वह कंकड़
एक ऐसी घटना, जिसका साक्षी आज भी जीवित है
कभी-कभी मृत्यु और जीवन के बीच केवल एक साँस का फासला होता है।
और कभी-कभी उस एक साँस को बचाने के लिए भगवान स्वयं किसी अनजान राहगीर का रूप धर लेते हैं।
यह कहानी ऐसी ही एक घटना की है।
एक छोटा-सा कंकड़...
एक अनजान साधु...
एक ऐसा व्यक्ति जिसे डॉक्टरों ने लगभग मृत्यु के लिए छोड़ दिया था...
और एक परिवार, जो अपने प्रियजन की आखिरी साँसों को अपनी आँखों के सामने देखने के लिए विवश था।
घटना आज से कई दशक पुरानी है।
मैंने इसे किसी पुस्तक में नहीं पढ़ा।
न किसी संत से सुना।
न किसी कथा-वाचक ने मुझे सुनाया।
इस घटना को मुझे सुनाने वाला व्यक्ति आज भी जीवित है।
वह लखनऊ में रहते हैं और उनकी उम्र अब सत्तर वर्ष से अधिक है।
लेकिन इस कहानी में उनका नाम नहीं होगा।
क्योंकि उन्होंने मुझसे ऐसा न करने का आग्रह किया है।
और सच कहूँ तो इस घटना की सत्यता सिद्ध करने के लिए मुझे उनके नाम की आवश्यकता भी महसूस नहीं होती।
क्योंकि इस कहानी का सबसे बड़ा प्रमाण...
वह स्वयं हैं।
लेकिन यह बात मुझे उस दिन पता नहीं थी।
एक मंदिर से शुरू हुई कहानी
लखनऊ विश्वविद्यालय के पास गोमती नदी के किनारे स्थित हनुमान सेतु मंदिर से मेरा पुराना संबंध है।
कहा जाता है कि कभी इसी स्थान पर बाबा नीम करौली की कुटिया हुआ करती थी। हनुमान जी के परम भक्त बाबा ने यहाँ हनुमान मंदिर की स्थापना की थी।
आज यहाँ हनुमान जी के साथ बाबा नीम करौली का भी मंदिर है।
पहली बार जब मैं वहाँ गया था, तब बाबा के बारे में मेरी जानकारी बहुत सीमित थी।
लेकिन उनकी मूर्ति के सामने बैठते ही मुझे कुछ ऐसा अनुभव हुआ, जिसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सका।
कोई चमत्कार मेरी आँखों के सामने नहीं हुआ था।
कोई आवाज नहीं आई थी।
फिर भी मन के भीतर जैसे किसी ने बहुत धीरे से कहा हो—
“यह स्थान जागृत है।”
उस दिन के बाद मैं जब भी लखनऊ आता, मंदिर जाने का प्रयास करता।
उन दिनों मेरी पोस्टिंग गोरखपुर में थी। महीने में कम-से-कम एक बार किसी न किसी काम से लखनऊ आना पड़ता था।
मेरी कोशिश रहती कि होटल क्लार्क अवध में ठहरूँ।
होटल गोमती के एक किनारे था और हनुमान सेतु मंदिर दूसरे किनारे।
सुबह-सुबह मैं पैदल मंदिर चला जाता।
वहीं मेरी मुलाकात अपने एक सहकर्मी से होती थी।
वे भी नियमित रूप से मंदिर आते थे।
मंगलवार का व्रत रखते थे।
लेकिन बाबा नीम करौली के प्रति उनकी श्रद्धा मुझसे कहीं अधिक थी।
बड़ा मंगल की वह सुबह
एक वर्ष बड़ा मंगल के अवसर पर मैं लखनऊ में था।
पूरे शहर में उत्सव का वातावरण था।
मंदिर सजा हुआ था।
भक्तों की भीड़ उमड़ने वाली थी।
इसलिए मैं बहुत सुबह दर्शन करने चला गया।
मंदिर के भीतर पहुँचकर देखा—मेरे वही सहकर्मी पहले से वहाँ मौजूद थे।
दर्शन के बाद हम दोनों साथ-साथ होटल की ओर लौटने लगे।
हमारी मीटिंग पिछले दिन ही समाप्त हो चुकी थी। आज केवल चेकआउट करके वापस जाना था।
इसलिए हमारे पास समय था।
रास्ते में बातों-बातों में बाबा नीम करौली का विषय आ गया।
मैंने उनसे पूछा—
“आप तो बाबा के बहुत बड़े भक्त हैं। उनकी चमत्कारिक घटनाओं के बारे में भी बहुत सुना होगा?”
उन्होंने कहा—
“हाँ।”
मैंने फिर पूछा—
“लेकिन क्या आपने ऐसी कोई घटना सुनी है जिसका कोई प्रत्यक्ष साक्षी भी हो?”
इस बार उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।
हम चलते रहे।
मैंने उनकी ओर देखा।
उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया था।
कुछ क्षण बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
“हाँ... एक घटना मैं जानता हूँ।”
मैं उत्साहित हो गया।
“तो फिर सुनाइए।”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
फिर बोले—
“होटल पहुँचकर चाय पीते हैं। वहीं बताता हूँ।”
मौत का इंतजार
होटल के रेस्टोरेंट में हम आमने-सामने बैठे थे।
चाय आ गई।
उन्होंने कप उठाया, लेकिन चाय पीने के बजाय कुछ क्षण तक उसे देखते रहे।
फिर उन्होंने कहना शुरू किया—
“यह घटना एक स्टेट बैंक के अधिकारी के साथ घटी थी।”
मैं चुपचाप सुनने लगा।
“उन्हें बहुत भयंकर पीलिया हुआ था।”
पहले उन्हें केजीएमसी में भर्ती कराया गया।
दस दिन तक इलाज हुआ।
लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ।
बल्कि बीमारी बढ़ती गई।
आखिरकार उन्हें एसजीपीजीआई रेफर कर दिया गया।
वहाँ भी डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की।
लेकिन लीवर लगातार जवाब देता जा रहा था।
वह आईसीयू में थे।
परिवार के लोगों को दिन में केवल दो बार, वह भी सीमित समय के लिए, उन्हें देखने दिया जाता था।
उनकी पत्नी और बड़े साले घंटों बाहर बैठे रहते।
लेकिन एक दिन ऐसा आया जब मरीज ने उन्हें पहचानना भी बंद कर दिया।
वह बोल नहीं पाते थे।
तकलीफ होने पर केवल हाथ से इशारा करते।
डॉक्टरों ने परिवार को बुलाया।
और फिर वह बात कही, जिसे कोई परिवार कभी सुनना नहीं चाहता।
“अब इनके बचने की संभावना बहुत कम है।”
बिलुरुबिन का स्तर बहुत बढ़ चुका था।
लीवर लगभग काम करना बंद कर चुका था।
उसका असर मस्तिष्क पर भी पड़ रहा था।
डॉक्टरों ने कहा—
“दो-तीन दिन से अधिक समय शायद नहीं है।”
परिवार टूट गया।
लेकिन अंततः उन्होंने उन्हें अस्पताल से घर ले जाने का निर्णय लिया।
आखिरी कोशिश
उन्हें फैजाबाद ले जाया गया।
वहाँ उनकी हालत और बिगड़ गई।
उसी रात उनका छोटा साला मुंबई से पहुँचा।
वह परिवार का सबसे पढ़ा-लिखा और समझदार व्यक्ति माना जाता था।
उसने बड़े भाई से नाराज होकर कहा—
“आप इन्हें अस्पताल से यहाँ क्यों ले आए?”
फिर कुछ देर रुककर बोला—
“बचेंगे या नहीं, यह भगवान के हाथ में है। लेकिन हम आखिरी साँस तक कोशिश करेंगे।”
“कम-से-कम जिंदगी भर यह पछतावा तो नहीं रहेगा कि हमने कोशिश नहीं की।”
सुबह एक एंबेसडर कार तैयार हुई।
मरीज को उसमें लिटाया गया।
पत्नी और दोनों साले उन्हें लेकर लखनऊ के लिए निकल पड़े।
लेकिन लखनऊ से लगभग चालीस किलोमीटर पहले अचानक उनकी हालत बहुत खराब हो गई।
उन्होंने हाथ से संकेत किया।
उन्हें नीचे उतार दिया जाए।
कार सड़क किनारे रोक दी गई।
दोनों साले उन्हें उठाकर एक पेड़ के नीचे ले जाने लगे।
पत्नी पीछे-पीछे आ रही थीं।
तभी...
सामने से एक साधु आया।
उसने हाथ फैलाया।
छोटे साले को गुस्सा आ गया।
“तुम्हें दिखाई नहीं देता कि हम कितनी परेशानी में हैं? अभी भीख माँगने चले आए?”
पत्नी ने उसे रोक दिया।
उन्होंने साधु के हाथ में कुछ रुपये रख दिए।
साधु ने पूछा—
“क्या हुआ?”
पत्नी रो पड़ीं।
उन्होंने रोते-रोते पूरी कहानी सुना दी।
साधु कुछ क्षण उस बीमार व्यक्ति को देखता रहा।
फिर बहुत सहज स्वर में बोला—
“इन्हें कुछ नहीं होगा।”
पत्नी ने शायद पहली बार उस दिन किसी के मुँह से आशा के शब्द सुने थे।
साधु ने सड़क के किनारे झुककर एक छोटा-सा कंकड़ उठाया।
फिर सड़क पर उस कंकड़ से कुछ लिखा।
पत्नी को वह ‘२’ अंक जैसा दिखाई दिया।
साधु ने वह कंकड़ उनकी हथेली पर रख दिया।
और कहा—
“इसे इनकी जीभ पर लगा देना। ये ठीक हो जाएँगे।”
परिवार के लोग शायद विश्वास और अविश्वास के बीच खड़े थे।
लेकिन खोने को बचा ही क्या था?
साधु ने फिर कहा—
“घबराओ मत। मैं यहीं हूँ। अगर इनकी हालत बिगड़े तो मुझे बताना।”
इतना कहकर वह कुछ दूर एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया।
कंकड़
पत्नी ने उस कंकड़ को उठाया।
मरीज की जीभ पर लगाया।
फिर वह सो गए।
परिवार के लोग उनके पास बैठे रहे।
कुछ देर बाद कोई उनकी नब्ज टटोलता।
कोई साँस देखता।
सबको डर था कि कहीं सोते-सोते...
लेकिन समय बीतता गया।
लगभग डेढ़ घंटे बाद अचानक...
वह व्यक्ति उठकर बैठ गया।
पत्नी घबरा गईं।
दोनों साले उसकी ओर देखने लगे।
उसने चारों ओर देखा और पूछा—
“हम लोग कहाँ जा रहे हैं?”
किसी को विश्वास नहीं हुआ।
जिस व्यक्ति ने कई दिनों से ठीक से बात नहीं की थी...
जिसे अपने लोगों की पहचान नहीं रही थी...
जिसे उठकर बैठने की ताकत नहीं थी...
वह स्वयं बैठा था।
और बात कर रहा था।
फिर उसने पानी माँगा।
कुछ खाने के लिए माँगा।
उसे पानी दिया गया।
खाना दिया गया।
वह खाता रहा।
परिवार के लोग एक-दूसरे को देखते रहे।
आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार वे आँसू निराशा के नहीं थे।
वे...
आश्चर्य के थे।
तभी पत्नी को उस साधु की याद आई।
उन्होंने पेड़ की ओर देखा।
साधु वहाँ नहीं था।
वे लोग उसे खोजने गए।
आसपास देखा।
सड़क के दोनों ओर देखा।
काफी दूर तक गए।
लेकिन...
वह साधु कहीं नहीं मिला।
जैसे वह आया ही न हो।
रिपोर्टें
परिवार लखनऊ पहुँचा।
एक निजी चिकित्सक से संपर्क किया गया।
डॉक्टर ने मरीज को देखा।
उन्हें कमजोरी के अलावा कोई गंभीर असामान्यता दिखाई नहीं दी।
जाँचें कराई गईं।
रिपोर्ट आईं।
और परिवार के सामने एक और आश्चर्य था—
रिपोर्ट सामान्य थीं।
वह व्यक्ति चल सकता था।
बोल सकता था।
खाना खा सकता था।
परिवार के लोग जैसे मृत्यु के द्वार से लौटकर आए थे।
उन्होंने लखनऊ के प्रमुख मंदिरों में जाकर पूजा करने का निर्णय लिया।
और इसी क्रम में वे हनुमान सेतु मंदिर पहुँचे।
वह तस्वीर
मंदिर में दर्शन करते हुए अचानक उस व्यक्ति की पत्नी की नजर बाबा नीम करौली की तस्वीर पर पड़ी।
वह वहीं रुक गईं।
उनकी आँखें फैल गईं।
उन्होंने तस्वीर की ओर इशारा किया—
“यह तो उन्हीं की तस्वीर है!”
सबने पूछा—
“किसकी?”
उन्होंने कहा—
“वही... जो रास्ते में मिले थे।”
परिवार स्तब्ध था।
उन्हें बाबा नीम करौली के बारे में कुछ मालूम नहीं था।
उन्होंने पहले कभी उनकी तस्वीर नहीं देखी थी।
फिर मंदिर के लोगों से बाबा के बारे में पूछा।
उनका जीवन जाना।
उनकी हनुमान भक्ति के बारे में जाना।
और तब जाकर उस परिवार ने उस रहस्यमय साधु और बाबा नीम करौली के बीच संबंध को समझने की कोशिश की।
किसी के पास प्रमाण नहीं था।
लेकिन उस परिवार के लिए प्रश्न प्रमाण का नहीं था।
उनके लिए प्रश्न केवल इतना था—
जिसे डॉक्टरों ने लगभग खो दिया था, वह वापस कैसे आया?
मैं अब तक पूरी तन्मयता से अपने सहकर्मी की बातें सुन रहा था।
उनकी आवाज धीमी होती जा रही थी।
मैंने पूछा—
“फिर?”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
कुछ क्षण चुप रहे।
फिर मैंने सहज भाव से पूछा—
“वह अधिकारी कौन थे?”
इस बार उन्होंने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
उनकी आँखें झुक गईं।
कुछ क्षण तक रेस्टोरेंट की मेज पर बिल्कुल खामोशी रही।
फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—
“वह अधिकारी... मैं स्वयं था।”
और उस क्षण कहानी बदल गई
मैं कुछ क्षण तक उन्हें देखता रह गया।
मेरे पास कोई प्रश्न नहीं था।
कोई तर्क नहीं था।
कोई टिप्पणी नहीं थी।
मैं केवल उनकी ओर देख रहा था।
जिस व्यक्ति के बारे में वह पिछले इतने समय से “वह अधिकारी” कहकर बता रहे थे...
वह व्यक्ति मेरे सामने बैठा था।
जीवित।
स्वस्थ।
सत्तर वर्ष से अधिक की आयु में।
मैंने अनायास उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
और न जाने कितनी देर तक वैसे ही बैठा रहा।
मुझे लगा जैसे मैं उनकी कहानी नहीं सुन रहा था।
जैसे उस घटना की स्मृति को छू रहा हूँ।
एक सड़क...
एक पेड़...
एक मृत्युशैया पर पड़ा आदमी...
एक रोती हुई पत्नी...
एक अजनबी साधु...
और उसकी हथेली पर रखा हुआ...
एक छोटा-सा कंकड़।
मैंने सत्य की तलाश की
उस घटना को सुनने के बाद मेरे भीतर एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठा—
क्या यह वास्तव में हुआ था?
मैंने उनके नाम का उल्लेख किए बिना उनके कुछ पुराने मित्रों से उनकी बीमारी के बारे में अलग-अलग समय पर पूछा।
क्या वह कभी बहुत गंभीर रूप से बीमार पड़े थे?
हर व्यक्ति ने इसकी पुष्टि की।
हाँ।
वह बहुत गंभीर रूप से बीमार पड़े थे।
अस्पताल में भर्ती हुए थे।
स्थिति बेहद नाजुक थी।
लेकिन उस चमत्कार की घटना किसी ने नहीं बताई।
और मैंने भी उसका उल्लेख नहीं किया।
क्योंकि यह केवल एक कहानी नहीं थी।
यह किसी की निजी आस्था थी।
और शायद एक वचन भी।
चमत्कार या संयोग?
क्या वह साधु वास्तव में बाबा नीम करौली थे?
मैं यह दावा नहीं कर सकता।
मेरे पास इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
क्या उस कंकड़ में कोई औषधीय शक्ति थी?
मैं यह भी नहीं जानता।
क्या बीमारी के किसी अप्रत्याशित चिकित्सकीय कारण से उनकी स्थिति सुधरी?
संभव है।
विज्ञान अपने प्रश्न पूछेगा।
और उसे पूछने भी चाहिए।
लेकिन विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं और मनुष्य के अनुभव की अपनी।
मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि जिस व्यक्ति ने यह सब स्वयं झेला, उसने मुझे अपनी आँखों में आँसू लिए यह कहानी सुनाई थी।
और उसके लिए वह घटना किसी सिद्धांत का विषय नहीं थी।
वह उसका जीवन था।
वह कंकड़ आज कहाँ है?
कभी-कभी मेरे मन में यह प्रश्न आता है—
क्या उस परिवार ने वह कंकड़ संभालकर रखा होगा?
क्या वह आज भी कहीं होगा?
शायद नहीं।
शायद वह कंकड़ उसी सड़क पर लौट गया होगा जहाँ से उठाया गया था।
लेकिन मेरे लिए वह कंकड़ आज भी मौजूद है।
एक स्मृति की तरह।
एक प्रश्न की तरह।
एक विश्वास की तरह।
और शायद एक उत्तर की तरह भी।
आज मेरे घर के मंदिर में मेरी माँ की तस्वीर के साथ एक और तस्वीर है—
बाबा नीम करौली की।
जब कभी मैं उस तस्वीर के सामने बैठता हूँ तो बड़ा मंगल की वह सुबह याद आती है।
अपने सहकर्मी का गंभीर चेहरा याद आता है।
और फिर वह वाक्य कानों में गूँजता है—
“वह अधिकारी... मैं स्वयं था।”
तब मेरे सामने फिर वही दृश्य उभर आता है—
सड़क के किनारे एक पेड़...
उसके नीचे मृत्यु से लड़ता एक आदमी...
पास खड़ी रोती हुई पत्नी...
और कुछ दूरी पर बैठा एक अज्ञात साधु।
जिसने न कोई मंत्र पढ़ा...
न कोई दवा दी...
न कोई बड़ा अनुष्ठान किया।
बस सड़क से एक छोटा-सा कंकड़ उठाया...
और कहा—
“इसे इनकी जीभ पर लगा देना। ये ठीक हो जाएँगे।”
डेढ़ घंटे बाद वह आदमी उठ बैठा था।
और जिस साधु ने यह कहा था—
“मैं यहीं हूँ...”
वह वहाँ था ही नहीं।
या शायद...
वह वहाँ था।
बस हमारी आँखें उसे पहचान नहीं सकीं।
कौन जाने?
मैं इसका उत्तर नहीं जानता।
लेकिन उस दिन से मेरे लिए बाबा नीम करौली की तस्वीर केवल एक संत की तस्वीर नहीं है।
वह मुझे याद दिलाती है कि मनुष्य की समझ जहाँ समाप्त होती है...
वहीं से शायद...
विश्वास की शुरुआत होती है।
और कभी-कभी उस विश्वास को सहारा देने के लिए भगवान को किसी बड़े चमत्कार की जरूरत नहीं पड़ती।
एक छोटा-सा कंकड़ ही काफी होता है।
~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~
रविवार, 13 सितंबर 2026
"वह कंकड़" बाबा नीम करोडी से सम्बंधित एक सत्य घटना
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