मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

सोने का पिंजरा और उड़ान

सोने का पिंजरा और उड़ान

          एक प्रेरक कहानी

1. एक सवाल, अनेक उत्तर

सैन फ्रांसिस्को का मौसम बेहद सुहावना था। काफी देर से हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। दक्ष बर्कले विश्वविद्यालय से लौट रहा था। BART (बे एरिया रैपिड ट्रांजिट) स्टेशन से पैदल चलते हुए वह अपने फ्लैट की ओर जा रहा था। छाता होने के बावजूद हवा के झोंकों के साथ बारिश की बूँदें रह-रहकर उसके चेहरे और शरीर को छू जाती थीं। लेकिन आज उसे न बारिश की ठंडक का विशेष अहसास हो रहा था, न रास्ते की भीड़ का। उसका मन दिन भर की घटनाओं और विचारों में उलझा हुआ था।

आज बर्कले विश्वविद्यालय में उसका व्याख्यान था। विषय था—“भारत में स्टार्टअप्स की संभावनाएँ”।

भारतीय मूल के छात्रों के साथ-साथ दुनिया के अनेक देशों से आए छात्र और शोधकर्ता विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में उपस्थित थे। सभागार खचाखच भरा हुआ था। दक्ष ने अपने ओजपूर्ण भाषण में भारत की उद्यमशीलता, युवा प्रतिभा और स्टार्टअप्स की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की थी। उसके विचारों पर श्रोताओं ने कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी सहमति व्यक्त की।

उसके व्याख्यान का केंद्रीय विचार था कि भारत में स्टार्टअप्स के लिए अपार संभावनाएँ हैं। देश में हर साल हजारों नए स्टार्टअप्स शुरू होते हैं, लेकिन उनमें से बहुत-से शुरुआती वर्षों में ही बंद हो जाते हैं। सवाल केवल नए उद्यम शुरू करने का नहीं, बल्कि उन्हें टिकाऊ और सफल बनाने का भी है।

दक्ष ने यह भी कहा था कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों से निकले अनेक मेधावी छात्र बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं। वहाँ वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों में आकर्षक वेतन पर काम करने लगते हैं। उनकी प्रतिभा, परिश्रम और नवाचार का लाभ उन कंपनियों और अर्थव्यवस्थाओं को मिलता है, जहाँ वे काम करते हैं।

नौकरी करना गलत नहीं है। हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ, जिम्मेदारियाँ और प्राथमिकताएँ अलग होती हैं। लेकिन क्या हममें से कुछ लोग आर्थिक सुरक्षा और सुविधाओं के आकर्षण में अपने भीतर छिपी उद्यमशीलता को अवसर मिलने से पहले ही दबा देते हैं?

दक्ष ने अपने भाषण में इसी प्रश्न को उठाया था।

उसने कहा था कि कभी-कभी आकर्षक वेतन, सुविधाएँ और सुरक्षित भविष्य हमें ऐसे घेरे में बाँध देते हैं, जहाँ सब कुछ होते हुए भी हम अपने सपनों के लिए जोखिम उठाने का साहस नहीं कर पाते। बाहर से यह जीवन जितना सुंदर दिखाई देता है, भीतर से उतना ही सीमित भी हो सकता है।

क्या यह सुविधाओं से सजा हुआ जीवन वास्तव में स्वतंत्रता है, या एक सोने का पिंजरा?

यह प्रश्न उसने दूसरों के सामने रखा था। लेकिन अब यही प्रश्न उसके भीतर उठ रहा था।

वह स्वयं इसका एक उदाहरण था।

भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलुरु से एमबीए करने के बाद उसे ओरेकल में नौकरी मिली थी। आज वह कंपनी की स्ट्रेटजी टीम का हिस्सा था। अच्छा वेतन, प्रतिष्ठित पद, सुविधाजनक जीवन और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा—उसे वह सब मिल चुका था, जिसका सपना कभी उसने और उसके परिवार ने देखा था।

फिर भी आज उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी।

“मैंने खुद जोखिम क्यों नहीं लिया?” उसने अपने आप से पूछा।

कुछ क्षण बाद दूसरा प्रश्न उठा—

“जिस प्रतिभा को विकसित करने में भारत की शिक्षा व्यवस्था, मेरे परिवार और यहाँ के लोगों का योगदान रहा, उसका लाभ तो अब अमेरिका को मिल रहा है। भारत को क्या मिला?”

वह जानता था कि यह प्रश्न पूरी तरह उचित नहीं था। विदेश में काम करने वाले भारतीय भी अपने देश के परिवारों, अर्थव्यवस्था और समाज से जुड़े रहते हैं। वे ज्ञान, अनुभव, निवेश और तकनीक के माध्यम से अपने देश के विकास में योगदान दे सकते हैं।

लेकिन उसके मामले में एक अधूरापन था।

वह दूसरों को जोखिम उठाने की प्रेरणा दे रहा था, जबकि स्वयं अपने सपने को वर्षों से टालता आ रहा था।

फ्लैट तक पहुँचते-पहुँचते उसका मन आत्ममंथन में डूब चुका था। वह स्टार्टअप्स की रणनीतियाँ समझाने गया था, लेकिन लौटते समय उसे अपने जीवन की रणनीति पर ही संदेह होने लगा था।

2. एक ठेला, अनेक सपने

फ्लैट के अंदर पहुँचकर भी दक्ष के विचारों का सिलसिला नहीं टूटा।

उसे हैदराबाद का अपना बचपन याद आने लगा।

हाईटेक इलाके में विप्रो सर्किल के पास उसके पिता सड़क किनारे ठेला लगाकर इडली और डोसा बेचते थे। आसपास सीए टेक्नोलॉजीज, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और ओरेकल जैसी नामी-गिरामी आईटी कंपनियों के कार्यालय थे।

दक्ष पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह घर की जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त रह सके। इसलिए वह पढ़ाई के साथ-साथ अक्सर पिता की दुकान पर भी हाथ बँटाता था।

पूरा परिवार इस छोटे-से व्यवसाय को चलाने में जुटा रहता था। उसकी माँ रात में इडली और डोसे का घोल तैयार करती थीं। छोटी बहन भी काम में सहायता करती थी। सुबह होते ही पिता ठेला लेकर निकल जाते थे और दक्ष समय मिलने पर दुकान पर पहुँच जाता था।

कच्चे माल की खरीद, खाद्य पदार्थों की तैयारी, पैकेजिंग और ग्राहकों को बिक्री—एक छोटे-से व्यवसाय के लगभग सभी काम परिवार स्वयं करता था।

आज जब दक्ष व्यवसाय प्रबंधन की आधुनिक अवधारणाओं के बारे में सोचता था, तो उसे एहसास होता था कि उसके पिता अनजाने में ही एक संपूर्ण व्यावसायिक व्यवस्था चला रहे थे।

सीमित पूँजी, कम लागत, नियंत्रित अपव्यय, उचित मूल्य और ग्राहकों के साथ व्यक्तिगत संबंध—ये सब उस व्यवसाय की ताकत थे।

उस समय दक्ष को इन बातों की व्यावसायिक भाषा नहीं आती थी। उसके लिए वह केवल परिवार की आजीविका का साधन था।

आईटी कंपनियों में काम करने वाले अनेक युवा उसके पिता की दुकान के नियमित ग्राहक थे। उन्हें कम कीमत पर अच्छी गुणवत्ता का नाश्ता मिल जाता था। दक्ष उन युवाओं को देखता, उनके कार्यालयों को देखता और मन-ही-मन सोचता कि वहाँ काम करने वाले लोग कितने भाग्यशाली होंगे।

कभी-कभी वह उनसे अपनी पढ़ाई और भविष्य से जुड़े प्रश्न पूछता। उनमें से कुछ लोग उसे धैर्यपूर्वक समझाते, किताबों के बारे में बताते और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते।

उनकी बातों से उसके भीतर इंजीनियर बनने का सपना आकार लेने लगा।

उसने पिता के सामने अपनी इच्छा रखी। पिता जानते थे कि उच्च शिक्षा का खर्च उठाना आसान नहीं होगा, लेकिन बेटे की लगन देखकर उन्होंने उसका साथ देने का निश्चय किया।

मेहनत और सौभाग्य से दक्ष को हैदराबाद स्थित जेएनटीयू (जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी) में कंप्यूटर साइंस में बीटेक करने का अवसर मिला।

लेकिन कॉलेज पहुँचने के बाद भी उसने परिवार से अपना रिश्ता और जिम्मेदारियाँ नहीं छोड़ीं। वह समय मिलने पर पिता के व्यवसाय में सहयोग करता रहा। उसने बिक्री, पैकेजिंग और डिलीवरी के कुछ छोटे-छोटे प्रयोग किए। इनसे ग्राहकों को सुविधा हुई और व्यवसाय में भी सुधार आया।

उस समय शायद उसे स्वयं भी पता नहीं था कि वह व्यवसाय की उन समस्याओं को समझना सीख रहा है, जो आगे चलकर उसके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बनने वाली थीं।

बीटेक पूरा करने के बाद उसने कैट की परीक्षा दी। जब उसका 99.90 परसेंटाइल आया, तो पिता की दुकान पर आने वाले कुछ युवा ग्राहकों ने उसके पिता को समझाया कि बेटे को अच्छे प्रबंध संस्थान में प्रवेश दिलाना चाहिए।

पिता ने एक बार फिर हिम्मत जुटाई। बैंक से शिक्षा ऋण मिला और दक्ष को भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलुरु में एमबीए करने का अवसर मिल गया।

फिर उसकी उड़ान ने एक नई दिशा पकड़ी।

भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलुरु से निकलकर वह ओरेकल की नौकरी के लिए अमेरिका पहुँच गया।

पिछले चार वर्षों में उसने अपने सभी बैंक ऋण चुका दिए थे। पिता के व्यवसाय को भी पहले से अधिक व्यवस्थित कर दिया था। उसकी बहन हैदराबाद के एक अच्छे कॉलेज में पढ़ रही थी। परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ था।

यह सब उसकी नौकरी, वेतन और बचत के कारण संभव हो पाया था।

अब वह केवल अपने लिए नहीं सोचता था। उसके निर्णयों से परिवार का भविष्य भी जुड़ा हुआ था। यदि वह नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू करता और असफल हो जाता, तो उसके परिवार की आर्थिक स्थिरता पर भी असर पड़ सकता था।

यही वह बिंदु था, जहाँ उसके सारे तर्क आकर ठहर जाते थे।

वह जानता था कि नौकरी करना कायरता नहीं है और व्यवसाय करना अपने आप में साहस का प्रमाण नहीं। लेकिन उसके भीतर एक सपना था, जिसे वह लगातार टाल रहा था।

उसके सामने असली सवाल नौकरी छोड़ने या नौकरी करने का नहीं था। सवाल यह था कि क्या वह अपने सपने को केवल इसलिए छोड़ देगा, क्योंकि उसे असफल होने का डर है?

3. वह योजना, जो वर्षों से प्रतीक्षा कर रही थी

दक्ष ने अपना स्टार्टअप शुरू करने की योजना कई बार बनाई थी। उसने एक आईटी एप्लिकेशन भी विकसित किया था। लेकिन जब भी उसे नौकरी छोड़कर इस योजना पर पूरी तरह काम करने का विचार आता, वह किसी न किसी कारण से रुक जाता।

कभी परिवार की जिम्मेदारियाँ सामने आ जातीं, कभी आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न और कभी असफलता की आशंका।

उसके मन में एक विचार बार-बार लौटता था—फियर ऑफ फेल्योर, अर्थात् असफलता का भय।

विडंबना यह थी कि वह विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक कार्यक्रमों में युवाओं को जोखिम उठाने, नए विचारों पर काम करने और समस्याओं के नए समाधान खोजने के लिए प्रेरित करता था। लेकिन जब बात अपने जीवन की आती, तो उसके सारे तर्क बदल जाते थे।

उसके स्टार्टअप की योजना का केंद्र कोई बिल्कुल नया या अनजाना व्यवसाय नहीं था। वह उसी दुनिया से निकली थी, जिसे उसने बचपन से देखा था—उसके पिता का इडली-डोसे का छोटा-सा व्यवसाय।

वह सोचता था कि क्या इस पारंपरिक व्यवसाय को आधुनिक तकनीक से जोड़कर एक ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिसमें ग्राहकों को सुविधाजनक सेवा मिले, उत्पादन और वितरण अधिक कुशल हो तथा छोटे खाद्य व्यवसायों को विस्तार करने का अवसर मिले।

वह चाहता था कि उसके पिता का व्यवसाय केवल एक ठेले तक सीमित न रहे। उसमें ऐसी क्षमता विकसित हो कि वह अनेक स्थानों पर ग्राहकों की जरूरतें पूरी कर सके।

लेकिन इससे भी अधिक, वह चाहता था कि एक दिन उसके पिता अपने काम को देखकर गर्व से कह सकें कि वर्षों तक सड़क किनारे खड़े होकर उन्होंने जो काम किया, वह व्यर्थ नहीं गया।

उस रात उसने अपने आईपैड पर अपनी पुरानी योजना खोली और शुरू से अंत तक उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा।

उसने व्यावसायिक मॉडल, ग्राहकों की जरूरतों, लागत, संभावित आय, तकनीकी व्यवस्था और विस्तार की संभावनाओं पर दोबारा विचार किया।

योजना में कमियाँ थीं। कुछ अनुमानों को परखना बाकी था। उसे यह भी पता था कि वास्तविक बाजार में उतरने पर कई नई समस्याएँ सामने आएँगी।

लेकिन पहली बार उसने अपनी योजना को केवल एक सपने की तरह नहीं देखा। उसे लगा कि इसे छोटे स्तर पर शुरू करके, ग्राहकों की प्रतिक्रिया के आधार पर सुधार करते हुए आगे बढ़ाया जा सकता है।

उसने मन-ही-मन स्वीकार किया कि सफलता की कोई गारंटी नहीं है। लेकिन कोशिश किए बिना असफलता का भय समाप्त भी नहीं होगा।

उसने खिड़की से बाहर देखा। बारिश अब लगभग थम चुकी थी।

उसके मन में एक विचार स्पष्ट होने लगा—

“अगर पंछी पिंजरे में बंद रहेगा, तो उड़ान कैसे भर सकेगा?”

उसने तय कर लिया कि वह भारत लौटेगा। लेकिन इस बार केवल एक भावनात्मक निर्णय लेकर नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक योजना के साथ। वह अपने परिवार से बात करेगा, आर्थिक जोखिम का आकलन करेगा और अपने स्टार्टअप को चरणबद्ध तरीके से शुरू करेगा।

अगली सुबह उसके निर्णय में रात वाली बेचैनी नहीं, बल्कि एक शांत दृढ़ता थी।

उसने भारत लौटने की तैयारी शुरू कर दी।

शुरू हो गई एक नई उड़ान—सैन फ्रांसिस्को से मुंबई और मुंबई से हैदराबाद।

4. विश्वास पर खड़ा एक नया व्यवसाय

भारत लौटकर दक्ष ने दिन-रात मेहनत की। उसने अपने आईटी एप्लिकेशन को अंतिम रूप दिया और अपनी व्यावसायिक योजना को छोटे स्तर पर लागू करने की तैयारी शुरू कर दी।

उसने सबसे पहले हैदराबाद में अपने पिता के पुराने व्यवसाय को एक प्रयोग के रूप में चुना। उसे पता था कि किसी भी बड़े विचार की सफलता का पहला प्रमाण उसके वास्तविक ग्राहकों की प्रतिक्रिया होती है।

उसका उद्देश्य केवल इडली-डोसा बेचने के लिए एक नया ऐप बनाना नहीं था। वह उत्पादन, भंडारण, बिक्री और डिलीवरी को एक ऐसी डिजिटल व्यवस्था से जोड़ना चाहता था, जो ग्राहकों के लिए सुविधाजनक और व्यवसाय के लिए आर्थिक रूप से टिकाऊ हो।

उसने हैदराबाद और बेंगलुरु की कुछ बड़ी गेटेड कम्युनिटी से संपर्क किया। बातचीत के बाद वहाँ छोटे, सुरक्षित और सुविधाजनक खाद्य भंडारण केंद्र स्थापित करने के लिए समझौते किए गए।

इन केंद्रों में इडली, डोसा, वड़ा और बिरयानी जैसे खाद्य पदार्थों के पैक उपलब्ध कराए जाते थे। ग्राहकों को सामान खरीदने के लिए किसी कर्मचारी की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी। वे अपनी आवश्यकता के अनुसार पैक चुनते और पास में लगी भुगतान मशीन या डिजिटल माध्यम से भुगतान कर सकते थे।

सामान की उपलब्धता, बिक्री और स्टॉक की जानकारी एक केंद्रीय डिजिटल प्रणाली से जुड़ी हुई थी। इससे यह समझना आसान होता था कि किस स्थान पर कौन-सा खाद्य पदार्थ अधिक बिक रहा है और कहाँ कितनी मात्रा में सामान भेजने की आवश्यकता है।

खाद्य सुरक्षा, उचित तापमान पर भंडारण, पैकेजिंग और निर्धारित समय-सीमा में उत्पादों की बिक्री के लिए भी आवश्यक व्यवस्थाएँ की गईं।

इस मॉडल की सबसे दिलचस्प बात थी—ग्राहकों पर विश्वास।

शुरुआत में कुछ लोगों ने आशंका जताई कि यदि वहाँ कोई कर्मचारी नहीं होगा, तो कुछ ग्राहक सामान लेकर बिना भुगतान किए भी जा सकते हैं।

दक्ष ने इस संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं। उसने निगरानी, स्टॉक मिलान, भुगतान रिकॉर्ड और ग्राहकों की प्रतिक्रिया जैसी व्यवस्थाएँ कीं। लेकिन उसने व्यवस्था की बुनियाद संदेह पर रखने के बजाय विश्वास पर रखने का निर्णय लिया।

शुरुआती दिनों में एक-दो अपवाद सामने आए, लेकिन अधिकांश ग्राहक सामान लेकर उसका भुगतान करते रहे। धीरे-धीरे लोगों को यह सुविधा पसंद आने लगी।

इस प्रयोग ने दक्ष को एक महत्त्वपूर्ण बात सिखाई—हर व्यावसायिक व्यवस्था को केवल संभावित दुरुपयोग की आशंका के आधार पर नहीं बनाया जाना चाहिए। उचित सुरक्षा और जवाबदेही के साथ लोगों पर विश्वास करना भी एक सफल मॉडल का हिस्सा हो सकता है।

उसके स्टार्टअप का मूल विचार था—

“विश्वास कीजिए, व्यवस्था बनाइए और लोगों को अपनी जिम्मेदारी निभाने का अवसर दीजिए।”

यह विचार ग्राहकों को पसंद आने लगा।

दक्ष की कंपनी ने अपने खाद्य भंडारण केंद्रों को एक केंद्रीकृत डिजिटल प्रणाली से जोड़ दिया। उपलब्ध स्टॉक, बिक्री के आँकड़ों और माँग के आधार पर उत्पादन तथा आपूर्ति की योजना बनाई जाने लगी।

इससे अनावश्यक उत्पादन कम करने, खाद्य अपव्यय पर नियंत्रण रखने और ग्राहकों को उनकी जरूरत के अनुसार सामान उपलब्ध कराने में सहायता मिली।

धीरे-धीरे इस मॉडल का विस्तार होने लगा।

5. एनीथिंग, एनीटाइम, एनीव्हेयर

दक्ष के स्टार्टअप की दूसरी विशेषता थी—“एनीथिंग, एनीटाइम, एनीव्हेयर”, अर्थात् कुछ भी, कभी भी और कहीं भी।

इसका अर्थ यह नहीं था कि ग्राहक किसी भी असंभव स्थान पर या बिना किसी सीमा के डिलीवरी प्राप्त कर सकते थे। इसका विचार सरल था—ग्राहक को केवल कंपनी के किसी निश्चित काउंटर या दुकान तक आने के लिए बाध्य न होना पड़े।

मोबाइल ऐप के माध्यम से ग्राहक अपनी पसंद का खाद्य पदार्थ बुक कर सकते थे और उपलब्ध डिलीवरी क्षेत्र में किसी पूर्वनिर्धारित स्थान पर उसे प्राप्त कर सकते थे।

यह स्थान किसी कार्यालय परिसर का निर्धारित पिकअप पॉइंट हो सकता था, किसी बस स्टॉप के निकट तय किया गया स्थान, किसी पार्क के पास का पिकअप केंद्र या किसी व्यावसायिक क्षेत्र में निर्धारित डिलीवरी पॉइंट।

कुछ स्थानों पर ग्राहकों को अपने वाहन में बैठे-बैठे भी ऑर्डर प्राप्त करने की सुविधा दी गई।

इस व्यवस्था में ग्राहक की सुविधा के साथ-साथ डिलीवरी के समय, दूरी और लागत का भी ध्यान रखा जाता था।

दक्ष का मानना था कि आधुनिक तकनीक का वास्तविक लाभ तभी है, जब वह केवल व्यवसाय चलाने वाले व्यक्ति का काम आसान न करे, बल्कि ग्राहक की किसी वास्तविक समस्या का समाधान भी करे।

उसका स्टार्टअप इसी सोच पर आगे बढ़ रहा था।

वह अपने पिता के पुराने व्यवसाय से मिले अनुभव को तकनीक के साथ जोड़ रहा था। जहाँ पहले बिक्री एक ठेले और सीमित ग्राहकों तक केंद्रित थी, वहीं अब डिजिटल माध्यम से अनेक स्थानों पर माँग का अनुमान लगाना, उत्पादन की योजना बनाना और ग्राहकों तक सामान पहुँचाना संभव हो रहा था।

इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ यह था कि व्यवसाय का विस्तार केवल अधिक ठेले लगाने या अधिक दुकानें खोलने तक सीमित नहीं रह गया था। अब तकनीक, प्रक्रिया और प्रबंधन मिलकर उसकी विकास क्षमता बढ़ा रहे थे।

6. ठेले से कंपनी तक

कुछ समय बाद दक्ष के स्टार्टअप की चर्चा हैदराबाद और बेंगलुरु के व्यावसायिक क्षेत्रों में होने लगी।

उसके पिता का पुराना काम भी जारी था, लेकिन अब वह एक बड़े व्यावसायिक मॉडल का आधार बन चुका था। जिस व्यवसाय को कभी परिवार की आजीविका चलाने का साधन माना जाता था, उसी ने एक आधुनिक कंपनी के विकास की नींव रखी थी।

नई कंपनी में उसके पिता चेयरमैन बने। उनके लिए यह केवल आर्थिक सफलता नहीं थी। यह उन वर्षों के परिश्रम और संघर्ष का सम्मान भी था, जब वे सुबह-सुबह ठेला लेकर निकलते और दिन भर ग्राहकों की सेवा करते थे।

कभी जो लोग उनके ठेले पर नाश्ता करने आते थे, वे अब उनकी यात्रा की कहानी दूसरों को सुनाते थे।

वे बताते कि कैसे सड़क किनारे इडली-डोसा बेचने वाले एक व्यक्ति के छोटे-से व्यवसाय ने आधुनिक तकनीक की सहायता से एक नई व्यावसायिक पहचान प्राप्त की।

दक्ष को भी अपनी परियोजना पर संतोष था। वह जानता था कि सफलता केवल एक अच्छे विचार से नहीं मिली थी। इसमें उसके पिता का अनुभव, परिवार का सहयोग, ग्राहकों का विश्वास, तकनीकी नवाचार और लगातार सुधार करने की प्रतिबद्धता शामिल थी।

कंपनी का मूल्यांकन होने लगा। निवेशकों ने उसमें रुचि दिखाई और कुछ लोगों ने भविष्य में आईपीओ लाने की सलाह भी दी।

लेकिन दक्ष के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि केवल कंपनी का मूल्यांकन नहीं थी। उसके लिए सफलता का अर्थ था कि एक पारंपरिक व्यवसाय को आधुनिक रूप देकर अधिक अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

उसके पिता ने जीवन भर मेहनत की थी। दक्ष ने उसी मेहनत में एक नई संभावना देखी थी।

दोनों की भूमिकाएँ अलग थीं, लेकिन सफलता में दोनों का योगदान था।

7. अब उसकी कहानी दूसरे युवाओं को प्रेरित करती थी

एक दिन दक्ष को सूचना मिली कि विभिन्न प्रबंध संस्थानों में उसके स्टार्टअप की सफलता की कहानी पर चर्चा की जा रही है। उसके व्यावसायिक मॉडल को उद्यमिता और नवाचार से जुड़े कार्यक्रमों में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था।

यह सुनकर उसे अपने पुराने दिनों की याद आई।

वह दिन, जब वह बर्कले विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में खड़ा होकर भारत में स्टार्टअप्स की संभावनाओं पर भाषण दे रहा था।

वह स्वयं को याद आया—एक सफल नौकरीपेशा युवा, जो दूसरों को जोखिम उठाने के लिए प्रेरित कर रहा था, लेकिन अपने ही सपने को लेकर अनिश्चित था।

अब उसी विश्वविद्यालय में उसकी सफलता की कहानी पर बने वीडियो छात्रों और शोधकर्ताओं को दिखाए जाने लगे थे।

एक दिन किसी कार्यक्रम में उसने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा—

“मैंने यह नहीं सीखा कि नौकरी करना गलत है या हर व्यक्ति को अपना व्यवसाय ही शुरू करना चाहिए। नौकरी भी सम्मानजनक है और उद्यमिता भी। हर व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों और जिम्मेदारियों के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।

“लेकिन मैंने यह जरूर सीखा कि केवल असफलता के डर से किसी विचार को जीवन भर टालते रहना उचित नहीं है। जोखिम उठाने का अर्थ बिना सोचे-समझे सब कुछ दाँव पर लगा देना नहीं है। इसका अर्थ है—अपनी तैयारी करना, जोखिम को समझना, छोटे स्तर पर प्रयोग करना और अनुभव से सीखते हुए आगे बढ़ना।

“मेरे पिता ने मुझे व्यवसाय करना सिखाया, हालाँकि उन्होंने कभी किसी प्रबंधन संस्थान में पढ़ाई नहीं की थी। उन्होंने ग्राहकों का विश्वास जीता, गुणवत्ता बनाए रखी और सीमित साधनों में काम करना सीखा। मैंने केवल उनके अनुभव को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का प्रयास किया।

“कभी-कभी जिस संभावना को हम खोजने के लिए दुनिया भर में भटकते हैं, वह हमारे आसपास ही मौजूद होती है। जरूरत केवल उसे एक नए दृष्टिकोण से देखने की होती है।”

उस दिन दक्ष को लगा कि उसकी यात्रा का वास्तविक अर्थ अब पूरा हुआ है।

उसने केवल अपना स्टार्टअप नहीं बनाया था। उसने अपने पिता के संघर्ष को एक नई पहचान दी थी, अपने परिवार के भविष्य को मजबूत किया था और उन युवाओं के सामने एक उदाहरण रखा था, जो अपने विचारों को लेकर अनिश्चित थे।

उसे यह भी समझ में आ गया था कि उसके पिता का ठेला कोई छोटा या पिछड़ा हुआ संसार नहीं था। वह एक ऐसी पाठशाला थी, जहाँ उसने लागत, ग्राहक, गुणवत्ता, परिश्रम और विश्वास का पहला पाठ सीखा था।

सैन फ्रांसिस्को की उस बरसाती शाम को उठे प्रश्नों के उत्तर उसे अब मिल चुके थे।

वह अब भी मानता था कि हर व्यक्ति को विदेश में काम करने या भारत लौटने का निर्णय अपनी परिस्थितियों के अनुसार लेना चाहिए। देश की सेवा करने के अनेक तरीके हैं। लेकिन उसने अपने लिए जो रास्ता चुना था, उस पर आगे बढ़ने का साहस अंततः उसने स्वयं ही जुटाया था।

उसे अब समझ में आ गया था कि पिंजरे की सलाखें हमेशा लोहे की नहीं होतीं। कभी-कभी वे हमारी आशंकाओं, हमारी आदतों और हमारी सुरक्षित सीमाओं से बनी होती हैं।

और उनसे बाहर निकलने के लिए केवल पंख होना पर्याप्त नहीं है। उड़ान भरने का निर्णय भी लेना पड़ता है।

बिल्कुल सच है—पिंजरे में बंद रहकर कोई उड़ान नहीं भर सकता।

रविवार, 13 सितंबर 2026

"वह कंकड़" बाबा नीम करोडी से सम्बंधित एक सत्य घटना


वह कंकड़

एक ऐसी घटना, जिसका साक्षी आज भी जीवित है

कभी-कभी मृत्यु और जीवन के बीच केवल एक साँस का फासला होता है।

और कभी-कभी उस एक साँस को बचाने के लिए भगवान स्वयं किसी अनजान राहगीर का रूप धर लेते हैं।

यह कहानी ऐसी ही एक घटना की है।

एक छोटा-सा कंकड़...

एक अनजान साधु...

एक ऐसा व्यक्ति जिसे डॉक्टरों ने लगभग मृत्यु के लिए छोड़ दिया था...

और एक परिवार, जो अपने प्रियजन की आखिरी साँसों को अपनी आँखों के सामने देखने के लिए विवश था।

घटना आज से कई दशक पुरानी है।

मैंने इसे किसी पुस्तक में नहीं पढ़ा।

न किसी संत से सुना।

न किसी कथा-वाचक ने मुझे सुनाया।

इस घटना को मुझे सुनाने वाला व्यक्ति आज भी जीवित है।

वह लखनऊ में रहते हैं और उनकी उम्र अब सत्तर वर्ष से अधिक है।

लेकिन इस कहानी में उनका नाम नहीं होगा।

क्योंकि उन्होंने मुझसे ऐसा न करने का आग्रह किया है।

और सच कहूँ तो इस घटना की सत्यता सिद्ध करने के लिए मुझे उनके नाम की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती।

क्योंकि इस कहानी का सबसे बड़ा प्रमाण...

वह स्वयं हैं।

लेकिन यह बात मुझे उस दिन पता नहीं थी।


एक मंदिर से शुरू हुई कहानी

लखनऊ विश्वविद्यालय के पास गोमती नदी के किनारे स्थित हनुमान सेतु मंदिर से मेरा पुराना संबंध है।

कहा जाता है कि कभी इसी स्थान पर बाबा नीम करौली की कुटिया हुआ करती थी। हनुमान जी के परम भक्त बाबा ने यहाँ हनुमान मंदिर की स्थापना की थी।

आज यहाँ हनुमान जी के साथ बाबा नीम करौली का भी मंदिर है।

पहली बार जब मैं वहाँ गया था, तब बाबा के बारे में मेरी जानकारी बहुत सीमित थी।

लेकिन उनकी मूर्ति के सामने बैठते ही मुझे कुछ ऐसा अनुभव हुआ, जिसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सका।

कोई चमत्कार मेरी आँखों के सामने नहीं हुआ था।

कोई आवाज नहीं आई थी।

फिर भी मन के भीतर जैसे किसी ने बहुत धीरे से कहा हो—

“यह स्थान जागृत है।”

उस दिन के बाद मैं जब भी लखनऊ आता, मंदिर जाने का प्रयास करता।

उन दिनों मेरी पोस्टिंग गोरखपुर में थी। महीने में कम-से-कम एक बार किसी न किसी काम से लखनऊ आना पड़ता था।

मेरी कोशिश रहती कि होटल क्लार्क अवध में ठहरूँ।

होटल गोमती के एक किनारे था और हनुमान सेतु मंदिर दूसरे किनारे।

सुबह-सुबह मैं पैदल मंदिर चला जाता।

वहीं मेरी मुलाकात अपने एक सहकर्मी से होती थी।

वे भी नियमित रूप से मंदिर आते थे।

मंगलवार का व्रत रखते थे।

लेकिन बाबा नीम करौली के प्रति उनकी श्रद्धा मुझसे कहीं अधिक थी।


बड़ा मंगल की वह सुबह

एक वर्ष बड़ा मंगल के अवसर पर मैं लखनऊ में था।

पूरे शहर में उत्सव का वातावरण था।

मंदिर सजा हुआ था।

भक्तों की भीड़ उमड़ने वाली थी।

इसलिए मैं बहुत सुबह दर्शन करने चला गया।

मंदिर के भीतर पहुँचकर देखा—मेरे वही सहकर्मी पहले से वहाँ मौजूद थे।

दर्शन के बाद हम दोनों साथ-साथ होटल की ओर लौटने लगे।

हमारी मीटिंग पिछले दिन ही समाप्त हो चुकी थी। आज केवल चेकआउट करके वापस जाना था।

इसलिए हमारे पास समय था।

रास्ते में बातों-बातों में बाबा नीम करौली का विषय आ गया।

मैंने उनसे पूछा—

“आप तो बाबा के बहुत बड़े भक्त हैं। उनकी चमत्कारिक घटनाओं के बारे में भी बहुत सुना होगा?”

उन्होंने कहा—

“हाँ।”

मैंने फिर पूछा—

“लेकिन क्या आपने ऐसी कोई घटना सुनी है जिसका कोई प्रत्यक्ष साक्षी भी हो?”

इस बार उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।

हम चलते रहे।

मैंने उनकी ओर देखा।

उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया था।

कुछ क्षण बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“हाँ... एक घटना मैं जानता हूँ।”

मैं उत्साहित हो गया।

“तो फिर सुनाइए।”

उन्होंने मेरी ओर देखा।

फिर बोले—

“होटल पहुँचकर चाय पीते हैं। वहीं बताता हूँ।”


मौत का इंतजार

होटल के रेस्टोरेंट में हम आमने-सामने बैठे थे।

चाय आ गई।

उन्होंने कप उठाया, लेकिन चाय पीने के बजाय कुछ क्षण तक उसे देखते रहे।

फिर उन्होंने कहना शुरू किया—

“यह घटना एक स्टेट बैंक के अधिकारी के साथ घटी थी।”

मैं चुपचाप सुनने लगा।

“उन्हें बहुत भयंकर पीलिया हुआ था।”

पहले उन्हें केजीएमसी में भर्ती कराया गया।

दस दिन तक इलाज हुआ।

लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ।

बल्कि बीमारी बढ़ती गई।

आखिरकार उन्हें एसजीपीजीआई रेफर कर दिया गया।

वहाँ भी डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की।

लेकिन लीवर लगातार जवाब देता जा रहा था।

वह आईसीयू में थे।

परिवार के लोगों को दिन में केवल दो बार, वह भी सीमित समय के लिए, उन्हें देखने दिया जाता था।

उनकी पत्नी और बड़े साले घंटों बाहर बैठे रहते।

लेकिन एक दिन ऐसा आया जब मरीज ने उन्हें पहचानना भी बंद कर दिया।

वह बोल नहीं पाते थे।

तकलीफ होने पर केवल हाथ से इशारा करते।

डॉक्टरों ने परिवार को बुलाया।

और फिर वह बात कही, जिसे कोई परिवार कभी सुनना नहीं चाहता।

“अब इनके बचने की संभावना बहुत कम है।”

बिलुरुबिन का स्तर बहुत बढ़ चुका था।

लीवर लगभग काम करना बंद कर चुका था।

उसका असर मस्तिष्क पर भी पड़ रहा था।

डॉक्टरों ने कहा—

“दो-तीन दिन से अधिक समय शायद नहीं है।”

परिवार टूट गया।

लेकिन अंततः उन्होंने उन्हें अस्पताल से घर ले जाने का निर्णय लिया।


आखिरी कोशिश

उन्हें फैजाबाद ले जाया गया।

वहाँ उनकी हालत और बिगड़ गई।

उसी रात उनका छोटा साला मुंबई से पहुँचा।

वह परिवार का सबसे पढ़ा-लिखा और समझदार व्यक्ति माना जाता था।

उसने बड़े भाई से नाराज होकर कहा—

“आप इन्हें अस्पताल से यहाँ क्यों ले आए?”

फिर कुछ देर रुककर बोला—

“बचेंगे या नहीं, यह भगवान के हाथ में है। लेकिन हम आखिरी साँस तक कोशिश करेंगे।”

“कम-से-कम जिंदगी भर यह पछतावा तो नहीं रहेगा कि हमने कोशिश नहीं की।”

सुबह एक एंबेसडर कार तैयार हुई।

मरीज को उसमें लिटाया गया।

पत्नी और दोनों साले उन्हें लेकर लखनऊ के लिए निकल पड़े।

लेकिन लखनऊ से लगभग चालीस किलोमीटर पहले अचानक उनकी हालत बहुत खराब हो गई।

उन्होंने हाथ से संकेत किया।

उन्हें नीचे उतार दिया जाए।

कार सड़क किनारे रोक दी गई।

दोनों साले उन्हें उठाकर एक पेड़ के नीचे ले जाने लगे।

पत्नी पीछे-पीछे आ रही थीं।

तभी...

सामने से एक साधु आया।

उसने हाथ फैलाया।

छोटे साले को गुस्सा आ गया।

“तुम्हें दिखाई नहीं देता कि हम कितनी परेशानी में हैं? अभी भीख माँगने चले आए?”

पत्नी ने उसे रोक दिया।

उन्होंने साधु के हाथ में कुछ रुपये रख दिए।

साधु ने पूछा—

“क्या हुआ?”

पत्नी रो पड़ीं।

उन्होंने रोते-रोते पूरी कहानी सुना दी।

साधु कुछ क्षण उस बीमार व्यक्ति को देखता रहा।

फिर बहुत सहज स्वर में बोला—

“इन्हें कुछ नहीं होगा।”

पत्नी ने शायद पहली बार उस दिन किसी के मुँह से आशा के शब्द सुने थे।

साधु ने सड़क के किनारे झुककर एक छोटा-सा कंकड़ उठाया।

फिर सड़क पर उस कंकड़ से कुछ लिखा।

पत्नी को वह ‘२’ अंक जैसा दिखाई दिया।

साधु ने वह कंकड़ उनकी हथेली पर रख दिया।

और कहा—

“इसे इनकी जीभ पर लगा देना। ये ठीक हो जाएँगे।”

परिवार के लोग शायद विश्वास और अविश्वास के बीच खड़े थे।

लेकिन खोने को बचा ही क्या था?

साधु ने फिर कहा—

“घबराओ मत। मैं यहीं हूँ। अगर इनकी हालत बिगड़े तो मुझे बताना।”

इतना कहकर वह कुछ दूर एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया।


कंकड़

पत्नी ने उस कंकड़ को उठाया।

मरीज की जीभ पर लगाया।

फिर वह सो गए।

परिवार के लोग उनके पास बैठे रहे।

कुछ देर बाद कोई उनकी नब्ज टटोलता।

कोई साँस देखता।

सबको डर था कि कहीं सोते-सोते...

लेकिन समय बीतता गया।

लगभग डेढ़ घंटे बाद अचानक...

वह व्यक्ति उठकर बैठ गया।

पत्नी घबरा गईं।

दोनों साले उसकी ओर देखने लगे।

उसने चारों ओर देखा और पूछा—

“हम लोग कहाँ जा रहे हैं?”

किसी को विश्वास नहीं हुआ।

जिस व्यक्ति ने कई दिनों से ठीक से बात नहीं की थी...

जिसे अपने लोगों की पहचान नहीं रही थी...

जिसे उठकर बैठने की ताकत नहीं थी...

वह स्वयं बैठा था।

और बात कर रहा था।

फिर उसने पानी माँगा।

कुछ खाने के लिए माँगा।

उसे पानी दिया गया।

खाना दिया गया।

वह खाता रहा।

परिवार के लोग एक-दूसरे को देखते रहे।

आँखों में आँसू थे।

लेकिन इस बार वे आँसू निराशा के नहीं थे।

वे...

आश्चर्य के थे।

तभी पत्नी को उस साधु की याद आई।

उन्होंने पेड़ की ओर देखा।

साधु वहाँ नहीं था।

वे लोग उसे खोजने गए।

आसपास देखा।

सड़क के दोनों ओर देखा।

काफी दूर तक गए।

लेकिन...

वह साधु कहीं नहीं मिला।

जैसे वह आया ही न हो।


रिपोर्टें

परिवार लखनऊ पहुँचा।

एक निजी चिकित्सक से संपर्क किया गया।

डॉक्टर ने मरीज को देखा।

उन्हें कमजोरी के अलावा कोई गंभीर असामान्यता दिखाई नहीं दी।

जाँचें कराई गईं।

रिपोर्ट आईं।

और परिवार के सामने एक और आश्चर्य था—

रिपोर्ट सामान्य थीं।

वह व्यक्ति चल सकता था।

बोल सकता था।

खाना खा सकता था।

परिवार के लोग जैसे मृत्यु के द्वार से लौटकर आए थे।

उन्होंने लखनऊ के प्रमुख मंदिरों में जाकर पूजा करने का निर्णय लिया।

और इसी क्रम में वे हनुमान सेतु मंदिर पहुँचे।


वह तस्वीर

मंदिर में दर्शन करते हुए अचानक उस व्यक्ति की पत्नी की नजर बाबा नीम करौली की तस्वीर पर पड़ी।

वह वहीं रुक गईं।

उनकी आँखें फैल गईं।

उन्होंने तस्वीर की ओर इशारा किया—

“यह तो उन्हीं की तस्वीर है!”

सबने पूछा—

“किसकी?”

उन्होंने कहा—

“वही... जो रास्ते में मिले थे।”

परिवार स्तब्ध था।

उन्हें बाबा नीम करौली के बारे में कुछ मालूम नहीं था।

उन्होंने पहले कभी उनकी तस्वीर नहीं देखी थी।

फिर मंदिर के लोगों से बाबा के बारे में पूछा।

उनका जीवन जाना।

उनकी हनुमान भक्ति के बारे में जाना।

और तब जाकर उस परिवार ने उस रहस्यमय साधु और बाबा नीम करौली के बीच संबंध को समझने की कोशिश की।

किसी के पास प्रमाण नहीं था।

लेकिन उस परिवार के लिए प्रश्न प्रमाण का नहीं था।

उनके लिए प्रश्न केवल इतना था—

जिसे डॉक्टरों ने लगभग खो दिया था, वह वापस कैसे आया?


मैं अब तक पूरी तन्मयता से अपने सहकर्मी की बातें सुन रहा था।

उनकी आवाज धीमी होती जा रही थी।

मैंने पूछा—

“फिर?”

उन्होंने मेरी ओर देखा।

कुछ क्षण चुप रहे।

फिर मैंने सहज भाव से पूछा—

“वह अधिकारी कौन थे?”

इस बार उन्होंने तुरंत उत्तर नहीं दिया।

उनकी आँखें झुक गईं।

कुछ क्षण तक रेस्टोरेंट की मेज पर बिल्कुल खामोशी रही।

फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“वह अधिकारी... मैं स्वयं था।”


और उस क्षण कहानी बदल गई

मैं कुछ क्षण तक उन्हें देखता रह गया।

मेरे पास कोई प्रश्न नहीं था।

कोई तर्क नहीं था।

कोई टिप्पणी नहीं थी।

मैं केवल उनकी ओर देख रहा था।

जिस व्यक्ति के बारे में वह पिछले इतने समय से “वह अधिकारी” कहकर बता रहे थे...

वह व्यक्ति मेरे सामने बैठा था।

जीवित।

स्वस्थ।

सत्तर वर्ष से अधिक की आयु में।

मैंने अनायास उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।

और न जाने कितनी देर तक वैसे ही बैठा रहा।

मुझे लगा जैसे मैं उनकी कहानी नहीं सुन रहा था।

जैसे उस घटना की स्मृति को छू रहा हूँ।

एक सड़क...

एक पेड़...

एक मृत्युशैया पर पड़ा आदमी...

एक रोती हुई पत्नी...

एक अजनबी साधु...

और उसकी हथेली पर रखा हुआ...

एक छोटा-सा कंकड़।


मैंने सत्य की तलाश की

उस घटना को सुनने के बाद मेरे भीतर एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठा—

क्या यह वास्तव में हुआ था?

मैंने उनके नाम का उल्लेख किए बिना उनके कुछ पुराने मित्रों से उनकी बीमारी के बारे में अलग-अलग समय पर पूछा।

क्या वह कभी बहुत गंभीर रूप से बीमार पड़े थे?

हर व्यक्ति ने इसकी पुष्टि की।

हाँ।

वह बहुत गंभीर रूप से बीमार पड़े थे।

अस्पताल में भर्ती हुए थे।

स्थिति बेहद नाजुक थी।

लेकिन उस चमत्कार की घटना किसी ने नहीं बताई।

और मैंने भी उसका उल्लेख नहीं किया।

क्योंकि यह केवल एक कहानी नहीं थी।

यह किसी की निजी आस्था थी।

और शायद एक वचन भी।


चमत्कार या संयोग?

क्या वह साधु वास्तव में बाबा नीम करौली थे?

मैं यह दावा नहीं कर सकता।

मेरे पास इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

क्या उस कंकड़ में कोई औषधीय शक्ति थी?

मैं यह भी नहीं जानता।

क्या बीमारी के किसी अप्रत्याशित चिकित्सकीय कारण से उनकी स्थिति सुधरी?

संभव है।

विज्ञान अपने प्रश्न पूछेगा।

और उसे पूछने भी चाहिए।

लेकिन विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं और मनुष्य के अनुभव की अपनी।

मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि जिस व्यक्ति ने यह सब स्वयं झेला, उसने मुझे अपनी आँखों में आँसू लिए यह कहानी सुनाई थी।

और उसके लिए वह घटना किसी सिद्धांत का विषय नहीं थी।

वह उसका जीवन था।


वह कंकड़ आज कहाँ है?

कभी-कभी मेरे मन में यह प्रश्न आता है—

क्या उस परिवार ने वह कंकड़ संभालकर रखा होगा?

क्या वह आज भी कहीं होगा?

शायद नहीं।

शायद वह कंकड़ उसी सड़क पर लौट गया होगा जहाँ से उठाया गया था।

लेकिन मेरे लिए वह कंकड़ आज भी मौजूद है।

एक स्मृति की तरह।

एक प्रश्न की तरह।

एक विश्वास की तरह।

और शायद एक उत्तर की तरह भी।


आज मेरे घर के मंदिर में मेरी माँ की तस्वीर के साथ एक और तस्वीर है—

बाबा नीम करौली की।

जब कभी मैं उस तस्वीर के सामने बैठता हूँ तो बड़ा मंगल की वह सुबह याद आती है।

अपने सहकर्मी का गंभीर चेहरा याद आता है।

और फिर वह वाक्य कानों में गूँजता है—

“वह अधिकारी... मैं स्वयं था।”

तब मेरे सामने फिर वही दृश्य उभर आता है—

सड़क के किनारे एक पेड़...

उसके नीचे मृत्यु से लड़ता एक आदमी...

पास खड़ी रोती हुई पत्नी...

और कुछ दूरी पर बैठा एक अज्ञात साधु।

जिसने न कोई मंत्र पढ़ा...

न कोई दवा दी...

न कोई बड़ा अनुष्ठान किया।

बस सड़क से एक छोटा-सा कंकड़ उठाया...

और कहा—

“इसे इनकी जीभ पर लगा देना। ये ठीक हो जाएँगे।”

डेढ़ घंटे बाद वह आदमी उठ बैठा था।

और जिस साधु ने यह कहा था—

“मैं यहीं हूँ...”

वह वहाँ था ही नहीं।

या शायद...

वह वहाँ था।

बस हमारी आँखें उसे पहचान नहीं सकीं।

कौन जाने?

मैं इसका उत्तर नहीं जानता।

लेकिन उस दिन से मेरे लिए बाबा नीम करौली की तस्वीर केवल एक संत की तस्वीर नहीं है।

वह मुझे याद दिलाती है कि मनुष्य की समझ जहाँ समाप्त होती है...

वहीं से शायद...

विश्वास की शुरुआत होती है।

और कभी-कभी उस विश्वास को सहारा देने के लिए भगवान को किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं पड़ती।

एक छोटा-सा कंकड़ ही काफी होता है।

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~

सोने का पिंजरा और उड़ान

सोने का पिंजरा और उड़ान           एक प्रेरक कहानी 1. एक सवाल, अनेक उत्तर सैन फ्रांसिस्को का मौसम बेहद सुहावना था। काफी देर से हल्की बूंदाबां...