🌿 धैर्य के बीज
हरे-भरे खेतों वाला एक गाँव था, जहाँ किसान रामू हर साल प्रेम से अपनी फ़सल उगाता था।
लेकिन इस बार उसके मन में अधीरता भरी थी —
वह चाहता था कि बीज जल्दी से जल्दी उग आएँ।
वह सुबह-शाम खेत में जाता…
कभी ज़्यादा पानी डालता…
कभी मिट्टी कुरेदकर देखता कि अंकुर निकले या नहीं।
वह खुद से बुदबुदाता —
“इतना पानी, इतनी मेहनत… फिर भी बीज दिख क्यों नहीं रहा?”
उसे देख उसकी बेटी लक्ष्मी बोली —
“पिताजी, बीज पर गुस्सा मत करिए… उसे समय दीजिए।”
रामू ने थके स्वर में कहा —
“लक्ष्मी, मैं तो हर दिन कोशिश कर रहा हूँ… फिर भी कुछ नहीं हो रहा।”
लक्ष्मी घुटनों के बल मिट्टी पर बैठी और प्यार से बोली —
“पिताजी, बीज बाहर नहीं उगता…
सबसे पहले वह मिट्टी के अंदर जड़ें फैलाना सीखता है।
वह हमें दिखाई नहीं देता —
पर उसका विकास शुरू हो चुका होता है।”
रामू चुप हो गया।
लक्ष्मी आगे बोली —
“ज़मीन को हवा चाहिए…
मिट्टी को खाद चाहिए…
बीज को नमी चाहिए…
और किसान को — धैर्य।”
वह मुस्कराई —
“बार-बार मिट्टी खोदेंगे…
तो जड़ें टूट जाएँगी।
बीज को भरोसा चाहिए… संदेह नहीं।”
यह बात रामू के दिल में उतर गई।
उसने मिट्टी को ढीला किया,
खाद मिलाई,
पानी नियमित मात्रा में दिया।
इस बार वह रोज़ मिट्टी नहीं कुरेदता था —
बस आसमान देखता…
बादलों की चाल समझता…
और इंतज़ार करता।
कुछ दिन बीते…
फिर कुछ हफ़्ते…
एक सुबह सूरज की किरणें पड़ीं —
और मिट्टी से नन्हा-सा हरा अंकुर झाँक उठा।
रामू की आँखें चमक उठीं।
वह बोला —
“इतना छोटा… पर इतना मजबूत!”
लक्ष्मी बोली —
“पिताजी, यही प्रकृति का नियम है —
जितनी गहरी जड़… उतना ऊँचा वृक्ष।”
समय बीतता गया…
अंकुर पौधा बना…
पौधा वृक्ष…
और कुछ वर्षों बाद
वही बीज एक विशाल छायादार पेड़ बन गया।
अब उस पेड़ के नीचे
पक्षी घोंसले बनाते…
बच्चे खेलते…
यात्री विश्राम करते।
लक्ष्मी ने मुस्कराकर कहा —
“देखिए पिताजी —
बीज ने हमें क्या सिखाया?”
रामू ने शांत स्वर में कहा —
“कि मेहनत ज़रूरी है…
पर परिणाम का समय प्रकृति तय करती है।
धैर्य — ही सच्ची ताकत है।”
उसने वृक्ष को प्रणाम किया।
✨ अंतिम संदेश
👉 हर सपने का भी एक मौसम होता है।
👉 हर प्रयास को जड़ें फैलाने का समय चाहिए।
👉 जो धैर्य रखता है — वही सच्ची सफलता पाता है।
धैर्य का बीज जब विश्वास की मिट्टी में बोया जाए…
तो वह जीवन का सबसे बड़ा वृक्ष बन जाता है।
