गणपति और कुबेर की कहानी
अहंकार का अंत और विनम्रता का पाठ
स्वर्गलोक में कुबेर नाम के एक देवता रहते थे। वे धन के देवता माने जाते थे। उनके पास सोने-चाँदी, हीरे-मोती और अनगिनत खजाने थे। उनकी अलकापुरी नगरी वैभव और ऐश्वर्य से चमकती रहती थी। महलों की दीवारें सोने की थीं, दरवाजों पर हीरे जड़े थे और सेवक-सैनिक हर समय उनकी सेवा में उपस्थित रहते थे।
धीरे-धीरे कुबेर को अपने धन और वैभव पर बहुत घमंड हो गया। उन्हें लगने लगा कि तीनों लोकों में उनसे अधिक धनी और शक्तिशाली कोई नहीं है। वे चाहते थे कि सब लोग उनके वैभव की प्रशंसा करें।
एक दिन कुबेर ने सोचा—
“क्यों न मैं एक भव्य भोज का आयोजन करूँ, जिसमें सभी देवी-देवताओं को बुलाऊँ। जब वे मेरा वैभव देखेंगे, तो मेरी महिमा का गुणगान करेंगे।”
यह सोचकर उन्होंने एक विशाल भोज की तैयारी शुरू कर दी। उनके महल को फूलों, रत्नों और स्वर्ण दीपों से सजाया गया। रसोई में सैकड़ों रसोइये दिन-रात तरह-तरह के व्यंजन बनाने लगे। दूध, घी, मिठाइयाँ, फल, मेवे और अनगिनत पकवान तैयार होने लगे।
सबसे पहले कुबेर भगवान शिव और माता पार्वती को आमंत्रित करने कैलाश पर्वत पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने बड़े गर्व से कहा—
“प्रभु! मैंने एक भव्य भोज का आयोजन किया है। कृपया अपने परिवार सहित मेरे यहाँ पधारें और मेरे आतिथ्य को स्वीकार करें।”
भगवान शिव कुबेर के मन का अहंकार समझ गए। वे मुस्कुराए और बोले—
“कुबेर, हम तो कैलाश पर ही प्रसन्न हैं। लेकिन यदि तुम चाहो, तो हमारे पुत्र गणेश को अपने साथ ले जा सकते हो।”
कुबेर मन ही मन प्रसन्न हो गए। उन्होंने सोचा—
“एक छोटे बालक को खिलाना कौन-सी बड़ी बात है? मैं तो पूरे स्वर्ग को भोजन करा सकता हूँ।”
वे आदरपूर्वक गणेश जी को अपने साथ अलकापुरी ले आए।
गणेश जी का आगमन
जैसे ही गणेश जी महल पहुँचे, कुबेर ने उनका भव्य स्वागत किया। सोने के सिंहासन पर उन्हें बैठाया गया और तुरंत भोजन परोसा जाने लगा।
गणेश जी ने मुस्कुराकर भोजन करना शुरू किया।
वे खाते गए… खाते गए…
एक थाल समाप्त हुई, फिर दूसरी, फिर तीसरी।
देखते-देखते सैकड़ों थालियाँ खाली हो गईं।
रसोइये घबराकर नई-नई मिठाइयाँ और पकवान लाने लगे, लेकिन गणेश जी की भूख शांत ही नहीं हो रही थी।
कुछ ही देर में पूरा भोज समाप्त हो गया।
कुबेर चकित रह गए।
उन्होंने तुरंत भंडारगृह खोलने का आदेश दिया।
महल में रखा सारा अनाज, फल, मिठाइयाँ और पकवान गणेश जी के सामने लाकर रख दिए गए, लेकिन गणेश जी सब कुछ खाते चले गए।
बढ़ती चिंता
अब कुबेर के चेहरे का घमंड धीरे-धीरे डर में बदलने लगा।
उन्होंने सोचा—
“इतना भोजन तो हजारों लोगों के लिए पर्याप्त था! फिर भी गणेश जी की भूख क्यों नहीं मिट रही?”
जब सारा भोजन समाप्त हो गया, तो गणेश जी बोले—
“कुबेर! मेरी भूख अभी शांत नहीं हुई। अब मैं क्या खाऊँ?”
इतना कहकर वे महल की वस्तुएँ खाने लगे।
उन्होंने सोने-चाँदी के बर्तन उठा लिए। फिर सजावट के सामान, फर्नीचर और महल की वस्तुएँ खाने लगे।
कुबेर भयभीत हो गए।
गणेश जी बोले—
“यदि मुझे भोजन नहीं मिला, तो मैं पूरा महल ही खा जाऊँगा!”
अब कुबेर का अहंकार पूरी तरह टूट चुका था। उन्हें समझ आ गया कि धन और वैभव से किसी की महानता सिद्ध नहीं होती।
वे तुरंत कैलाश पर्वत की ओर भागे और भगवान शिव के चरणों में गिर पड़े।
भगवान शिव की शिक्षा
कुबेर रोते हुए बोले—
“प्रभु! मुझे क्षमा कर दीजिए। मैंने अपने धन का घमंड किया। मैं अपनी शक्ति दिखाना चाहता था, लेकिन गणेश जी की भूख के आगे मेरा सारा वैभव छोटा पड़ गया।”
भगवान शिव मुस्कुराए और बोले—
“कुबेर, अहंकार मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है। धन का उपयोग सेवा और विनम्रता के लिए होना चाहिए, प्रदर्शन के लिए नहीं।”
फिर भगवान शिव ने उन्हें एक मुट्ठी भुने हुए चावल दिए और कहा—
“इसे प्रेम और विनम्रता से गणेश को अर्पित करो।”
कुबेर तुरंत वापस लौटे। उन्होंने अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा से गणेश जी को वह मुट्ठी भर चावल अर्पित किए।
गणेश जी ने प्रसन्न होकर उसे ग्रहण किया और उनकी भूख शांत हो गई।
कहानी से शिक्षा
उस दिन कुबेर को समझ आ गया कि—
धन से बड़ा विनम्रता का मूल्य होता है।
अहंकार मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है।
सच्चा प्रेम और श्रद्धा किसी भी भव्यता से अधिक शक्तिशाली होते हैं।
भगवान को दिखावा नहीं, सच्ची भक्ति प्रिय होती है।
तभी से कुबेर ने अपना घमंड त्याग दिया और विनम्र होकर जीवन बिताने लगे।
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