🌙 चन्द्रमा की विनम्रता
एक समय की बात है — जब देवता और असुर, दोनों ही शक्तिशाली थे,
पर आपस में मतभेद भी थे। फिर भी एक काम ऐसा था
जो अकेले कोई नहीं कर सकता था —
समुद्र मंथन।
मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया,
और वासुकी नाग को रस्सी।
देव एक ओर, असुर दूसरी ओर —
और समुद्र मंथन शुरू हुआ।
समुद्र गर्जने लगा…
लहरें ऊपर उठीं…
और ऐसा लगा जैसे कोई
विशाल ब्रह्माण्डीय चक्की घूम रही हो!
मंथन से एक-एक कर
अद्भुत रत्न, दिव्य वस्तुएँ और शक्तियाँ बाहर आने लगीं।
तभी —
नीले प्रकाश की शीतल किरणों के साथ
एक सुन्दर, शांत, दिव्य रूप प्रकट हुआ —
चन्द्रमा।
उसकी चाँदी जैसी चमक
समुद्र की लहरों पर नाच रही थी।
देवता चकित होकर बोले —
“कितना उज्ज्वल! कितना सुंदर!”
असुर बोले —
“यह तो आकाश का रत्न है!”
सब उसकी प्रशंसा करने लगे —
पर चन्द्रमा शांत था… विनम्र… सरल।
उसने सिर झुकाकर कहा —
“यह सौंदर्य… यह प्रकाश… मेरा नहीं।
सब भगवान शिव की कृपा है।”
वह बोला —
“मैं जो चमकता हूँ…
वह मेरी शक्ति नहीं —
उनकी कृपा है।”
देव और असुर — दोनों ही स्तब्ध थे।
इतना सौंदर्य…
इतनी प्रशंसा…
फिर भी अभिमान नहीं।
तभी भगवान शिव प्रकट हुए।
उन्होंने प्रेमभरी मुस्कान के साथ कहा —
“चन्द्रमा, तुम्हारी विनम्रता
तुम्हारी सबसे बड़ी ज्योति है।”
“जो अपने गुणों का घमंड नहीं करता —
वही सच्चा महान होता है।”
शिवजी ने वरदान दिया —
“तुम मेरे मस्तक पर विराजोगे,
और संसार को शांति, प्रकाश और शीतलता दोगे।”
चन्द्रमा ने folded hands में कहा —
“प्रभु, यदि आपकी अनुमति हो…
तो मैं मनुष्यों को भी कुछ देना चाहता हूँ।”
“रातों को उजाला दूँगा,
यात्रियों को राह दिखाऊँगा,
और बच्चों के सपनों में
चाँदनी बरसाऊँगा।”
शिव मुस्कराए —
“यही तुम्हारी सच्ची भक्ति है —
दूसरों के लिए उपयोगी बनना।”
उस दिन से —
चन्द्रमा शिव के मस्तक का अलंकार बन गया,
और आकाश का प्रकाश भी।
रात जब शांत होती है,
हवा धीमे से बहती है,
और लोग ऊपर देखते हैं —
तो चाँद उन्हें याद दिलाता है —
“सौंदर्य से बड़ी शक्ति — विनम्रता की होती है।”
“जो ज्ञान और कृपा को अपना मानता है — वही वास्तव में उज्ज्वल होता है।”
🎯 शिक्षाप्रद सीख (बच्चों के लिए)
✔️ सुंदरता का घमंड नहीं करना चाहिए
✔️ सफलता का श्रेय गुरु / ईश्वर / सहयोग को देना चाहिए
✔️ विनम्रता व्यक्ति को और महान बनाती है
✔️ सच्ची चमक — वह है जो दूसरों के काम आए
✔️ ज्ञान और गुण — बाँटने से बढ़ते हैं
