शनिवार, 27 दिसंबर 2025

गौरैया का रहस्य

 


गौरैया का रहस्य

हरे-भरे खेतों से घिरे एक छोटे से गाँव में एक पुराना आम का पेड़ था। उसी पेड़ पर एक नन्ही, चंचल गौरैया रहती थी। उसका रंग भूरा था, पर उसकी आँखें सुबह की ओस की तरह चमकती थीं।

हर सुबह जब स्कूल की घंटी बजती, बच्चे पेड़ के नीचे थोड़ा दाना डालते और मिट्टी के बर्तन में पानी भरते थे। थोड़ी ही देर में कई पक्षी वहाँ आने लगते — लाल चोंच वाले तोते, चमकीली मैना, मोटे कबूतर और नन्ही सी गौरैया।

लेकिन गौरैया बाकी पक्षियों की तरह पहले दाने नहीं चुगती थी। वह शांति से एक ओर खड़ी रहती, जब सब खा लेते, तो वह कुछ दाने अपनी छोटी चोंच में भरकर उड़ जाती — हमेशा उसी दिशा में, पुराने कुएँ के पीछे वाले झाड़ियों की ओर।

एक दिन बच्चों ने सोचा, "ये गौरैया रोज़ ऐसा क्यों करती है?"
किसी ने कहा, "शायद अपने लिए दाने छिपाती होगी।"
दूसरे ने कहा, "नहीं, कुछ तो रहस्य है इसमें!"

अगले दिन सबने चुपचाप उसका पीछा किया। जब वह झाड़ियों के पीछे पहुँची, बच्चों ने झाँककर देखा — और उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।

गौरैया कुछ छिपा नहीं रही थी! वह तो घायल पक्षियों को खाना खिला रही थी — एक टूटी पंख वाली कबूतर, कुछ छोटे-छोटे बुलबुल के बच्चे जो उड़ नहीं सकते थे, और एक डरी–सहमी गिलहरी, सब वहीं बैठे थे। गौरैया प्यार से सबको दाने खिला रही थी।

बच्चों का मन भर आया। इतनी छोटी चिड़िया, पर दिल कितना बड़ा!

अगले दिन से बच्चों ने भी मदद शुरू की। वे झाड़ियों के पास और दाने रखते, कुछ फल लाते और घायलों के लिए छोटी लकड़ी की झोपड़ी बना दी। धीरे-धीरे वह जगह पक्षियों और बच्चों की प्यारी जगह बन गई — हर सुबह वहाँ चहचहाहट और खुशियों की गूंज रहने लगी।

गाँव वाले भी यह बदलाव देखकर हैरान हुए। जब बच्चों ने उन्हें गौरैया का रहस्य बताया, तो सबने तय किया कि अब वे भी हर दिन पक्षियों और जानवरों के लिए थोड़ा भोजन और पानी रखेंगे।

धीरे-धीरे गाँव की हवा में करुणा और प्रेम घुल गया। सबके चेहरों पर मुस्कान थी — और यह सब एक छोटी-सी गौरैया की निःस्वार्थ दया से शुरू हुआ था।

उस रात, जब बच्चे सितारे देख रहे थे, उनकी शिक्षिका ने कहा —
“बच्चो, दया हमेशा शोर नहीं करती। कभी–कभी वह चुपचाप काम करती है — गौरैया के पंखों की तरह — लेकिन उसकी गूँज हमेशा सुनाई देती रहती है।”

नीति: दयालुता अक्सर मौन में काम करती है, पर उसकी गूंज हमेशा बनी रहती है।

ज्ञान का दीपक








 ज्ञान का दीपक 

पहाड़ों से घिरी एक शांत घाटी में कावी नाम का एक बालक रहता था। न घर, न परिवार — बस एक बेचैन मन और खोजती हुई निगाहें। वह गाँव-गाँव घूमकर छोटे-मोटे काम करता और पेट भर लेता, पर उसकी असली भूख रोटी की नहीं थी — वह जीवन का अर्थ जानना चाहता था।

वह अकसर सोचता —
“लोग उजाले का पीछा तो करते हैं, पर अपने भीतर के अंधेरे से क्यों डरते हैं?”

एक दिन थककर वह एक पुराने, जर्जर मंदिर के आँगन में बैठ गया। दीवारों पर गहरी दरारें थीं, बेलें लटक रही थीं, और धूल ने सब कुछ फीका कर दिया था। बैठने की जगह साफ़ करते समय उसका हाथ किसी धातु से टकराया। मिट्टी हटाई तो वहाँ एक पुराना पीतल का दीपक था — धूल, मकड़ी के जाल और समय से ढका हुआ।

कावी ने अपने फटे दुपट्टे से उसे धीरे-धीरे साफ़ किया। जैसे ही उसकी हथेलियाँ दीपक पर फिरीं, उसमें एक सुनहरी लौ प्रज्ज्वलित हो उठी। मंदिर का अंधकार सहसा पीछे हट गया। वह चकित था — इस लौ में एक अनकही शांति और गहरी शक्ति थी।

उस रात वह दीपक साथ लेकर चला। राह उजली थी, और उसे लगा मानो उसे अपना सच्चा साथी मिल गया हो। वह बोला —
“अब मैं कभी अंधेरे में नहीं रहूँगा।”

परन्तु घने जंगल में प्रवेश करते ही कोहरा छा गया। हवा तेज़ हुई और दीपक की लौ डगमगाने लगी। प्रकाश इतना मंद हो गया कि पाँव तले का रास्ता भी मुश्किल से दिख रहा था। क्रोध और निराशा में कावी बोला —
“तेरी रोशनी का क्या अर्थ, यदि अंधेरे में तू स्वयं ही बुझने लगे?”

वह पास बहती एक पतली जलधारा के किनारे बैठ गया। पानी में दीपक की काँपती परछाईं उसे अपने ही भीतर के भ्रम जैसी लगी। तभी उसके मन में एक विचार कौंधा —
“शायद दोष रोशनी का नहीं… मेरी समझ का है।”

सुबह होते ही वह फिर उसी मंदिर लौटा। वहाँ एक वृद्ध पुजारी शांत भाव से बैठे थे। उन्होंने मुस्कराकर कहा —
“लगता है, तुम्हें बुद्धि का दीप मिल गया है।”

कावी चकित होकर बोला —
“पर यह तो रात में मेरा साथ भी नहीं दे पाया।”

पुजारी ने मृदु स्वर में कहा —
“पुत्र, केवल प्रकाश पर्याप्त नहीं होता।
यदि मन अंधा हो, तो दीप भी मार्ग नहीं दिखाता।
प्रकाश केवल दिखाता है —
पर बुद्धि बताती है कि चलना किस ओर है।”

उन बातों ने कावी को भीतर तक झकझोर दिया।

अब वह फिर यात्राओं पर निकला — पर इस बार जिज्ञासा के साथ संयम, और खोज के साथ समझ
वह किसानों से बीज के धैर्य को समझता, बढ़इयों से समय और सटीकता सीखता, यात्रियों से दूर देशों के अनुभव सुनता।
जैसे-जैसे वह सीखता और बाँटता गया, दीपक की लौ धीरे-धीरे स्थिर और उज्ज्वल होती गई।

सालों बाद, कावी ने उसी गाँव में मंदिर के पास एक छोटा विद्यालय बनाया। हर शाम वह पुराना दीपक जलाता और बच्चों से कहता —
“इस दीप की लौ से अपनी बाती जलाओ —
ज्ञान बाँटो, ताकि यह प्रकाश जीवित रहे।”

धीरे-धीरे मंदिर में सैकड़ों दीप जलने लगे।
पर आश्चर्य — पुराना दीपक बुझा नहीं…
उसकी लौ और तेज़, और प्रखर हो गई।

कावी मुस्कुराया और बोला —
“प्रकाश बाँटने से घटता नहीं —
और बुद्धि भी वैसी ही है…
जितनी बाँटो, उतनी बढ़ती जाती है।”

लोगों ने उस स्थान को नाम दिया —
“दीप-ज्ञान मंदिर”
वह मंदिर जहाँ दीप केवल उजाला नहीं देता था — दिशा भी देता था

और वहाँ आने वाला हर यात्री यह सीख लेकर लौटता —
“प्रकाश रास्ता दिखाता है,
पर बुद्धि सिखाती है कि चलना कैसे है।”


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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

कक्कू का कुआं




 वैसे तो उसका नाम गोवर्धन सिंह था, लेकिन बड़े भाइयों के बच्चे उसे कक्कू कहकर बुलाते थे। यह नाम उसके साथ ऐसा चिपक गया कि मोहल्ले के सारे बच्चों के साथ‑साथ उसके अपने बच्चे भी उसे कक्कू कहकर पुकारते थे। अब पूरे गाँव में वह कक्कू के नाम से ही लोकप्रिय था।

लगभग छह फुट लंबे कक्कू की आँखें जैसे बोलती थीं, लेकिन शर्म से हमेशा झुकी रहती थीं। शरीर हष्ट‑पुष्ट था, पर बेतरतीब बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी के कारण चेहरे पर अजीब‑सी रिक्तता और दरिद्रता का आभास होता था। यह बात सही भी थी — गरीबी जैसे उसे वरदान में मिली थी।

जाने कितने काम‑धंधे उसने आज़माए, लेकिन कभी फायदा नहीं हुआ। हमेशा अपनी पूँजी गंवा बैठता। आखिर किस्मत, बुरी संगत और जल्दी पैसे कमाने की लालसा ने उसे जुआरी बना दिया। कोड़ी खेलने में माहिर कक्कू छह कौड़ी फेंकता था। जुए की लत ने उसे एड़ी से चोटी तक कर्जदार बना दिया था। खेत, टपरिया और पत्नी के गहने सब बिक चुके थे, फिर भी जुए की आदत नहीं छूटी थी। उसे विश्वास था कि कभी न कभी उसकी किस्मत ज़रूर बदलेगी। कई‑कई दिन तक उसका कुछ अता‑पता नहीं रहता; कभी इस गाँव तो कभी उस गाँव, वह दूर‑दूर तक जुआ खेलने जाया करता था। उसके इन कारनामों ने उसकी पत्नी और बच्चों की ज़िंदगी बदहाल कर दी थी। घर में फाँकों की नौबत आ गई थी। बच्चों की पढ़ाई तो छोड़िए, दो समय का खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया था।

उसकी पत्नी बहुत सुशीला स्त्री थी। सब कुछ बर्दाश्त कर लेती थी, किंतु अपनी परेशानियाँ कभी भी अपने मायके या गाँव में किसी से नहीं बताती थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह पति से भी झगड़ती नहीं थी। कक्कू की पत्नी होने की वजह से मोहल्ले के लड़के‑लड़कियाँ उसे भी कक्कू की चाची कहते थे।

वह सिलाई, कढ़ाई और बुनाई में निपुण थी। किसी का स्वेटर एक बार देख ले तो तुरंत बुनाई शुरू कर देती थी। क्रोशिया पर तो उसका हाथ ऐसा चलता था कि देखने वाले दंग रह जाते थे। गाँव भर की शादी योग्य लड़कियाँ उसे घेरे रहती थीं ताकि ससुराल जाकर अपना हुनर दिखा सकें। किसी को सिलाई सीखनी होती थी, किसी को बुनाई, तो किसी को क्रोशिया में हाथ साफ करना होता था।

लेकिन इन सब से पेट कहाँ भरता है! मोहल्ले वालों से उनकी स्थिति छिपी नहीं थी। इसलिए कक्कू की चाची मोहल्ले वालों के छोटे‑मोटे काम भी करती रहती थी — किसी के लिए सत्तू पीस देती, किसी का बेसन, किसी के मसाले, किसी की साड़ी में फाल लगाती या किसी का ब्लाउज सिल देती। इन कामों के बदले कुछ न कुछ मिल जाता था, पर इतना नहीं कि बच्चों का पेट आराम से भर सके।

जब वह घर में किसी के सत्तू पीस रही होती, तो बच्चे ललचाई निगाहों से देखते और जमीन पर गिरे हुए दाने उठाकर खाते। तब उसका कलेजा मुँह को आ जाता, लेकिन फिर भी वह सोचती — “जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे।”

बच्चे मोहल्ले के किसी न किसी घर से प्रतिदिन मट्ठा माँगकर लाते, यही उनका सुबह का नाश्ता होता। कभी कुछ न मिलता तो वह बाजरा उबालकर उसके पानी से बच्चों का पेट भर देती। उस समय बांग्लादेश युद्ध चल रहा था, महँगाई आसमान पर थी और मोटे अनाज तक की भारी किल्लत थी।

मोहल्ले की किसी स्त्री के यहाँ पूजा का उद्यापन होता, तो उनके बच्चों को कन्या और लंगूर के रूप में खाने के लिए बुलाया जाता। कोई स्त्री अगर सुहागिनों को खिलाने का व्रत तोड़ती, तो कक्कू की चाची को अवश्य आमंत्रित करती और घर ले जाने के लिए भी कुछ न कुछ दे देती, ताकि इसी बहाने परिवार का पेट कम से कम एक दिन तो भर सके।

समय हर किसी की हर कदम पर परीक्षा लेता है, लेकिन शायद गरीब की परीक्षा सबसे कठिन होती है। कक्कू की चाची को मलेरिया हो गया और उन्होंने चारपाई पकड़ ली। बच्चों पर हर तरफ से मुसीबत टूट पड़ी। संयोग से उसी दिन कक्कू घर आ गया, लेकिन घर में पानी तक नहीं था।

कुएँ से पानी निकालकर लाता भी कौन? चाची बीमार थीं और बच्चे इतने बड़े नहीं थे कि पानी निकाल सकें। चाची ही रोज़ सुबह‑सुबह चादर ओढ़कर, घूँघट निकालकर पानी भर लाती थीं। उस दिन कक्कू ने भी सहृदयता दिखाई — या मजबूरी में ही सही — पानी लेने के लिए वह बाल्टी लेकर कुएँ पर गया।

गाँव में एक ही कुआँ था। कुआँ क्या, छोटी‑सी कुइयाँ थी और एक बार में केवल एक ही व्यक्ति पानी निकाल सकता था। इसलिए अक्सर पानी भरने वालों की लंबी कतार लग जाती और पानी लाने में घंटों लग जाते।

कक्कू का यह नया अनुभव था। वह भी कतार में खड़ा हो गया, लेकिन हद तो तब हो गई जब एक घंटे इंतजार के बाद उसका नंबर आने ही वाला था। मोहल्ले की जो लड़की पानी भर रही थी, वह केवल एक घड़ा और एक बाल्टी लेकर आई थी। जैसे ही वह घड़ा भरती, उसकी बहन दूसरा खाली घड़ा लाकर रख देती और भरा हुआ घड़ा लेकर चली जाती। यह क्रम एक घंटे तक चलता रहा। जब यह कक्कू को असहनीय हो गया, तो वह पैर पटकते हुए खाली बाल्टी लेकर घर लौट आया और खड़े‑खड़े बाल्टी फेंक दी।

इतना संकेत परिवार के लिए बहुत था। बच्चे दुबक गए और पत्नी भीषण बुखार के बाद भी चारपाई से उठकर आ गई और पूछा — “क्या हुआ?” लेकिन कक्कू ने कोई जवाब नहीं दिया, बस फावड़ा उठाकर घर से बाहर चला गया। इतने दिन बाद पति घर आया और उसे पानी भी नहीं मिला — यह सोचकर चाची मन ही मन बहुत आहत हो रही थीं। बाहर आकर देखा तो कक्कू घर के सामने कुछ दूर पर खुदाई कर रहा था।

चाची ने तेज बुखार के बाद भी हिम्मत करके चादर ओढ़ी, घूँघट निकालकर कुएँ से पानी भर लायी और पानी लेकर कक्कू को पिलाने गई। लेकिन कक्कू ने साफ कह दिया कि वह अपना खुद का कुआँ खोदकर ही पानी पिएगा। चाची ने बहुत अनुरोध किया, पर वह नहीं माने।

कहावत है कि जवान आदमी अगर धरती पर ठीक से पैर पटक दे तो पानी निकल आता है। और कक्कू तो फावड़ा लेकर पूरी लगन से जुटा हुआ था। देर रात तक खोदता रहा। शायद रात ठीक से नींद भी नहीं आई, इसलिए सुबह तड़के ही फिर खुदाई शुरू कर दी। कहा जाता है कि मेहनत का फल मीठा होता है, और कक्कू ने शायद पहली बार दृढ़ संकल्प के साथ मेहनत से कोई काम किया था।

दूसरे दिन दोपहर बाद कक्कू द्वारा खोदे जा रहे कुएँ में पानी निकल आया। यह उसके लिए बहुत संतोष की बात थी, लेकिन उससे भी ज्यादा संतोष उसकी पत्नी को था — क्योंकि उसके पति ने पहली बार इतनी लगन और कड़ी मेहनत से अकेले दम पर इतना बड़ा काम किया था।

मोहल्ले के बच्चे इकट्ठे हो गए, जश्न का माहौल बन गया। अपने‑अपने घर से जो भी हो सका — गुड़, बताशा, गुड़धानी आदि ले आए और खुशी का आदान‑प्रदान किया गया। मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाएँ भी आ गईं और कक्कू को गुड़ खिलाकर आशीर्वाद दिया। सभी बहुत खुश थे क्योंकि मोहल्ले में पहली बार कोई कुआँ खोदा गया था, जिससे सबको बहुत फायदा होने वाला था।

जवान लड़कियाँ इसलिए खुश थीं कि कुएँ पर आते‑जाते शोहदों की छींटाकशी से मुक्ति मिल जाएगी और समय भी बचेगा। मोहल्ले के कुछ बड़े बुजुर्ग भी आ गए और सभी ने कक्कू की बहुत तारीफ की। थोड़ी देर के लिए सब भूल गए कि कक्कू एक जुआरी है। ढोलक आ गई और देर रात तक महिलाएँ लालटेन की रोशनी में देवी गीत और भजन गाती रहीं।

कक्कू को पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत की लोग इज्जत करते हैं। बहुत दिनों बाद रात में उसे बहुत अच्छी नींद आई।

कुएँ को पक्का कराने की उधेड़बुन उसके दिमाग में चल ही रही थी कि तभी अचानक एक घटना हुई। कक्कू को पकड़ने के लिए पुलिस आ गई। पुलिस ने बताया कि कक्कू के नाम रिपोर्ट दर्ज कराई गई है कि उसने दूसरे की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है और अब वहाँ कुआँ खोद रहा है। रिपोर्ट लिखाने वाला कोई और नहीं, उसका पड़ोसी महतो था। उनके अनुसार जिस ज़मीन पर कुआँ खोदा गया है, वह उनकी है।

पुलिस के आने से कक्कू के बच्चे रोने लगे और मोहल्ले में सन्नाटा छा गया। किसी को असलियत मालूम नहीं थी। ज़्यादातर लोग समझ रहे थे कि कक्कू को जुआ खेलने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। कोई भी पड़ोसी, यहाँ तक कि उसके अपने वंश परिवार के लोग भी सामने नहीं आए। पुलिस कक्कू को पकड़कर ले गई।

कक्कू की चाची पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गरीबी की हजार मुसीबतें होती हैं, कभी भी, कहीं से भी आ सकती हैं। अब क्या करें? कहाँ जाएँ? कौन उनकी सहायता करेगा? उन्हें लगा कि बिट्टी बुआ ही मदद कर सकती हैं। इसलिए बिना समय गँवाए, चादर ओढ़कर और बच्चों की उँगली पकड़कर वह बिट्टी बुआ के पास पहुँच गईं। बुआ के पाँव पकड़कर रो‑रोकर सारी आपबीती सुना दी।

बुआ ने उसे आश्वासन दिया कि कक्कू को कुछ नहीं होगा, वह उसे पुलिस से छुड़ाकर लाएँगी। बिट्टी बुआ ने अपने भतीजे को बुलाया और आदेश दिया कि जाकर कक्कू की ज़मानत करवा लाओ। जो भी पैसा खर्च हो, उसकी चिंता मत करो।

बिट्टी बुआ, जैसा कि नाम से मालूम होता है, इसी गाँव की बेटी थीं और बाल विधवा थीं। बचपन में ही शादी हो गई थी और 13–14 साल की उम्र में गौना हो गया था। उनके पहुँचते ही पति को बड़ी माता निकली और उसे अपने साथ ले गई। सास‑ननद ने जीना दुश्वार कर दिया। बात‑बात पर ताने मारे जाते कि उसने अपने पति को खा लिया।

एक दिन जब बात बर्दाश्त से बाहर हो गई तो बिट्टी ने आपा खो दिया और रसोई से बबूल की मोटी लकड़ी उठाकर सास और ननद की जमकर धुनाई कर दी। फिर अपनी जान बचाने के लिए मायके की तरफ दौड़ पड़ी। मायका इतना नज़दीक नहीं था, रास्ते में रात हो गई। तब बिट्टी ने यह सोचकर कि मनुष्य रूपी जानवरों से जंगली जानवरों के साथ रात बिताना ज़्यादा सुरक्षित होगा, जंगल में एक पेड़ पर चढ़कर रात गुज़ारी। सुबह होते ही फिर दौड़ पड़ी और अपने घर पहुँचकर ही दम लिया।

पिता के गले लगकर रोते‑रोते सारी आपबीती सुना दी। पिता बहुत दुखी हुए और बोले कि बिट्टी अब यहीं रहेगी। उन्होंने अपनी खेती से एक हिस्सा बिट्टी के नाम कर दिया। वह दिन और आज का दिन — बिट्टी उस गाँव में रहते‑रहते जीजी और फिर बुआ बन गईं। पिता और बड़े भाई अब दुनिया में नहीं थे, पर वह अपने दोनों भतीजों के साथ रहती थीं और अपने घर की मुखिया थीं। गाँव में भी लोग उनकी उम्र और नेक नियति का बहुत सम्मान करते थे। कोई भी उनकी बात टालने की हिम्मत नहीं करता था।

जीवन ने उन्हें जो दर्द दिया, उसी का मरहम बनाकर वह गाँव की महिलाओं को अक्सर लगाती थीं। गाँव की बहुओं का खासा ध्यान रखती थीं। सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की पूजा हो, होली, दिवाली, तीज‑त्योहार — हर अवसर पर वह उनके लिए कुछ न कुछ ज़रूर करती थीं।

गाँव की बहुओं का वह खासा ध्यान रखती थीं। सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की पूजा हो, होली, दिवाली, तीज‑त्योहार — किसी भी अवसर पर वह उनके लिए कुछ न कुछ ज़रूर करती थीं।

बिट्टी बुआ के बीच में पड़ने से कक्कू की ज़मानत हो गई और पुलिस ने यह भी कह दिया कि अगर आपस में समझौता हो जाए तो रिपोर्ट बंद कर दी जाएगी। कक्कू घर आ गया और दूसरे दिन समझौते के लिए पंचायत बैठी। पंचायत में तय हुआ कि कक्कू कुआँ पाट देगा और महतो की ज़मीन खाली कर देगा। पुलिस कार्यवाही में महतो द्वारा खर्च किए गए ₹2000 भी कक्कू हर्जाने के रूप में देगा। यह कक्कू के परिवार के लिए और भी बड़ी मुसीबत थी।

कक्कू की चाची दौड़कर फिर बुआ के पास गईं। बिट्टी बुआ ने जब सुना तो उनकी त्योरियाँ चढ़ गईं और वह छड़ी के सहारे पंचायत में पहुँच गईं। बुआ को देखते ही पंच खड़े हो गए।

बुआ ने कहा — “मैंने तो सुना था कि पंच परमेश्वर होते हैं, लेकिन तुम लोगों के फैसले से तो ऐसा लगता है कि तुम लोग इंसान भी नहीं हो।”

कक्कू की तरफ इशारा करते हुए बोलीं — “इसे देखो, अपने कर्मों से इसने अपने घर को नर्क बना दिया है। इसकी पत्नी और बच्चों को भरपेट खाना भी नहीं मिलता। इसकी बहू पतिव्रता और सुलक्षणा है, गाँव भर की लड़कियों को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई सहित गृहस्थी का ज्ञान बाँटती है। तुम्हारी बहनें और बेटियाँ अपनी‑अपनी ससुराल में इससे हुनर सीखकर जाती हैं। ज़रा उनसे भी पूछो कि तुम लोगों ने इसे क्या सज़ा दी है। जो जुर्माना तुम कक्कू पर लगा रहे हो, वह कक्कू पर नहीं, उसकी बहू और बच्चों पर लगा रहे हो। जो लोग अपना पेट नहीं भर सकते, वे तुम्हारा जुर्माना कहाँ से भरेंगे?”

बुआ के पंचायत में पहुँचने की खबर जंगल में आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई। बहुत‑सी महिलाएँ दूर से पंचायत की कार्यवाही देखने पहुँच गईं — कोई घूँघट की ओट से, कोई दरवाज़े के पीछे से, कोई छतों के ऊपर से। बिट्टी बुआ लगातार बोलती जा रही थीं —

“जिस अपराध की सज़ा तुम लोग कक्कू को दे रहे हो, वह तो अपराध है ही नहीं। इतने बड़े गाँव में एक छोटा‑सा कुआँ है। किसी ने यहाँ की ज़रूरत पर ध्यान नहीं दिया। पंचों को तो खुश होना चाहिए कि गाँव में एक और कुआँ बन गया है। जो काम चार मज़दूर एक हफ्ते में करते, वह काम अकेले कक्कू ने केवल दो दिन में कर दिया है। तुम लोगों को तो उसे शाबाशी देनी चाहिए थी, लेकिन तुम लोग उसे सज़ा दे रहे हो। तुममें से कौन है जो दो दिन में कुआँ खोद सके?”

“इस गाँव में एक और कुएँ की सख्त आवश्यकता है। जो काम पंच और पंचायत नहीं कर सके, वह कक्कू ने अपने दम पर करके दिखा दिया। तुम लोगों को नहीं मालूम कि कितनी परेशानी होती है गाँव की लड़कियों और औरतों को। दो बाल्टी पानी के लिए एक‑एक घंटा बर्बाद होता है कुएँ पर, ऊपर से गाँव के शोहदे लड़कियों और औरतों पर फब्तियाँ कसते हैं। महतो! तुमने तो कक्कू के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाई। कुएँ पर जाते समय तुम्हारी बहुरिया के साथ गाँव के मनचले रोज़ छेड़खानी करते हैं। कितनों के खिलाफ तुमने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई आज तक? कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी बहू उसी कुएँ में गिरकर जान दे दे या किसी के साथ भाग जाए।”

“तुम्हारे घर के सामने कुआँ बन जाएगा तो तुम्हारी बहुरिया रोज़‑रोज़ की छेड़खानी से बच जाएगी। लेकिन तुम कुआँ पाटने की बात करते हो। इससे लगता है कि तुम भी मनचलों का साथ दे रहे हो।”

पंचों पर घड़ों पानी पड़ गया और महतो की हालत तो ऐसी हो गई कि उसके घर में ही उसकी इज्ज़त तार‑तार हो गई। लेकिन बिट्टी बुआ यहीं नहीं रुकीं, बोलती रहीं।

“सभी लोग कान खोलकर सुन लें — यह कुआँ नहीं पटेगा। अगर महतो को चाहिए तो जुर्माना भी मैं भरूँगी, ज़मीन की कीमत भी मैं दूँगी और इस कुएँ को पक्का भी मैं ही करवाऊँगी ताकि गाँव की लड़कियों और औरतों को इसका फायदा मिले। पंचों ने जुर्माना तय कर दिया है, अब पंचों को चाहिए कि वे ज़मीन की कीमत भी तय कर दें ताकि मैं उसका भुगतान महतो को कर दूँ।”

इससे पहले कि पंच कुछ कहते, महतो खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला — “बुआ, मुझे माफ़ कर दो। मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप जैसा चाहें वैसा करें।”

पंचों के पास अब कुछ करने को नहीं बचा था। महतो ने फैसले की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी।

बिट्टी बुआ ने आगे कहा — “लेकिन कक्कू को सज़ा तो अवश्य मिलनी चाहिए और मिलेगी भी।”

यह सुनकर कक्कू और उसकी पत्नी दोनों सशंकित हो उठे कि एक मुसीबत टली नहीं कि दूसरी आ गई।

“पिछले काफी लंबे समय से कक्कू ने अपनी पत्नी और बच्चों का ध्यान नहीं रखा। परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया, जिससे उसकी पत्नी और बच्चों को अनावश्यक रूप से अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। कुआँ का निर्माण पूरा हो जाने के बाद कक्कू मेरे यहाँ हरवाहे (खेतों में हल चलाने वाला) का काम करेगा, गाय और बैलों की चारा‑पानी करेगा। बदले में उसे भोर का चबेना और दोपहर की खुराक मिलेगी। उसकी बहू को 150 रुपये महीना तनख्वाह मिलेगी ताकि घर का खर्चा चल सके और बच्चों की पढ़ाई‑लिखाई भी हो सके। कक्कू को जब कभी इससे अच्छी नौकरी मिले तो जा सकता है।”

“कक्कू, तुम्हें क्या यह सज़ा स्वीकार है?”

कक्कू की आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा — “हाँ बुआ, मैं करूंगा और आपको अच्छा व्यक्ति बनकर दिखाऊँगा।”

बिट्टी बुआ ने कक्कू द्वारा खोदे गए कुएँ को पक्का करवा दिया और मोहल्ले के सारे लोग इसका भरपूर इस्तेमाल करने लगे। अब न बिट्टी बुआ इस दुनिया में हैं और न ही कक्कू, लेकिन कक्कू का कुआँ आज भी है और गाँव के लिए एक बड़ा पहचान चिन्ह है।

कक्कू का बेटा सेना में काम करता था। सेवानिवृत्ति के बाद अब वह गाँव के उसी पुश्तैनी मकान में रहता है। गाँव में भी काफी परिवर्तन आ गया है। पक्की सड़क बन गई है। कस्बे के बस अड्डे से गाँव में कक्कू के कुएँ तक ऑटो और टेंपो चलते हैं। सवारियों को देखकर टेंपो वाले चिल्लाते हैं — “कक्कू का कुआँ, कक्कू का कुआँ।”



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  - शिव प्रकाश मिश्रा  © 

  मूलकृति - 15 अगस्त 2020 

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प्रकाशित - माधव भूमि २७ फरवरी २०२१ 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~Shiv Mishra~~~~~~~~~~~

वैसे तो उसका नाम गोवर्धन सिंह था, लेकिन बड़े भाइयों के बच्चे उसे कक्कू कहकर बुलाते थे। यह नाम उसके साथ ऐसा चिपक गया कि मोहल्ले के सारे बच्चों के साथ‑साथ उसके अपने बच्चे भी उसे कक्कू कहकर पुकारते थे। अब पूरे गाँव में वह कक्कू के नाम से ही लोकप्रिय था।

लगभग छह फुट लंबे कक्कू की आँखें जैसे बोलती थीं, लेकिन शर्म से हमेशा झुकी रहती थीं। शरीर हष्ट‑पुष्ट था, पर बेतरतीब बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी के कारण चेहरे पर अजीब‑सी रिक्तता और दरिद्रता का आभास होता था। यह बात सही भी थी — गरीबी जैसे उसे वरदान में मिली थी।

जाने कितने काम‑धंधे उसने आज़माए, लेकिन कभी फायदा नहीं हुआ। हमेशा अपनी पूँजी गंवा बैठता। आखिर किस्मत, बुरी संगत और जल्दी पैसे कमाने की लालसा ने उसे जुआरी बना दिया। कोड़ी खेलने में माहिर कक्कू छह कौड़ी फेंकता था। जुए की लत ने उसे एड़ी से चोटी तक कर्जदार बना दिया था। खेत, टपरिया और पत्नी के गहने सब बिक चुके थे, फिर भी जुए की आदत नहीं छूटी थी। उसे विश्वास था कि कभी न कभी उसकी किस्मत ज़रूर बदलेगी। कई‑कई दिन तक उसका कुछ अता‑पता नहीं रहता; कभी इस गाँव तो कभी उस गाँव, वह दूर‑दूर तक जुआ खेलने जाया करता था। उसके इन कारनामों ने उसकी पत्नी और बच्चों की ज़िंदगी बदहाल कर दी थी। घर में फाँकों की नौबत आ गई थी। बच्चों की पढ़ाई तो छोड़िए, दो समय का खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया था।


जाने कितने  काम  धंधे करके आजमाए लेकिन फायदा नहीं हुआ । हमेशा ही अपनी पूंजी  भी गंवा बैठता । आखिर किस्मत,  बुरी संगत  और  कुछ  जल्दी पैसे कमाने के लालच ने उसे  जुआरी बना दिया । कोड़ी खेलने में माहिर कक्कू 6 कौड़ी फेंकता  था । जुए की लत ने उसे एड़ी से चोटी तक कर्जदार बना दिया था । खेत, टपरिया और पत्नी के गहने सभी बिक चुके थे फिर भी जुए की लत नहीं  छूटी  थी । उसे विश्वास था कि कभी न कभी उसकी किस्मत जरूर बदलेगी   कई कई दिन तक उसका कुछ अता पता नहीं रहता कभी  इस गांव तो कभी  उस गांव, वह बहुत दूर-दूर तक जुआ खेलने जाया करता था । उसके इन कारनामों ने उसकी पत्नी और  बच्चों की जिन्दगी बदहाल कर दी  थी. घर में फाँकों  की नौबत आ गई थी । बच्चों की पढ़ाई तो छोड़िए दो समय खाने के ही लाले पड़ जाते थे । 


उसकी पत्नी बहुत सुशीला स्त्री थी ।   सब कुछ बर्दाश्त करती थी किंतु अपनी परेशानियां कभी भी अपने मायके और गांव  में किसी से नहीं बताती थी। सबसे बड़ी बात पट्टी से झगड़ती भी नहीं थी । कक्कू  की पत्नी होने की वजह से मोहल्ले के लड़के लड़कियां उसे भी कक्कू की चाची कहते थे।  वह सिलाई, कढ़ाई, बुनाई में निपुण थी ।एक बार किसी का स्वेटर देख ले तो बस बुनाई डाल देती थी। क्रोशिया पर तो ऐसा हाथ चलता था कि देखने वाले दंग रह जाएं।  गांव भर की शादी योग्य लड़कियां उसे घेरे रहती थी ताकि ससुराल में जाकर अपना हुनर दिखा सकें।  किसी को सिलाई सीखनी होती थी, किसी को बुनाई तो किसी को क्रोशिया में हाथ साफ करना होता था। लेकिन इस सब से पेट कहां भरता है । मोहल्ले वालों से उनकी स्थिति छिपी नहीं थी। इसलिए कक्कू की चाची मोहल्ले वालों के छोटे-मोटे काम भी करती रहती थी।  किसी के सत्तू पीस दिए तो किसी का वेसन, किसी के मसाले पीस दिए,  किसी की  साड़ी में फाल लगा दिया तो  किसी का ब्लाउज  सिल दिया। इन सब कामों के बदले कुछ न कुछ मिलता रहता था लेकिन फिर भी  वह  इतना नहीं होता था कि बच्चों का पेट  भी आराम से भर  सके। जब वह घर में किसी के सत्तू पीस रही  होती थी तो बच्चे  ललचाई  निगाहों से देखते थे, जमीन पर गिरे हुए दाने उठा उठा कर खाते थे, तब उसका कलेजा मुंह को आ जाता था लेकिन फिर भी वह हमेशा सोचती थी कि जब अच्छे दिन  नहीं रहे तो खराब दिन भी  नहीं रहेंगे। बच्चे मोहल्ले के किसी न किसी  घर से  प्रतिदिन  मट्ठा मांग कर लाते थे, यही उन तीनों  का सुबह का नाश्ता होता था। कभी अगर कुछ नहीं होता तो वह बच्चों के लिए बाजरा उबाल कर उसके पानी से बच्चों का पेट भरती । बँगला देश युद्ध का समय था, महगाई आसमान पर थी और मोटे आनाज तक की बहुत किल्लत थी.  मोहल्ले की  किसी स्त्री  के यहां भी पूजा का उद्यापन होता था तो उनके बच्चों को हर कोई बहुत याद से कन्या और लंगूर के रूप में खाने के लिए बुलाता था। कोई स्त्री अगर सुहागिनें  खिलाने का व्रत तोड़ती  तो कक्कू की चाची को अवश्य आमंत्रित किया जाता था  और घर ले जाने के लिए भी कुछ न कुछ दे दिया जाता था ताकि इसी बहाने परिवार का पेट कम से कम एक  दिन तो भर सके। 


वैसे समय हर किसी की हर कदम पर परीक्षा लेता रहता है लेकिन शायद गरीब की परीक्षा बहुत कठिन होती है। कक्कू की चाची को मलेरिया हो  गया और उन्होंने चारपाई पकड़ ली । बच्चों की तो हर तरफ से मुसीबत थी। लेकिन संयोग से कक्कू का उस दिन घर में पदार्पण हो गया लेकिन घर में पानी तक नहीं था।  कुए से  पानी निकाल कर  लाता  भी कौन कक्कू की चाची तो बीमार थी और बच्चे इतने बड़े थे नहीं कि वह पानी निकाल कर ला पाते। चाची ही मुहँ अंधेरे चादर ओढ़ कर घूँघट निकाल कर पानी भर लाती थी। आज कक्कू ने भी सहृदयता दिखाई या  मजबूरी में  ही सही पानी लेने के लिए उसे बाल्टी लेकर  कुएं  पर जाना पड़ा।


गांव में एक ही कुआं  था। कुआं  क्या छोटी से  कुइयां थी और एक बार में एक ही व्यक्ति पानी निकाल सकता था  । इसलिए अक्सर पानी भरने वालों की लंबी कतार लग जाती थी और पानी लाने में घंटों लग जाते थे। कक्कू का यह नया अनुभव था।  वह  भी कतार में आ गया  लेकिन हद तो तब हो गई जब एक घंटा इंतजार के बाद उनका नंबर आने ही वाला था लेकिन  मोहल्ले की जो  लड़की पानी भर रही थी वह  केवल एक घड़ा और एक बाल्टी  लेकर आई थी लेकिन जैसे ही वह घड़ा भरती  उसकी बहन दूसरा खाली  घड़ा लाकर  रख देती और भरा घड़ा लेकर चली जाती।  यह उपक्रम एक घंटा चलता रहा और जब यह कक्कू को असहनीय हो गया तो वह पैर पटकते हुए खाली बाल्टी लेकर घर वापस आ  गया  और खड़े खड़े बाल्टी फेंक दी। इतना संकेत परिवार के लिए बहुत था । बच्चे दुबक गए और पत्नी भीषण बुखार के बाद भी चारपाई से उठ कर आ  गई और पूछा "क्या हुआ" । लेकिन कक्कू ने जबाब नहीं दिया यह फावड़ा उठा कर घर से बाहर चले गया  ।  इतने दिन बाद पति घर आया और उसे पानी भी नहीं मिला यह सोच कर चाची मन ही मन बहुत आहत हो रही थीं ।बाहर आकर देखा तो कक्कू घर के सामने कुछ दूर पर खुदाई कर रहे थे। चाची ने तेज बुखार के बाद भी हिम्मत करके चादर ओढ़ी और घूंघट निकाल कर कुएं  से पानी निकाल लायी और पानी लेकर कक्कू को पिलाने गई। लेकिन कक्कू ने तो साफ कह दिया कि वह  अपना कुआं खोदकर ही पानी पिएंगे। चाची ने बहुत अनुरोध किया पर वह नहीं माने। 


कहावत  है कि जवान आदमी अगर धरती पर ठीक से पैर पटक दे तो पानी निकल आता है, और फिर   कक्कू तो  फावड़ा लेकर जुटे हुए थे। देर रात तक खोदते रहे। शायद रात ठीक से नींद भी नहीं आई इसलिए सुबह तड़के ही फिर खुदाई शुरू कर दी । कहा जाता है कि  मेहनत का फल मीठा होता है और फिर कक्कू ने तो शायद पहली बार इतना  दृढ़ प्रतिज्ञ  होकर मेहनत से कोई काम किया था। दूसरे दिन दोपहर के बाद  कक्कू द्वारा खोदे जा रहे कुएं में पानी निकल आया । कक्कू के लिए यह बहुत संतोष की बात थी लेकिन उससे भी ज्यादा संतोष की बात उसकी  पत्नी के लिए थी क्योंकि उसके पति ने पहली बार इतनी लगन और कड़ी  मेहनत से अकेले दम पर इतना  बड़ा काम किया था । मोहल्ले के बच्चे इकट्ठे हो गए , जश्न  का माहौल हो गया । अपने अपने घर से जिससे जो  हो सका - गुड, बताशा, गुडधानी  आदि ले आए और खुशी का आदान प्रदान किया गया  । मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाएं भी आ गई और कक्कू को गुड खिलाकर आशीर्वाद दिया। सभी बहुत खुश थे क्योंकि मोहल्ले में पहली बार कोई कुआं खोदा गया था जिससे सभी को बहुत फायदा होने वाला था।जवान लड़कियां इसलिए खुश थी कि कुँए आते जाते  शोहदों की छींटाकसी   से मुक्ति मिल जाएगी और समय भी बचेगा. मोहल्ले के कुछ बड़े बुजुर्ग भी आ गए और सभी ने कक्कू की बहुत तारीफ की, थोड़ी देर के लिए सब भूल गए कि कक्कू एक जुआरी  है.  ढोलक आ गयी और देर रात तक महिलाएं लालटेन की रोशनी में देवी गीत और भजन गाती  रही . कक्कू को पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत की लोग इज्जत करते हैं ।  बहुत दिनों बाद रात में उसे बहुत  अच्छी नींद आई।  

कुएं  को पक्का कराया जाए . उसके दिमाग में उधेड़बुन चल ही रही  थी कि तभी अचानक एक घटना हुई. कक्कू  को पकड़ने के लिए पुलिस आ गई. पुलिस ने बताया कि कक्कू के नाम  रिपोर्ट दर्ज कराई गई है कि उसने दूसरे की जमीन पर कब्जा किया है और अब वहां कुआं  खोद रहा  है।  रिपोर्ट लिखाने वाले कोई और नहीं उसका  पड़ोसी महतो हैं  और उनके अनुसार जिस जमीन पर कुआं खोदा गया है वह उनकी है. पुलिस के कारण  कक्कू के बच्चे रोने लगे लेकिन मोहल्ले में सन्नाटा छा गया । किसी को असलियत मालूम नहीं थी।  ज्यादातर लोग समझ रहे थे कि कक्कू को जुआ खेलने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है।  कोई भी पड़ोसी यहां तक कि उसके अपने वंश परिवार के लोग भी सामने नहीं आये। पुलिस कक्कू को पकड़ कर ले गई  । 


कक्कू की चाची पर तो  जैसे  दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।  गरीबी की  हजार मुसीबतें होती  हैं।  कभी भी, कोई भी आ सकती है।  अब क्या करें? कहां जाएं ? कौन उनकी  सहायता करेगा? उन्हें लगा कि बिट्टी बुआ उनकी सहायता कर सकती  हैं. इसलिए बिना कोई समय गवाएं चादर ओढ़ और  बच्चों की उंगली पकड़कर विट्टी  बुआ के पास पहुंच गई।  बुआ के पांव पकड़कर रो-रो कर सारी आप बीती सुना दी। बुआ  ने उसे आश्वासन दिया कि कक्कू को कुछ नहीं होगा वह छोड़ा कर लाएंगी उसे पुलिस से।  बिट्टी बुआ ने अपने भतीजे को बुलाया और आदेश दिया कि जाकर कक्कू की जमानत करवा करवा  लाओ । जो भी पैसा खर्च हो उसकी चिंता मत करो। 


बिट्टी बुआ  जैसा कि नाम से मालूम होता है, इसी गांव की बेटी थीं  और बाल विधवा थीं ।  बचपन में ही शादी हो गई थी और 13 - 14 साल की उम्र में गौना हो गया था।  उनके पहुंचते ही  पति को बड़ी माता निकली और उसे  अपने साथ ले गई।  सास  ननद ने जीना दुश्वार कर दिया।  बात-बात में ताने मारे जाते कि  उसने अपने पति को खा लिया। एक  दिन बात जब बर्दाश्त से बाहर हो गई तो बिट्टी ने आपा खो दिया और उसने रसोई से बबूल की मोटी लकड़ी लेकर सास और ननद की जमकर धुनाई की। फिर अपनी जान बचाने के लिए मायके की तरफ दौड़ पड़ी। मायका इतना नजदीक तो था नहीं, रास्ते में रात हो गई । तब बिट्टी ने यह सोच कर कि मनुष्य रूपी जानवरों से जंगली जानवरों के साथ रात बिता कर वह ज्यादा सुरक्षित रहेगी । इसलिए जंगल में एक पेड़ के ऊपर चढ़कर रात गुजारी। सुबह होते ही फिर दौड़ पड़ी और अपने घर पहुंच कर ही दम लिया । पिता के गले लग कर रोते-रोते सारी आप बीती सुना दी। उसके पिता भी बहुत दुखी हुए और उन्होंने कहा कि बिट्टी अब यही रहेगी और उन्होंने अपनी खेती से एक हिस्सा बिट्टी के नाम  कर दिया। वह दिन और आज का दिन, बिट्टी उस गांव में रहते रहते बिट्टी से  जीजी और फिर बुआ बन गई। पिता और बड़े भाई अभी दुनिया में नहीं थे  पर वह अपने दोनों भतीजों के साथ रहती  थीं  और अपने घर की मुखिया थीं । गांव में भी लोग उनकी उम्र और नेक नियती  का बहुत सम्मान करते थे  और कोई भी उनकी बात  टालने की हिम्मत नहीं कर सकता था । जीवन  ने  उन्हे  जो दर्द दिया  उसी का मरहम बनाकर वह गांव की महिलाओं को अक्सर लगाती थी  । गांव की बहुओं  का खासा ध्यान रखती थी , सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की  पूजा  हो, होली, दिवाली, तीज, त्यौहार कोई भी अवसर हो वह  उनके लिए कुछ न कुछ जरूर करती  थी  । 


बिट्टी बुआ के बीच में पड़ने से कक्कू की जमानत हो गई और पुलिस ने यह भी  कह दिया  कि अगर आपस में समझौता हो जाए तो वह रिपोर्ट बंद कर देगी। कक्कू घर आ गए और दूसरे दिन समझौते के लिए पंचायत  बैठी। पंचायत में तय हुआ कि कक्कू कुआं पाट  देंगे  और महतो की जमीन खाली कर देंगे। पुलिस कार्यवाही में महतो  द्वारा खर्च किए गए ₹2000 भी कक्कू हर्जाने के रूप में महतो  को देंगे।कक्कू  के परिवार के लिए  तो यह  और  भी बड़ी मुसीबत थी । कक्कू की चाची दौड़ कर फिर बुआ के पास  गई । बिट्टी बुआ ने जब सुना तो उनकी त्योरियां चढ़ गई ।  और वह छड़ी के सहारे पंचायत में पहुंच गई।  बुआ को देखते ही पंच खड़े हो गए. 


बुआ ने कहा- 


"मैंने तो सुना था कि पंच परमेश्वर होते हैं, लेकिन तुम लोगों के फैसले से तो ऐसा लगता है कि तुम लोग तो इंसान भी नहीं हो।"


कक्कू की तरफ  इशारा करते हुए कहा "इसे देखो, अपने कर्मों से इसने अपने घर को नर्क बना दिया है, इसकी  पत्नी और बच्चों को भरपेट खाना भी नहीं मिलता, इसकी बहू पतिव्रता और सुलक्षणा है, गांव भर की लड़कियों को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई सहित घर गृहस्थी  का  ज्ञान बांटती  हैं. तुम्हारी बहने और बेटियां अपनी अपनी ससुराल में इस से  हुनर सीख कर जाती  हैं, जरा उनसे भी पूछ कर देखना कि आप लोगों ने इसे  क्या सजा दी है।  जो  जुर्माना तुम कक्कू पर लगा रहे हो, वह कक्कू पर नहीं इस बहू पर लगा रहे हो, इसके बच्चों पर लगा रहे हो।  जो लोग अपना पेट नहीं भर सकते वह तुम्हारा जुर्माना कहां से भरेंगे ?"

 

बुआ के पंचायत में पहुंचने की खबर जंगल में  आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई थी, और बहुत सी महिलाएं दूर से पंचायत की कार्यवाही देखने  पहुंच गई।  कोई घूंघट की ओट से,  कोई दरवाजे के पीछे से, कोई छतों के ऊपर से।  बिट्टी बुआ लगातार बोले जा रही थी -


"जिस अपराध की सजा तुम लोग कक्कू को को दे रहे हो, वह तो अपराध है ही नहीं।  इतने बड़े गांव में एक छोटा सा कुआ है।  किसी ने यहां की जरूरत पर ध्यान नहीं दिया।  पंचों को तो खुश होना चाहिए कि  गांव में एक और कुआं बन गया है।  जो काम 4 मजदूर एक हफ्ते में करते वह काम अकेले कक्कू ने केवल 2 दिन में कर दिया है।  तुम लोगों को तो उसे शाबाशी देनी चाहिए थी, लेकिन तुम लोग उसको सजा दे रहे हो। जब तुम लोगों में  कोई ऐसा है जो 2 दिन में कुआं खोद सके ?  


इस गांव में एक और कुए  की सख्त आवश्यकता है, जो काम पंच और पंचायत नहीं कर सकी  वह कक्कू ने अपने दम पर करके दिखा दिया।  तुम लोगों को नहीं मालूम कि कितनी परेशानी होती है गांव की लड़कियों और औरतों को. दो बाल्टी पानी के लिए एक-एक घंटा बर्बाद होता है कुएं  पर, ऊपर से गांव के शोहदे लड़कियों और औरतों पर फब्तियां कसते हैं।  महतो ! तुमने  तो कक्कू के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी।   कुएं पर  जाते समय तुम्हारी बहुरिया के साथ गांव के मनचले रोज छेड़खानी करते हैं, कितनों के खिलाफ तुमने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई आजतक ? कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी बहू उसी  कुएं  में गिर के जान दे दे या किसी के साथ भाग जाए । 


तुम्हारे घर के सामने कुआं बन जाएगा तो तुम्हारी बहुरिया रोज-रोज की छेड़खानी से बच जाएगी लेकिन तुम कुआं पाटने  की बात करते हो, इससे लगता है कि तुम भी मनचलों का साथ दे रहे हो."  

पंचों पर घड़ों पानी पड़ गया और महतो की हालत तो ऐसी हो गई कि उसके घर में ही उसकी इज्जत तार-तार हो गई लेकिन बिट्टी बुआ यहीं नहीं रुकीं बोलती  रहीं।  


सभी लोग कान खोलकर सुन लें  यह कुआं नहीं पटेगा। अगर महतो को चाहिए तो  जुर्माना भी मैं भरूँगी, जमीन की कीमत भी  मैं दूंगी  और इस कुएं   को पक्का भी मैं ही करवाऊंगी ताकि गांव की लड़कियों और औरतों को इसका फायदा मिले।  पंचों ने जुर्माना तय कर दिया है अब पंचों को चाहिए कि वे जमीन की कीमत भी तय कर दे ताकि मैं उसका भुगतान महतो को कर दूं। 

 

इससे पहले कि पंच कुछ कहते महतो  तो खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला " बुआ मुझे  माफ़ कर दो, मुझे  कुछ नहीं चाहिए , आप जैसा चाहें वैसा करें "  पंचों  को अब कुछ करने के लिए नहीं बचा था।   महतो ने फैसले की कोई गुंजाइस ही नहीं छोड़ी थी।  


बिट्टी बुआ ने आगे फिर कहा " लेकिन कक्कू को सजा तो अवश्य  मिलनी चाहिए और मिलेगी भी " यह सुनकर कक्कू और उसकी पत्नी दोनों सशंकित हो उठे कि एक मुशीबत टली नहीं कि दूसरी या गई ।  

"पिछले काफी लंबे समय से कक्कू ने अपनी पत्नी और बच्चों का ध्यान नहीं रखा , परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया जिससे उसकी पत्नी और बच्चों को  अनावश्यक रूप से  अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा । कुआं का निर्माण पूरा हो जाने के बाद कक्कू मेरे यहां हरवाहे (खेतों में  हल चलाने वाला) का काम करेगा, गाय और बैलों की  चारा पानी करेगा।  बदले में उसे भोर का  चबेना  और दोपहर की खुराकी मिलेगी  और उसकी बहू को  १५० रुपया महीना तनख्वाह का  मिलेगा ताकि उसके घर का खर्चा चल सके और बच्चों की पढ़ाई लिखाई भी हो सके. कक्कू को जब कभी इससे अच्छी नौकरी मिले तो जा सकता है।   

"कक्कू  तुम्हें क्या यह सजा स्वीकार है ? कक्कू की आंखों से आंसू बह निकले, उसने कहा " हाँ बुआ  मैं करूंगा और आपको अच्छा व्यक्ति बन के दिखाऊंगा"


बिट्टी बुआ ने कक्कू द्वारा खोदे गए कुए को पक्का करवा दिया और मोहल्ले के सारे लोग इसका भरपूर इस्तेमाल करने लगे. अब न बिट्टी बुआ अब इस दुनिया में है और न हीं कक्कू लेकिन कक्कू का कुआं आज भी है और गांव के लिए एक बहुत बड़ा पहचान चिन्ह है.    कक्कू का बेटा सेना में काम करता था जो सेवानिवृत्त   के बाद अब  गांव के  उसी पुश्तैनी मकान में रहता है. गांव में भी  काफी परिवर्तन आ गया है पक्की सड़क बन गई है . कस्बे के बस अड्डे से गांव  में  कक्कू के कुआँ तक ऑटो  और टेंपू चलते हैं, सवारियों को देखकर  टेंपो वाले चिल्लाते हैं, कक्कू का कुआँ , कक्कू का कुआं। 


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  - शिव प्रकाश मिश्रा  © 

  मूलकृति - 15 अगस्त 2020 

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प्रकाशित - माधव भूमि २७ फरवरी २०२१ 



मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

स्वामी संपूर्णानंद सरस्वती

 


बद्रीनाथ मंदिर में दर्शन के बाद मन बहुत प्रसन्न था. मंदिर के गरम पानी के कुंड में नहाने जैसा  आनंद तो किसी पांच सितारा होटल के स्विमिंग पूल में भी कभी नहीं आया था. भगवान बद्री विशाल के दर्शन के बाद जैसे मन  बहुत शांत हो गया था. इसके बाद मुझे  दोस्तों के साथ व्यास व गणेश मंदिर तथा भीम पुल देखने जाना था . इसके आगे माना गांव था जो  सीमा पर भारत का आखिरी गांव था और उसके बाद चीन की सीमा प्रारंभ होती है. मंदिर के सामने से निकलते हुए  बद्रीनाथ मंदिर के कुछ  फोटो लेते हुए धीमे-धीमे आगे बढ़ रहा था कि अचानक मेरी निगाह एक सन्यासी और सन्यासिन पर पड़ी जो सामान्य सन्यासियों से सर्वथा भिन्न लग रहे थे. 

लगभग 6 फुट के स्वामी जी और 6 फुट से कुछ ही कम साध्वी. ऊपर से नीचे तक सलीके से पहने गए भगवा वस्त्र, गोरा चिटटा रंग और आकर्षक चेहरा सब मिलाकर उन दोनों के व्यक्तित्व को अत्यधिक प्रभावशाली और गरिमामयी  बना रहे थे. सन्यासी की  आंखों पर   काले - पतले फ्रेम का चश्मा, और मस्तक  पर लाल पीले चंदन का तिलक, बढे  हुए खिचड़ी बाल और बिना दाढ़ी मूछ का साफ सुथरा चेहरा. साध्वी ने बिना फ्रेम का चश्मा लगाया  था और माथे पर लाल पीले चंदन का तिलक. सिर के लगभग सफेद हो चुके बालों के साथ गंभीर और मोहक छवि. दोनों की उम्र 60 से 65 वर्ष के बीच होगी. मुझे लगा कि शायद किसी फिल्म या टीवी सीरियल की शूटिंग हो रही है, इसलिए मैं ठिठक गया और इधर उधर निगाह दौड़ाई लेकिन कहीं कुछ नजर नहीं आया. सन्यासी का चेहरा मुझे परिचित जैसा क्यों  लग रहा था? सोचा किसी धार्मिक टीवी चैनल पर प्रवचन करते देखा होगा.  लेकिन अचानक जैसे मुझे सब कुछ  याद आ रहा था और मैं तेज कदमों से उन सन्यासियों की तरफ चल पड़ा .....

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(२)

मैं और शंटी सहपाठी तो थे ही,  हॉस्टल में भी एक ही कमरे में रहते थे इसलिए हम लोगों के रिश्ते दोस्ती से ज्यादा पारिवारिक हो गए थे. मेरा उसके घर बहुत ज्यादा आना जाना था और परीक्षा के पहले उसके घर पर ही हम लोग साथ-साथ तैयारी करते थे. शंटी के पापा बैंक में बड़े अधिकारी थे और उसके बाबा  साथ रहते थे जो पोस्ट मास्टर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए थे.  घर के सभी सदस्यों से मेरी  घनिष्ठता थी, इसलिए पारिवारिक बातें भी मेरे सामने होती रहती थी. 

मुझे एक बात बहुत असामान्य लगती थी कि शंटी की मम्मी, उसके पापा से कभी  अच्छे ढंग से पेश नहीं आती थी और बात बात में ताने  मारा करती थी.  कभी-कभी ऐसा लगता था कि वह जानबूझकर उन्हें व्यथित करने के लिए ऐसा करती हैं. पता नहीं क्या दुश्मनी थी ? घर का पूरा नियंत्रण उन्हीं के हाथों में था. 

 जो भी हो, शंटी के पापा  संपूर्णानंद त्रिपाठी उनसे किसी भी तरह उलझते नहीं थे. वह बेहद शालीन और शांत स्वभाव के उच्च शिक्षित व्यक्ति थे और घर की प्रत्येक जिम्मेदारी बखूबी निभाते थे. उनके व्यक्तित्व की एक विशेष बात थी कि न वह कभी हंसते थे न मुस्कुराते थे और न ही अनावश्यक बात करते थे. वह अपने काम से काम रखते थे और बहुत ही नपी तुली बात करते थे. मैंने महसूस किया था कि वह अपनी पत्नी की बातों से इतना दुखी रहते थे कि दुख की चादर हमेशा उनके व्यक्तित्व पर छाई रहती थी. ऐसा लगता था कि वह अपनी नीरस  जीवन को, बिना उफ किये  सजा की तरह काट रहे थे. 

जब कहीं किसी सामाजिक कार्यक्रम में सपरिवार जाना होता था, तो मानो वह अपने बच्चों की मां को या अपने पिता की बहू को साथ ले जाते  थे, पत्नी को नहीं. जब तक उनके पिता जिंदा थे तब तक तो कुछ गनीमत थी क्योंकि वह अपनी बहू को टोकते रहते थे और सुखी दांपत्य जीवन के बारे में समझाते रहते थे. आखिर वह उनके बहुत ही घनिष्ट दोस्त की बेटी जो  थी. उनके निधन के बाद यह नियंत्रण भी खत्म हो गया और  बढ़ती कलह  के कारण संपूर्णानंद त्रिपाठी के लिए घर का माहौल और ज्यादा कष्टकारी और असहनीय हो गया. उन्होंने इसके लिए एक उपाय  ढूंढ निकाला और वह था शहर से दूर  की पोस्टिंग ताकि वह पत्नी  की नियमित यातना  से बच सकें. केवल बड़े तीज त्यौहार में ही घर आते थे. मुझे याद है कि एक बार वह  दिवाली में भी  नहीं आ सके थे क्योंकि उनकी ब्रांच में ऑडिट चल रहा था.  शंटी की मम्मी ने आसमान सिर पर उठा लिया था " वह उसी कुलक्षनी  के घर  गए होंगे या उस कुल्टा को वहीं बुला लिया होगा .. पता नहीं क्या क्या ...अनाप ..शनाप " 

मैंने एक बार हिम्मत करके शंटी से पूछा ही लिया "कि यह कुलक्षिनी और  कुलटा कौन है ?" शंटी भी अपनी  मम्मी के आचरण से बहुत  दुखी रहता था लेकिन कुछ कर नहीं सकता था. उसने बताया कि उसके पिता का कॉलेज के दिनों में किसी लड़की से प्रेम प्रसंग था और दोनों ही शादी करने के लिए कृत  संकल्पित थे लेकिन बाबा उनकी शादी अपने दोस्त की बेटी के साथ करने के लिए वचनबद्ध थे और उनके दबाव के कारण ही उसके पिता को ये  शादी करनी पड़ गई. लेकिन उस लड़की ने अपने परिवार के दबाव को दरकिनार करते हुए कभी शादी न करने का फैसला किया और वह  आज भी अविवाहित है. वह  लखनऊ विश्वविद्यालय में इंग्लिश की प्रोफेसर हैं डॉक्टर सरस्वती शर्मा.  किन्तु दोनों  के बीच में आजकल कोई भी संपर्क नहीं है. शंटी ने बताया कि उसने अपनी मां के लिए कई बार इन लोगों की जासूसी भी की, जिसका उसे बहुत दुख है लेकिन मां के बे सिर पैर के आरोपों में कोई सच्चाई नहीं निकली. 

बाद में मुझे पता चला कि मेरी मौसेरी बहन जिसके मार्गदर्शन  में पीएचडी कर रही है, वह कोई और नहीं डॉक्टर सरस्वती शर्मा ही है. मेरी बहन ने डॉक्टर शर्मा के बारे में जो कुछ भी बताया, उससे उनके त्याग और तपस्या ही परिलक्षित हुई . पूरे विश्व विद्यालय के शिक्षक संकाय में उनका बहुत मान   सम्मान था  वह सबकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहती  थीं . परिवार न होने के कारण प्राय विश्वविद्यालय प्रशासन त्योहारों और छुट्टियों के मौके पर विभिन्न परियोजनाओं में उनकी ड्यूटी लगा देता था , और वह चुपचाप खुशी-खुशी यह सब करती रहती थीं .  विश्वविद्यालय की वह इकलौती ऐसी प्रोफेसर थीं  जो अतिरिक्त कक्षाएं लेती थीं,  छात्रों की समस्याओं के लिए सदैव तत्पर रहती थी , और कितने  ही सामाजिक कार्यों से जुड़ी  थीं . अपने आप को व्यस्त रखना शायद उनकी आदत  थी . 

कालांतर में उस  बैंक में मेरा चयन हो गया, जहां  संपूर्णानंद त्रिपाठी वरिष्ठ अधिकारी थे और यह सुखद संयोग ही था कि परीक्षाधीन अवधि में सामान्य बैंकिंग की ट्रेनिंग के लिए वही  शाखा मिली  जहां वह  मुख्य प्रबंधक थे. चार-पांच महीनों की इस अवधि में मेरा उनसे रोज ही मिलना होता था और वहां मैंने उन्हें एक नए इंसान के रूप में पाया. बैंक मैं उनकी गिनती बेहद कार्य कुशल, जानकार और सक्षम अधिकारियों में होती थी. कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ उनके संबंध बेहद अपनत्व भरे थे और सबसे बड़ी बात थी कि वह किसी भी स्थिति में किसी से नाराज नहीं होते थे. एक दिन  शाखा के एक कर्मचारी ने एक ग्राहक के साथ बेहद गैर जिम्मेदारी भरा काम किया जिस पर स्वाभाविक रूप से कोई भी  मुख्य प्रबंधक बहुत नाराज होता, लेकिन  उन्होंने उसे  बुलाया और समझा कर वापस भेज दिया. 

मैंने उनसे पूछा "सर इतनी बड़ी गलती और आपने नाराजगी तक प्रकट नहीं की, डांटना तो दूर की बात" 

उन्होंने बहुत शांत मुद्रा में कहा " मैं सिलेक्टिव कैसे हो सकता हूं ? कितनी ही विषम परिस्थितियों में मैं घर पर भी  किसी से नाराज नहीं होता या नहीं हो सकता , तो बाहर कैसे नाराज हो जाऊं. मैं दोहरे मापदंड कैसे अपना सकता हूं? नाराज न होना  अब मेरा आत्मसमर्पण नहीं,  आदत  है." 

मैंने महसूस किया की शाखा में कर्मचारी उनकी इस आदत से परिचित थे, इसलिए ज्यादातर में उनके समझाने का व्यापक सुधारात्मक असर पड़ता था और यही सभी से उनकी आत्मीय संबंधों की कुंजी थी. मैंने कभी उन्हें खाली नहीं देखा, दफ्तर में काम में व्यस्त रहते थे और छुट्टी के समय अपने निवास पर  पुस्तकें पढ़ते थे जिनमें बहुतायत  आध्यात्मिक   होती थी. 

शाखा में रहते हुए इतने कम समय में मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला.  वहां से स्थानांतरण के पश्चात भी मैं अक्सर सोचता था कि ईश्वर ने उनके साथ ऐसा इतना अन्याय क्यों किया?  उनका दाम्पत्य जीवन इतना  पीडादायक था कि  उनके प्रति मेरी सहानुभूति,  सम्मान और श्रद्धा में  बदल गई थी. मैं अक्सर सोचता था कि काश उनकी शादी उसी लडकी से हुई होती  .... शायद उनका जीवन बिलकुल अलग होता . कैसा होता ? पता नहीं,  लेकिन मेरे मन में  ये बात बहुत  गहराई से बैठ गयी थी कि ये सब न होने की लिए संपूर्णानंद पूरी तरह से जिम्मेदार थे. क्यों उन्होंने  इसे स्वीकार किया और विरोध नहीं किया? इसलिए उनका दाम्पत्य जीवन अगर सजा है तो उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए थी .   

जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, दोस्तों की आवश्यकता तो बहुत  बढ़ती है, पर दोस्तों की संख्या नहीं बढ़ती, ज्यादातर दोस्त वही रहते हैं जो बचपन से लेकर छात्र जीवन तक बनते हैं और उनसे भी धीरे-धीरे अपनी अपनी व्यस्तताओं  के कारण संपर्क कम होता रहता है, लेकिन मैं और शंटी हमेशा संपर्क में रहते थे. वह उत्तर प्रदेश सचिवालय में समीक्षा अधिकारी  था जहां अच्छी बात यह थी कि  स्थानांतरण नहीं होते थे. मैं स्थानांतरण के कारण एक शहर से दूसरे शहर और अब दूसरे राज्य में पहुंच गया था. 

एक दिन अचानक शंटी ने घबराते हुए फोन किया और  बताया कि पापा घर छोड़ कर पता नहीं कहाँ चले  गए हैं? मैं स्तब्ध रह गया. उसने बताया कि   सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने भविष्य निधि, ग्रेच्युटी सहित कुल जमा पूंजी मम्मी को दे दी थी, शायद उनके दिमाग में कोई योजना थी. वह एक पत्र छोड़ गए हैं जिसमें उन्होंने लिखा है कि उन्होंने अपने जीवन की सारी जिम्मेदारियां पूरी कर दी है, बच्चों की पढ़ाई लिखाई नौकरी और शादी सब कुछ व्यवस्थित ढंग से हो गया है. मम्मी के लिए मकान, नौकरी की सारी बचत  और सेवानिवृत्ति पर मिले सभी रुपए छोड़कर जा रहे हैं. पेंशन का खाता मम्मी के साथ संयुक्त खाता है, जिसकी चेक बुक एटीएम कार्ड सब मम्मी के पास है. उन्होंने लिखा है कि जब तक जीवित रहेंगे वह जीवन प्रमाण पत्र देते रहेंगे और पेंशन मम्मी को मिलती  रहेगी. मर जाने पर व्यवस्था करेंगे की मृत्यु प्रमाण पत्र भी सही जगह पहुंच जाएं ताकि फैमिली पेंशन आती रहे. इसलिए मम्मी के जिंदा रहने तक उन्हें  कोई वित्तीय समस्या नहीं आएगी. वह अपने बचे हुए जीवन में मन और चित्त के लिए शांति की  खोज के लिए  भ्रमण करेंगे, इसलिए उन्हें ढूंढने और संपर्क करने के  प्रयास में  समय बर्बाद न किया जाए. 

 मैं स्तब्ध रह गया. मैंने पूछा कि "कहीं पता किया क्या ?" तो उसने कहा 'नहीं'  लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा लेकिन न जाने क्यों मै पता नहीं करना चाहता क्योंकि यही पापा की इच्छा है. मुझे लगता है कि शायद यही उनके हित में है. मैं उस समय शांत हो गया  लेकिन मन अशांत हो गया.  

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(३) 

सन्यासी और साध्वी के पास पहुंचने के बाद मैंने सन्यासी की तरफ देखते हुए कहा "अंकल प्रणाम"

सन्यासी ने एक टक मुझे देखा जरूर लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. मैं भी लगातार उन्हें देखे जा रहा था, लगा कोई गलतफहमी हो गई है क्या?

थोड़ी देर के लिए सभी निशब्द हो गए. मैं उन्हें देख रहा था और वह मुझे देख रहे थे.

साध्वी ने हस्तक्षेप किया और हम दोनों की तरफ देखते हुए पूछा " क्या आप लोग एक दूसरे को जानते हैं?"

"स्वामी जी का तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं इन्हें अच्छी तरह से जानता हूं" मैंने जवाब दिया, लेकिन सन्यासी ने  फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, इसलिए मैंने फिर बात को आगे बढ़ाते हुए कहा-

" अंकल मैं शंटी का दोस्त हूं, राज  .... राज वर्मा "  सन्यासी की आंखों में मैंने झांक कर देखा तो लगा कि प्रश्न परिचित होने का नहीं है बल्कि परिचित होने की स्वीकारोक्ति का है. यह हां और न के बीच का असमंजस है. लेकिन मैं आश्वस्त था कि यह वही है, इसलिए अधीर  हो रहा था. मैंने झुक  कर उनके पांव छुए और  फिर बात आगे बढ़ाई -

" सर, मैं जनरल बैंकिंग के लिए आपका ट्रेनी  था, राज वर्मा.... ८७ बैच, चंदौसी ब्रांच." मैं जैसे उन्हें याद दिलाने की कोशिश कर रहा था.

चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाकर वह  बोले 

"कैसे हो..... राज?"

 मेरी खुशी का ठिकाना न रहा "अच्छा हूं सर" मैंने कहा

" यहाँ  कैसे ?" उन्होंने पूछा

" ट्रैकिंग के लिए 'फूलों की घाटी' गया था, लौटते हुए दर्शन करने के लिए रुका था और अब माना गांव जा रहा हूं" मैंने बताते हुए पूछा -

"लेकिन आप ? और यह सन्यासी की वेशभूषा?" 

उन्हें गहरी सांस खींचते हुए बहुत ही निश्चिंत भाव से  कहा-

"मैंने अपनी सभी जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद घर छोड़ दिया है,... और सन्यास ले लिया है".  कुछ रुक कर वह बोले -  

"तुम कुछ भी अर्थ निकाल सकते हो..........घर छोड़ने के लिए संयास ले लिया या फिर.......  सन्यास लेने के लिए घर छोड़ दिया"

फिर उन्होंने साध्वी की तरफ इशारा करते हुए कहा-

" यह है डॉ सरस्वती शर्मा, लखनऊ विश्वविद्यालय में इंग्लिश की प्रोफेसर, अभी हाल ही में रिटायर हुई हैं ."

 मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा .  मैंने  उत्सुकता पूर्वक  साध्वी  की और देखते हुए  कहा -

" मैंने पहले कभी आपको देखा तो नहीं है लेकिन आपके बारे में थोड़ा बहुत जानता जरूर हूं.  सर को तो मैंने घर  और ऑफिस  दोनों जगह देखा समझा और महसूस किया. मैं जितना भी आप के बारे में  जानता  और समझता था  उससे मेरे दिल में आप  के  लिए बहुत ही सम्मान था  लेकिन आज आप दोनों के लिए मेरे दिल में बहुत श्रद्धा उत्पन्न हो गयी है ." 

थोड़ा संभलने की कोशिश करते हुए भी  मेरे मुहं से मेरे दिल की बात निकल   गई .  

" मुझे नहीं मालूम क्यों? लेकिन आप दोनों  को, इस रूप में ही सही, उम्र के इस पड़ाव पर ही सही, साथ-साथ देखने से मेरे मन की गहराइयों में बसी एक अकुलाहट आज समाप्त हो गई है. इसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूं और यह मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं" यह कहते हुए मैंने साध्वी के भी चरण स्पर्श किये. पर  पता नहीं क्यों मेरी आंखें भर आई, गला रुंध गया.

रुक रुक कर बोलते हुए मैंने कहा -

"मैं आपका बेटा तो नहीं, लेकिन बेटा जैसा ही हूं. अगर कभी आप लोग मुझे सेवा का मौका देंगे तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी और मैं इसे अपना सौभाग्य  समझूंगा "

साध्वी के चहरे पर जैसे वात्सल्य उमड़ आया था. दोनों ने बारी बारी  अपना हाथ मेरे सिर पर रखा और बड़े प्यार से  सहलाया और फिर  चल पड़े नीचे घाटी की ओर एक साथ एक रास्ते पर , स्वामी सम्पूर्णानंद  सरस्वती और  साध्वी सरस्वती सम्पूर्णा   .

यहां से मेरा रास्ता अलग था लेकिन मैं  उन्हें यूं ही जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक कि वे  मेरे आंखों से ओझल नहीं हो गए.

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- शिव प्रकाश मिश्रा ( Shive Prakash Mishra )

           मूल कृति -  १५ अगस्त २०१८ (Copy Right)


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