नी बेंगलुरु पहुँच गए थे और उस शुभ घड़ी का बड़ी उत्सुकता से इंतजार करने लगे। विनय के लिए खास उत्सुकता की वजह थी कि उनकी बोनस की जिंदगी में और कितनी खुशियाँ मिलती चली जा रही हैं।

आखिर वह घड़ी आ गई, जब बहू को अस्पताल में भर्ती कराया गया। बेटा, बहू और उसकी एक दोस्त उसके साथ थी। चूँकि सारे लोग अस्पताल में नहीं रुक सकते थे, इसलिए वे पति-पत्नी, बेटे के कहने के अनुसार घर पर ही रहे।

रात भर वे लोग जागते रहे और बेटे के फोन की प्रतीक्षा करते रहे। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि किसी खुशी का इंतजार करना कितना उत्सुकतापूर्ण होता है, जिसमें धैर्य रख पाना भी बहुत मुश्किल होता है। इसलिए उन्होंने बीच-बीच में एक-दो बार बेटे को फोन कर पूछा भी।

जब सुबह होने को आई, फिर भी उसका फोन नहीं आया तो एक बार फिर उन्होंने फोन किया। बेटे ने झुंझलाते हुए कहा, “बार-बार फोन करके मुझे परेशान मत करो। मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ। जब कुछ होगा तो आपको सूचना मिल जाएगी।”

अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन दिल को तसल्ली दी कि शायद ठीक ही कह रहा था। पूरी रात अस्पताल में जाग रहा था। पता नहीं क्या-क्या परेशानी हुई होगी। कहीं ऑपरेशन वगैरह का चक्कर तो नहीं। आजकल डॉक्टर बिना जरूरत के कुछ भी कर सकते हैं।

इसी तरह सोचते-सोचते सुबह हो गई। स्नान-ध्यान के बाद अपने पूर्वजों के तर्पण की प्रक्रिया शुरू की। अब तक कोई समाचार नहीं मिला था। चिंता हो रही थी, लेकिन दोबारा बेटे को फोन करने की हिम्मत नहीं हो सकी।

आज उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि बाप अपने बच्चों से भी कितना डरता है—उन बच्चों से, जिन्हें अपने हाथों बड़ा किया, कभी हाथों में लेकर झूले झुलाए, गोद में लेकर बगीचे में लगे गुलाब के फूल की खुशबू का अहसास कराया, जिनके हाथ पकड़कर चलना सिखाया और कंधे पर बैठाकर घुमाया, सोने से पहले हर दिन कहानी सुनाई, जिनको जुकाम-बुखार होने पर पूरी-पूरी रात जागकर बिताई।

उन्हें इस तरह के जवाब की अपेक्षा सपने में भी नहीं थी।

तभी अचानक मोबाइल की घंटी बजी और लपककर उन्होंने फोन उठाया। जिस बहुत बड़ी खुशखबरी की प्रतीक्षा थी, अब वह समय आ गया था। सोचा, बेटे का फोन होगा, लेकिन यह क्या! यह तो कोई विदेशी, अनजान नंबर था।

बात हुई तो पता चला, समधी जी लाइन पर थे। दुबई से उन्हें बधाई देने के लिए फोन किया था कि घर में पोती आ गई है।

काश, यह बात उन्हें बेटे ने बताई होती तो कितना अच्छा लगता! सात समुंदर पार दूरदराज बैठे हुए व्यक्ति को यह खबर मिल चुकी है और वे एक सप्ताह से यहाँ हैं, सिर्फ और सिर्फ इसी सूचना के लिए, और उन्हें अपनी पोती के आने की सूचना किसी अन्य से मिल रही है।

उन्होंने संतोष किया कि हो सकता है बेटा पूरी रात जागता रहा होगा, परेशान होगा। पता नहीं कितनी मुश्किलों का सामना किया होगा। इस तरह की तमाम संभावित बातों से उन्होंने अपने आप को संतोष दिया।

जल्दी से तैयार होकर दोनों पति-पत्नी अस्पताल के लिए निकल पड़े।

अस्पताल पहुँचकर भी उनकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई, क्योंकि अस्पताल में विजिटिंग आवर्स होते हैं। तभी मरीज से मिला जा सकता है। वे इंतजार करने लगे और यह समय भी कैसे कटा, उन्हें नहीं मालूम।

इतनी उत्सुकता अपनी पोती के रूप में माँ को देखने के लिए हो रही थी, इतनी तो अपने बच्चों के लिए भी नहीं हुई थी। आज जो बेचैनी अपनी बेटी समान बहू को देखने के लिए थी, उसे धन्यवाद देने के लिए भी थी, जिसने उनके परिवार को आगे बढ़ाया।

अंदर जाने का समय भी आ गया और वे पूछते हुए उस प्राइवेट रूम में पहुँचे, जहाँ उनकी बहू थी। उन्होंने धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी और उनका बेटा बाहर आ गया। उसने उन्हें अंदर ले जाने के बजाय बाहर आकर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

विनय एकटक देख रहे थे और कुछ समझ नहीं पा रहे थे। इस समय का एक-एक पल उनके लिए बहुत भारी हो रहा था। वे जल्दी से जल्दी अंदर जाना चाहते थे और अपनी पोती को देखना चाहते थे, उससे मिलना चाहते थे।

लेकिन बेटा दरवाजा बंद करके ऐसे खड़ा था, जैसे अभी भी अंदर जाने के लिए कुछ औपचारिकताएँ बाकी हों।

उन्होंने पूछा, “क्या हुआ?”

बेटे ने जवाब दिया, “बहू अभी सो रही है। अंदर जाने से डिस्टर्बेंस होगा और अभी कुछ और लोग भी आ रहे हैं। मेरे दोस्त वगैरह सब लोग एक साथ मिल लेंगे तो अच्छा रहेगा। समय बचेगा और बार-बार बच्ची और उसकी माँ को परेशानी नहीं होगी।”

ये शब्द उनके कानों में पिघले शीशे की तरह अंदर चले गए। ऐसा लगा कि वे बिल्कुल संज्ञाशून्य हो गए हैं। ऐसा नहीं लग रहा था कि यह बात उनके अपने बेटे ने कही है। शायद इस तरह का रूखापन तो किसी अपरिचित के पास जाकर देखने को भी नहीं मिलता।

यही है पितृसत्ता, जहाँ कोई भी पिता, कोई भी पुरुष या कोई भी माँ-बाप चाहे विश्व-विजय कर ले, लेकिन अपनी औलाद से कभी नहीं जीत सकते। वे हमेशा हारते हैं और उन्हें हारना ही पड़ता है। हर बार स्वयं जानबूझकर हारना भी पितृसत्ता की जिम्मेदारी है और मजबूरी भी।

जितनी असहनीय घुटन और पीड़ा उन्होंने इस समय महसूस की, वह कल्पना से परे है।

वे सोचने लगे... कि क्या इस सब के लिए भगवान से समय माँगा था? परिवार बचाने के लिए? किसका परिवार? और क्या पाने के लिए? किसके लिए?

तरह-तरह की बातें उनके दिमाग में आने लगीं। ऐसा लगा कि उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा है और वे चक्कर खाकर गिरने वाले हैं। दीवार का सहारा लेते हुए वे पास ही रखी बेंच पर बैठ गए।

ये सब क्या हो रहा है? इतना सब कुछ बदल चुका है और उन्हें इसका आभास तक नहीं है।

शायद ये नए युग के नए रिश्ते हैं, जो आज बन रहे हैं माँ-बाप और बच्चों के बीच, जिनमें न अपनेपन की गर्माहट है, न संवेदनाएँ हैं, न संस्कार और न ही समझ।

रिश्तों का शायद अब कोई महत्व नहीं है। ऐसा लगता है किसी कॉरपोरेट जगत की एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था है, जिसमें कोई वरिष्ठ है तो कोई कनिष्ठ। बस।

वरिष्ठ सिर्फ इसलिए वरिष्ठ है, क्योंकि उसने परिवार रूपी संस्था में पहले प्रवेश किया है और उसका सेवा-काल लंबा है। कनिष्ठ इसलिए कि वह इस परिवार में बाद में आया है। इसके अलावा और कोई अंतर नहीं। आज का कनिष्ठ कल वरिष्ठ हो जाएगा और वरिष्ठ इस दुनिया से रिटायर हो जाएगा। यह समय का चक्र है, चलता रहेगा। न जाने कब तक।

वे भावनाओं के इस ज्वार-भाटे में डूबते-उतराते रहे और न जाने कब शिथिल होकर अपने आपको लहरों के हवाले कर दिया।

कुछ और लोग मिलने आए और वे भी कमरे के दरवाजे पर पहुँचे, जिनका बेटे ने तपाक से स्वागत किया और अंदर ले गया। शायद उसके कंपनी के अधिकारी या दोस्त होंगे।

बेंच पर बैठे हुए उनकी खुशी और उमंग उस मुकाम पर पहुँच गई थी, जैसे समुद्र की ऊँची उठती लहरें किनारे से टकराकर बहुत ही धीमी गति से वापस हो जाती हैं।

लेकिन अब तो बहुत समय हो गया था। बेटे से मिलने वाले लोग बाहर निकल रहे थे। बेटा उन्हें छोड़ने निकला।

उनकी स्थिति मुंशी प्रेमचंद की ‘बूढ़ी काकी’ की तरह हो रही थी। थोड़े इंतजार के बाद बड़ी बेशर्मी से बेटे के पीछे वे कमरे के अंदर चले गए—बिना उसके बुलाने का इंतजार किए और बिना यह सोचे कि उनका बेटा क्या कहेगा।

कमरे के अंदर पहुँचते ही झूले में लेटी बच्ची को देखकर जैसे उनके पुराने घाव बिल्कुल भर गए। बड़ी उत्सुकता से मुस्कुराते हुए वे अपनी पोती की तरफ बढ़े, उसे पास से देखने, छूने और यह एहसास करने के लिए कि आखिर वह उनकी पोती ही नहीं, उनकी माँ भी है।

इससे पहले कि वे अपनी पोती को हाथ भी लगा पाते, बेटे ने टोकते हुए कहा, “डॉक्टर ने इसे छूने से मना किया है, इंफेक्शन हो सकता है।”

उन्होंने हाथ पीछे खींच लिए और उसको सिर्फ दूर से देखा।

तभी किसी ने पीछे से कहा, “भैया, इनके भी दो बच्चे हैं।”

उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। उनकी बेटी कह रही थी।

जैसे ये उनके अपने ही दिल के शब्द थे।

पहले के समय में तो उनके घर-परिवार के सारे लोग आते थे। कभी किसी को इंफेक्शन नहीं हुआ। उन्होंने बहुत प्यार से पोती को देखा और मन ही मन अपनी माँ को प्रणाम करते हुए पीछे जाकर बेटी के पास खड़े हो गए, जैसे कि उनकी माँ ने उन्हें बता दिया हो कि बच्चे कितने कीमती होते हैं—उतने ही कीमती, जितनी माँ-बाप की हैसियत होती है।

क्या परिवार में जिस समय साधन कम होते हैं, प्यार और ममता ज्यादा होती है?

जैसे-जैसे साधन और संसाधन बढ़ते हैं, ममता और प्यार के बंधन ढीले हो जाते हैं?

अपनापन सूखने लगता है?

अपने परिवार के लिए किया गया संघर्ष कहीं खो जाता है?

ऐसी-ऐसी परियोजनाएँ, जिन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति दीवानगी की हद तक लगा रहता है, अपना सब कुछ दाँव पर लगा देता है। परियोजनाएँ सफल होने के बाद ऐसा पारितोषिक मिलता है—इसकी तो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

एक थके-हारे, पराजित योद्धा की तरह वे कमरे से बाहर आ गए। पत्नी से उन्होंने कहा कि कुछ बहुत जरूरी काम आ गया है, इसलिए उन्हें आज ही कानपुर वापस जाना पड़ेगा।

“रिटायरमेंट के बाद अब कौन-सा जरूरी काम बचा है?” पत्नी ने कहा।

“तुम चाहो तो रुक जाओ, मुझे तो जाना ही पड़ेगा।”

यह कहकर वे वापस चल दिए।

पत्नी तो रुक गई। पता नहीं, वह कुछ समझ भी पाई या नहीं, किंतु उसमें इतनी सहनशीलता तो है कि बड़े से बड़ा अपमान और उपेक्षा आँसुओं में बहा देगी।

लेकिन वे तो पिता हैं, पुरुष हैं, जिनके आँसू नहीं निकल सकते हैं, जो किसी को एहसास भी नहीं होने दे सकते कि उन्हें कितना दुख हुआ है।

वे कल रात ही बेंगलुरु से वापस आए थे। रात में कब आँख लगी थी, उन्हें पता नहीं। आज सुबह उठे और चाय लेकर हमेशा की तरह बालकनी में बैठ गए।

और... तभी घंटी बजी।

दरवाजा खोला तो सामने काम करने वाली बाई खड़ी थी।

आश्चर्य से उन्होंने पूछा, “अरे, तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं आ गया हूँ?”

“भाभी ने सुबह फोन किया था कि भैया रात में पहुँच गए होंगे, जरा देख लेना,” उसने बताया।

“भैया, पोती की बहुत-बहुत बधाई। भाभी कह रही थीं कि सब कुछ बहुत अच्छा हो गया है। बहू भी ठीक है और बच्ची भी ठीक है,” उसने कहा।

वह मुस्कुराकर रह गए। कुछ बोल नहीं पाए।

“भैया, मेरे यहाँ भी बहू को बेटा हुआ है,” उसने बताया।

“अरे, बहुत अच्छा! बेटा और बहू तो ठीक हैं?” उन्होंने पूछा।

“हैं भैया, बिल्कुल ठीक हैं।”

“नाती की नाक, आँखें बिल्कुल सुनील के पापा की तरह हैं। ऐसा लगता है कि वो हम लोगों के बीच फिर आ गए हैं। उन्हें आना ही था। हम सब पहले से ही जानते थे।”

यह बताते हुए उसके चेहरे पर चमक आ गई थी।

“भैया, आज उसकी छठी है,” उसने आगे बताया।

“बहुत अच्छा, खूब धूमधाम से करो छठी,” उन्होंने औपचारिकतावश कह दिया।

“भैया, अब क्या धूमधाम से करें?” कहते हुए उसके आँसू आ गए।

“सुनील के पापा ने सभी बच्चों की छठी, मुंडन, सब कुछ बहुत धूमधाम से किए थे, लेकिन तब की बात और थी। अब हम लोगों के पास है ही क्या?”

“लेकिन भैया, हमारा लड़का और बहू बहुत अच्छे हैं। बिना हमसे पूछे-बताए कुछ नहीं करते। बहुत ध्यान रखते हैं हमारा। सुनील तो अपने पिताजी को याद करके बहुत दुखी हो रहा था। कह रहा था कि पिताजी होते तो बात अलग थी। कह रहा था कि किसी तरह से ऐसे ही कर लो।

“अब उसे कौन समझाए, भैया? वह तो बहुत छोटा था, जब उसके पिताजी गुजर गए थे। किसी तरह से आप सब लोगों के घरों में काम करके बच्चे पाल-पोसकर बड़े किए और जितनी हमें समझ थी, जितना हम कर सकते थे, किया।

“अब दोनों काम करते हैं। सुनील ई-रिक्शा चलाता है और छोटा वाला दवाई की दुकान में काम करता है। अब जो भी है, भैया, किसी तरीके से घर व्यवस्थित हो गया है। सब अपना-अपना काम कर रहे हैं।”

उसने संतोष व्यक्त करते हुए जैसे एक साँस में अपने जीवन का सारांश बता दिया।

“पारिवारिक प्रेम और पारिवारिक खुशी के लिए जो भी किया जाता है, वह बहुत अच्छा ही होता है। ये खुशी का मौका है। परिवार के साथ इसे उत्सव की तरह मनाओ। हर किसी के नसीब में यह सुख नहीं होता।”

यह कहते हुए वे अंदर गए और एक पैकेट लाकर बाई के हाथ में पकड़ा दिया। यह वही कपड़े थे, जो वे अपने होने वाले पोते/पोती के लिए बेंगलुरु ले गए थे, किंतु अचानक चले आने के कारण दे नहीं पाए थे।

“इसमें तुम्हारे नाती के लिए कपड़े हैं और ये ₹10,000 रख लो। यह मौका खुशी का है, इसे हाथ से मत जाने दो,” उन्होंने कहा।

बाई की आँखों में आँसू आ गए। उसने आँचल से आँसू पोंछे और कहा, “भैया, छोटे मुँह, बड़ी बात है, लेकिन अगर एक उपकार आप हमारे परिवार पर कर दें तो हम लोगों को बहुत खुशी होगी।”

“क्या?” उन्होंने पूछा।

“अगर आप आकर हमारे नाती को आशीर्वाद दे दें तो हम लोग धन्य हो जाएँगे।”

बाई ने हाथ जोड़ लिए।

“हाँ, हाँ, क्यों नहीं,” उन्होंने तपाक से जवाब दिया, “मैं जरूर आऊँगा।”

“भगवान आप जैसे लोगों को भी बनाता है, तभी तो ये दुनिया चल रही है।”

बाई ने जब यह कहा तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि वे इसका क्या जवाब दें, लेकिन उन्होंने कहा, “अब तुम जाओ, तैयारियाँ करो। यहाँ का काम छोड़ दो। कल देखा जाएगा।”

धोती के आँचल से अपनी भर आई आँखें पोंछती बाई धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रही थी।

इसके साथ ही उनका मन भी थोड़ा हल्का होने लगा था।

वे सोच रहे थे कि रिश्तों की डोर से बँधे और उसे मजबूत करने के लिए हम सब अपने-अपने माँ-बाप और बुजुर्गों को अपने पोते-पोतियों के रूप में खोजते रहते हैं, ताकि उनसे अटूट संबंध बना रहे। तभी तो हम अपने बच्चों के चेहरों में अपने प्रियजनों की शक्ल ढूँढ़ते हैं। उन चेहरों में अपने माँ-बाप और प्रियजनों की आँख, नाक, कान और पता नहीं क्या-क्या खोज निकालते हैं, ताकि हमारी पीढ़ियों के बीच सामंजस्य बना रह सके।

आज उन्हें यह समझ में गया था कि पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की गर्मजोशी के लिए “क्वालिफिकेशन” और “पोजीशन” बाधक नहीं होती।

परियोजना-प्रबंधन से ये चीजें पाई तो जा सकती हैं, लेकिन पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की प्रगाढ़ता भी मिले, यह जरूरी नहीं।


शिव प्रकाश मिश्रा

मूल कृति — 25 दिसम्बर 2018




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