गौरैया का रहस्य
हरे-भरे खेतों से घिरे एक छोटे से गाँव में एक पुराना आम का पेड़ था। उसी पेड़ पर एक नन्ही, चंचल गौरैया रहती थी। उसका रंग भूरा था, पर उसकी आँखें सुबह की ओस की तरह चमकती थीं।
हर सुबह जब स्कूल की घंटी बजती, बच्चे पेड़ के नीचे थोड़ा दाना डालते और मिट्टी के बर्तन में पानी भरते थे। थोड़ी ही देर में कई पक्षी वहाँ आने लगते — लाल चोंच वाले तोते, चमकीली मैना, मोटे कबूतर और नन्ही सी गौरैया।
लेकिन गौरैया बाकी पक्षियों की तरह पहले दाने नहीं चुगती थी। वह शांति से एक ओर खड़ी रहती, जब सब खा लेते, तो वह कुछ दाने अपनी छोटी चोंच में भरकर उड़ जाती — हमेशा उसी दिशा में, पुराने कुएँ के पीछे वाले झाड़ियों की ओर।
एक दिन बच्चों ने सोचा, "ये गौरैया रोज़ ऐसा क्यों करती है?"
किसी ने कहा, "शायद अपने लिए दाने छिपाती होगी।"
दूसरे ने कहा, "नहीं, कुछ तो रहस्य है इसमें!"
अगले दिन सबने चुपचाप उसका पीछा किया। जब वह झाड़ियों के पीछे पहुँची, बच्चों ने झाँककर देखा — और उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
गौरैया कुछ छिपा नहीं रही थी! वह तो घायल पक्षियों को खाना खिला रही थी — एक टूटी पंख वाली कबूतर, कुछ छोटे-छोटे बुलबुल के बच्चे जो उड़ नहीं सकते थे, और एक डरी–सहमी गिलहरी, सब वहीं बैठे थे। गौरैया प्यार से सबको दाने खिला रही थी।
बच्चों का मन भर आया। इतनी छोटी चिड़िया, पर दिल कितना बड़ा!
अगले दिन से बच्चों ने भी मदद शुरू की। वे झाड़ियों के पास और दाने रखते, कुछ फल लाते और घायलों के लिए छोटी लकड़ी की झोपड़ी बना दी। धीरे-धीरे वह जगह पक्षियों और बच्चों की प्यारी जगह बन गई — हर सुबह वहाँ चहचहाहट और खुशियों की गूंज रहने लगी।
गाँव वाले भी यह बदलाव देखकर हैरान हुए। जब बच्चों ने उन्हें गौरैया का रहस्य बताया, तो सबने तय किया कि अब वे भी हर दिन पक्षियों और जानवरों के लिए थोड़ा भोजन और पानी रखेंगे।
धीरे-धीरे गाँव की हवा में करुणा और प्रेम घुल गया। सबके चेहरों पर मुस्कान थी — और यह सब एक छोटी-सी गौरैया की निःस्वार्थ दया से शुरू हुआ था।
उस रात, जब बच्चे सितारे देख रहे थे, उनकी शिक्षिका ने कहा —
“बच्चो, दया हमेशा शोर नहीं करती। कभी–कभी वह चुपचाप काम करती है — गौरैया के पंखों की तरह — लेकिन उसकी गूँज हमेशा सुनाई देती रहती है।”
नीति: दयालुता अक्सर मौन में काम करती है, पर उसकी गूंज हमेशा बनी रहती है।
