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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

ज्ञान का दीपक








 ज्ञान का दीपक 

पहाड़ों से घिरी एक शांत घाटी में कावी नाम का एक बालक रहता था। न घर, न परिवार — बस एक बेचैन मन और खोजती हुई निगाहें। वह गाँव-गाँव घूमकर छोटे-मोटे काम करता और पेट भर लेता, पर उसकी असली भूख रोटी की नहीं थी — वह जीवन का अर्थ जानना चाहता था।

वह अकसर सोचता —
“लोग उजाले का पीछा तो करते हैं, पर अपने भीतर के अंधेरे से क्यों डरते हैं?”

एक दिन थककर वह एक पुराने, जर्जर मंदिर के आँगन में बैठ गया। दीवारों पर गहरी दरारें थीं, बेलें लटक रही थीं, और धूल ने सब कुछ फीका कर दिया था। बैठने की जगह साफ़ करते समय उसका हाथ किसी धातु से टकराया। मिट्टी हटाई तो वहाँ एक पुराना पीतल का दीपक था — धूल, मकड़ी के जाल और समय से ढका हुआ।

कावी ने अपने फटे दुपट्टे से उसे धीरे-धीरे साफ़ किया। जैसे ही उसकी हथेलियाँ दीपक पर फिरीं, उसमें एक सुनहरी लौ प्रज्ज्वलित हो उठी। मंदिर का अंधकार सहसा पीछे हट गया। वह चकित था — इस लौ में एक अनकही शांति और गहरी शक्ति थी।

उस रात वह दीपक साथ लेकर चला। राह उजली थी, और उसे लगा मानो उसे अपना सच्चा साथी मिल गया हो। वह बोला —
“अब मैं कभी अंधेरे में नहीं रहूँगा।”

परन्तु घने जंगल में प्रवेश करते ही कोहरा छा गया। हवा तेज़ हुई और दीपक की लौ डगमगाने लगी। प्रकाश इतना मंद हो गया कि पाँव तले का रास्ता भी मुश्किल से दिख रहा था। क्रोध और निराशा में कावी बोला —
“तेरी रोशनी का क्या अर्थ, यदि अंधेरे में तू स्वयं ही बुझने लगे?”

वह पास बहती एक पतली जलधारा के किनारे बैठ गया। पानी में दीपक की काँपती परछाईं उसे अपने ही भीतर के भ्रम जैसी लगी। तभी उसके मन में एक विचार कौंधा —
“शायद दोष रोशनी का नहीं… मेरी समझ का है।”

सुबह होते ही वह फिर उसी मंदिर लौटा। वहाँ एक वृद्ध पुजारी शांत भाव से बैठे थे। उन्होंने मुस्कराकर कहा —
“लगता है, तुम्हें बुद्धि का दीप मिल गया है।”

कावी चकित होकर बोला —
“पर यह तो रात में मेरा साथ भी नहीं दे पाया।”

पुजारी ने मृदु स्वर में कहा —
“पुत्र, केवल प्रकाश पर्याप्त नहीं होता।
यदि मन अंधा हो, तो दीप भी मार्ग नहीं दिखाता।
प्रकाश केवल दिखाता है —
पर बुद्धि बताती है कि चलना किस ओर है।”

उन बातों ने कावी को भीतर तक झकझोर दिया।

अब वह फिर यात्राओं पर निकला — पर इस बार जिज्ञासा के साथ संयम, और खोज के साथ समझ
वह किसानों से बीज के धैर्य को समझता, बढ़इयों से समय और सटीकता सीखता, यात्रियों से दूर देशों के अनुभव सुनता।
जैसे-जैसे वह सीखता और बाँटता गया, दीपक की लौ धीरे-धीरे स्थिर और उज्ज्वल होती गई।

सालों बाद, कावी ने उसी गाँव में मंदिर के पास एक छोटा विद्यालय बनाया। हर शाम वह पुराना दीपक जलाता और बच्चों से कहता —
“इस दीप की लौ से अपनी बाती जलाओ —
ज्ञान बाँटो, ताकि यह प्रकाश जीवित रहे।”

धीरे-धीरे मंदिर में सैकड़ों दीप जलने लगे।
पर आश्चर्य — पुराना दीपक बुझा नहीं…
उसकी लौ और तेज़, और प्रखर हो गई।

कावी मुस्कुराया और बोला —
“प्रकाश बाँटने से घटता नहीं —
और बुद्धि भी वैसी ही है…
जितनी बाँटो, उतनी बढ़ती जाती है।”

लोगों ने उस स्थान को नाम दिया —
“दीप-ज्ञान मंदिर”
वह मंदिर जहाँ दीप केवल उजाला नहीं देता था — दिशा भी देता था

और वहाँ आने वाला हर यात्री यह सीख लेकर लौटता —
“प्रकाश रास्ता दिखाता है,
पर बुद्धि सिखाती है कि चलना कैसे है।”


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