वैसे तो उसका नाम गोवर्धन सिंह था, लेकिन बड़े भाइयों के बच्चे उसे कक्कू कहकर बुलाते थे। यह नाम उसके साथ ऐसा चिपक गया कि मोहल्ले के सारे बच्चों के साथ‑साथ उसके अपने बच्चे भी उसे कक्कू कहकर पुकारते थे। अब पूरे गाँव में वह कक्कू के नाम से ही लोकप्रिय था।
लगभग छह फुट लंबे कक्कू की आँखें जैसे बोलती थीं, लेकिन शर्म से हमेशा झुकी रहती थीं। शरीर हष्ट‑पुष्ट था, पर बेतरतीब बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी के कारण चेहरे पर अजीब‑सी रिक्तता और दरिद्रता का आभास होता था। यह बात सही भी थी — गरीबी जैसे उसे वरदान में मिली थी।
जाने कितने काम‑धंधे उसने आज़माए, लेकिन कभी फायदा नहीं हुआ। हमेशा अपनी पूँजी गंवा बैठता। आखिर किस्मत, बुरी संगत और जल्दी पैसे कमाने की लालसा ने उसे जुआरी बना दिया। कोड़ी खेलने में माहिर कक्कू छह कौड़ी फेंकता था। जुए की लत ने उसे एड़ी से चोटी तक कर्जदार बना दिया था। खेत, टपरिया और पत्नी के गहने सब बिक चुके थे, फिर भी जुए की आदत नहीं छूटी थी। उसे विश्वास था कि कभी न कभी उसकी किस्मत ज़रूर बदलेगी। कई‑कई दिन तक उसका कुछ अता‑पता नहीं रहता; कभी इस गाँव तो कभी उस गाँव, वह दूर‑दूर तक जुआ खेलने जाया करता था। उसके इन कारनामों ने उसकी पत्नी और बच्चों की ज़िंदगी बदहाल कर दी थी। घर में फाँकों की नौबत आ गई थी। बच्चों की पढ़ाई तो छोड़िए, दो समय का खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया था।
उसकी पत्नी बहुत सुशीला स्त्री थी। सब कुछ बर्दाश्त कर लेती थी, किंतु अपनी परेशानियाँ कभी भी अपने मायके या गाँव में किसी से नहीं बताती थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह पति से भी झगड़ती नहीं थी। कक्कू की पत्नी होने की वजह से मोहल्ले के लड़के‑लड़कियाँ उसे भी कक्कू की चाची कहते थे।
वह सिलाई, कढ़ाई और बुनाई में निपुण थी। किसी का स्वेटर एक बार देख ले तो तुरंत बुनाई शुरू कर देती थी। क्रोशिया पर तो उसका हाथ ऐसा चलता था कि देखने वाले दंग रह जाते थे। गाँव भर की शादी योग्य लड़कियाँ उसे घेरे रहती थीं ताकि ससुराल जाकर अपना हुनर दिखा सकें। किसी को सिलाई सीखनी होती थी, किसी को बुनाई, तो किसी को क्रोशिया में हाथ साफ करना होता था।
लेकिन इन सब से पेट कहाँ भरता है! मोहल्ले वालों से उनकी स्थिति छिपी नहीं थी। इसलिए कक्कू की चाची मोहल्ले वालों के छोटे‑मोटे काम भी करती रहती थी — किसी के लिए सत्तू पीस देती, किसी का बेसन, किसी के मसाले, किसी की साड़ी में फाल लगाती या किसी का ब्लाउज सिल देती। इन कामों के बदले कुछ न कुछ मिल जाता था, पर इतना नहीं कि बच्चों का पेट आराम से भर सके।
जब वह घर में किसी के सत्तू पीस रही होती, तो बच्चे ललचाई निगाहों से देखते और जमीन पर गिरे हुए दाने उठाकर खाते। तब उसका कलेजा मुँह को आ जाता, लेकिन फिर भी वह सोचती — “जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे।”
बच्चे मोहल्ले के किसी न किसी घर से प्रतिदिन मट्ठा माँगकर लाते, यही उनका सुबह का नाश्ता होता। कभी कुछ न मिलता तो वह बाजरा उबालकर उसके पानी से बच्चों का पेट भर देती। उस समय बांग्लादेश युद्ध चल रहा था, महँगाई आसमान पर थी और मोटे अनाज तक की भारी किल्लत थी।
मोहल्ले की किसी स्त्री के यहाँ पूजा का उद्यापन होता, तो उनके बच्चों को कन्या और लंगूर के रूप में खाने के लिए बुलाया जाता। कोई स्त्री अगर सुहागिनों को खिलाने का व्रत तोड़ती, तो कक्कू की चाची को अवश्य आमंत्रित करती और घर ले जाने के लिए भी कुछ न कुछ दे देती, ताकि इसी बहाने परिवार का पेट कम से कम एक दिन तो भर सके।
समय हर किसी की हर कदम पर परीक्षा लेता है, लेकिन शायद गरीब की परीक्षा सबसे कठिन होती है। कक्कू की चाची को मलेरिया हो गया और उन्होंने चारपाई पकड़ ली। बच्चों पर हर तरफ से मुसीबत टूट पड़ी। संयोग से उसी दिन कक्कू घर आ गया, लेकिन घर में पानी तक नहीं था।
कुएँ से पानी निकालकर लाता भी कौन? चाची बीमार थीं और बच्चे इतने बड़े नहीं थे कि पानी निकाल सकें। चाची ही रोज़ सुबह‑सुबह चादर ओढ़कर, घूँघट निकालकर पानी भर लाती थीं। उस दिन कक्कू ने भी सहृदयता दिखाई — या मजबूरी में ही सही — पानी लेने के लिए वह बाल्टी लेकर कुएँ पर गया।
गाँव में एक ही कुआँ था। कुआँ क्या, छोटी‑सी कुइयाँ थी और एक बार में केवल एक ही व्यक्ति पानी निकाल सकता था। इसलिए अक्सर पानी भरने वालों की लंबी कतार लग जाती और पानी लाने में घंटों लग जाते।
कक्कू का यह नया अनुभव था। वह भी कतार में खड़ा हो गया, लेकिन हद तो तब हो गई जब एक घंटे इंतजार के बाद उसका नंबर आने ही वाला था। मोहल्ले की जो लड़की पानी भर रही थी, वह केवल एक घड़ा और एक बाल्टी लेकर आई थी। जैसे ही वह घड़ा भरती, उसकी बहन दूसरा खाली घड़ा लाकर रख देती और भरा हुआ घड़ा लेकर चली जाती। यह क्रम एक घंटे तक चलता रहा। जब यह कक्कू को असहनीय हो गया, तो वह पैर पटकते हुए खाली बाल्टी लेकर घर लौट आया और खड़े‑खड़े बाल्टी फेंक दी।
इतना संकेत परिवार के लिए बहुत था। बच्चे दुबक गए और पत्नी भीषण बुखार के बाद भी चारपाई से उठकर आ गई और पूछा — “क्या हुआ?” लेकिन कक्कू ने कोई जवाब नहीं दिया, बस फावड़ा उठाकर घर से बाहर चला गया। इतने दिन बाद पति घर आया और उसे पानी भी नहीं मिला — यह सोचकर चाची मन ही मन बहुत आहत हो रही थीं। बाहर आकर देखा तो कक्कू घर के सामने कुछ दूर पर खुदाई कर रहा था।
चाची ने तेज बुखार के बाद भी हिम्मत करके चादर ओढ़ी, घूँघट निकालकर कुएँ से पानी भर लायी और पानी लेकर कक्कू को पिलाने गई। लेकिन कक्कू ने साफ कह दिया कि वह अपना खुद का कुआँ खोदकर ही पानी पिएगा। चाची ने बहुत अनुरोध किया, पर वह नहीं माने।
कहावत है कि जवान आदमी अगर धरती पर ठीक से पैर पटक दे तो पानी निकल आता है। और कक्कू तो फावड़ा लेकर पूरी लगन से जुटा हुआ था। देर रात तक खोदता रहा। शायद रात ठीक से नींद भी नहीं आई, इसलिए सुबह तड़के ही फिर खुदाई शुरू कर दी। कहा जाता है कि मेहनत का फल मीठा होता है, और कक्कू ने शायद पहली बार दृढ़ संकल्प के साथ मेहनत से कोई काम किया था।
दूसरे दिन दोपहर बाद कक्कू द्वारा खोदे जा रहे कुएँ में पानी निकल आया। यह उसके लिए बहुत संतोष की बात थी, लेकिन उससे भी ज्यादा संतोष उसकी पत्नी को था — क्योंकि उसके पति ने पहली बार इतनी लगन और कड़ी मेहनत से अकेले दम पर इतना बड़ा काम किया था।
मोहल्ले के बच्चे इकट्ठे हो गए, जश्न का माहौल बन गया। अपने‑अपने घर से जो भी हो सका — गुड़, बताशा, गुड़धानी आदि ले आए और खुशी का आदान‑प्रदान किया गया। मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाएँ भी आ गईं और कक्कू को गुड़ खिलाकर आशीर्वाद दिया। सभी बहुत खुश थे क्योंकि मोहल्ले में पहली बार कोई कुआँ खोदा गया था, जिससे सबको बहुत फायदा होने वाला था।
जवान लड़कियाँ इसलिए खुश थीं कि कुएँ पर आते‑जाते शोहदों की छींटाकशी से मुक्ति मिल जाएगी और समय भी बचेगा। मोहल्ले के कुछ बड़े बुजुर्ग भी आ गए और सभी ने कक्कू की बहुत तारीफ की। थोड़ी देर के लिए सब भूल गए कि कक्कू एक जुआरी है। ढोलक आ गई और देर रात तक महिलाएँ लालटेन की रोशनी में देवी गीत और भजन गाती रहीं।
कक्कू को पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत की लोग इज्जत करते हैं। बहुत दिनों बाद रात में उसे बहुत अच्छी नींद आई।
कुएँ को पक्का कराने की उधेड़बुन उसके दिमाग में चल ही रही थी कि तभी अचानक एक घटना हुई। कक्कू को पकड़ने के लिए पुलिस आ गई। पुलिस ने बताया कि कक्कू के नाम रिपोर्ट दर्ज कराई गई है कि उसने दूसरे की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है और अब वहाँ कुआँ खोद रहा है। रिपोर्ट लिखाने वाला कोई और नहीं, उसका पड़ोसी महतो था। उनके अनुसार जिस ज़मीन पर कुआँ खोदा गया है, वह उनकी है।
पुलिस के आने से कक्कू के बच्चे रोने लगे और मोहल्ले में सन्नाटा छा गया। किसी को असलियत मालूम नहीं थी। ज़्यादातर लोग समझ रहे थे कि कक्कू को जुआ खेलने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। कोई भी पड़ोसी, यहाँ तक कि उसके अपने वंश परिवार के लोग भी सामने नहीं आए। पुलिस कक्कू को पकड़कर ले गई।
कक्कू की चाची पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गरीबी की हजार मुसीबतें होती हैं, कभी भी, कहीं से भी आ सकती हैं। अब क्या करें? कहाँ जाएँ? कौन उनकी सहायता करेगा? उन्हें लगा कि बिट्टी बुआ ही मदद कर सकती हैं। इसलिए बिना समय गँवाए, चादर ओढ़कर और बच्चों की उँगली पकड़कर वह बिट्टी बुआ के पास पहुँच गईं। बुआ के पाँव पकड़कर रो‑रोकर सारी आपबीती सुना दी।
बुआ ने उसे आश्वासन दिया कि कक्कू को कुछ नहीं होगा, वह उसे पुलिस से छुड़ाकर लाएँगी। बिट्टी बुआ ने अपने भतीजे को बुलाया और आदेश दिया कि जाकर कक्कू की ज़मानत करवा लाओ। जो भी पैसा खर्च हो, उसकी चिंता मत करो।
बिट्टी बुआ, जैसा कि नाम से मालूम होता है, इसी गाँव की बेटी थीं और बाल विधवा थीं। बचपन में ही शादी हो गई थी और 13–14 साल की उम्र में गौना हो गया था। उनके पहुँचते ही पति को बड़ी माता निकली और उसे अपने साथ ले गई। सास‑ननद ने जीना दुश्वार कर दिया। बात‑बात पर ताने मारे जाते कि उसने अपने पति को खा लिया।
एक दिन जब बात बर्दाश्त से बाहर हो गई तो बिट्टी ने आपा खो दिया और रसोई से बबूल की मोटी लकड़ी उठाकर सास और ननद की जमकर धुनाई कर दी। फिर अपनी जान बचाने के लिए मायके की तरफ दौड़ पड़ी। मायका इतना नज़दीक नहीं था, रास्ते में रात हो गई। तब बिट्टी ने यह सोचकर कि मनुष्य रूपी जानवरों से जंगली जानवरों के साथ रात बिताना ज़्यादा सुरक्षित होगा, जंगल में एक पेड़ पर चढ़कर रात गुज़ारी। सुबह होते ही फिर दौड़ पड़ी और अपने घर पहुँचकर ही दम लिया।
पिता के गले लगकर रोते‑रोते सारी आपबीती सुना दी। पिता बहुत दुखी हुए और बोले कि बिट्टी अब यहीं रहेगी। उन्होंने अपनी खेती से एक हिस्सा बिट्टी के नाम कर दिया। वह दिन और आज का दिन — बिट्टी उस गाँव में रहते‑रहते जीजी और फिर बुआ बन गईं। पिता और बड़े भाई अब दुनिया में नहीं थे, पर वह अपने दोनों भतीजों के साथ रहती थीं और अपने घर की मुखिया थीं। गाँव में भी लोग उनकी उम्र और नेक नियति का बहुत सम्मान करते थे। कोई भी उनकी बात टालने की हिम्मत नहीं करता था।
जीवन ने उन्हें जो दर्द दिया, उसी का मरहम बनाकर वह गाँव की महिलाओं को अक्सर लगाती थीं। गाँव की बहुओं का खासा ध्यान रखती थीं। सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की पूजा हो, होली, दिवाली, तीज‑त्योहार — हर अवसर पर वह उनके लिए कुछ न कुछ ज़रूर करती थीं।
गाँव की बहुओं का वह खासा ध्यान रखती थीं। सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की पूजा हो, होली, दिवाली, तीज‑त्योहार — किसी भी अवसर पर वह उनके लिए कुछ न कुछ ज़रूर करती थीं।
बिट्टी बुआ के बीच में पड़ने से कक्कू की ज़मानत हो गई और पुलिस ने यह भी कह दिया कि अगर आपस में समझौता हो जाए तो रिपोर्ट बंद कर दी जाएगी। कक्कू घर आ गया और दूसरे दिन समझौते के लिए पंचायत बैठी। पंचायत में तय हुआ कि कक्कू कुआँ पाट देगा और महतो की ज़मीन खाली कर देगा। पुलिस कार्यवाही में महतो द्वारा खर्च किए गए ₹2000 भी कक्कू हर्जाने के रूप में देगा। यह कक्कू के परिवार के लिए और भी बड़ी मुसीबत थी।
कक्कू की चाची दौड़कर फिर बुआ के पास गईं। बिट्टी बुआ ने जब सुना तो उनकी त्योरियाँ चढ़ गईं और वह छड़ी के सहारे पंचायत में पहुँच गईं। बुआ को देखते ही पंच खड़े हो गए।
बुआ ने कहा —
“मैंने तो सुना था कि पंच परमेश्वर होते हैं, लेकिन तुम लोगों के फैसले से तो ऐसा लगता है कि तुम लोग इंसान भी नहीं हो।”
कक्कू की तरफ इशारा करते हुए बोलीं —
“इसे देखो, अपने कर्मों से इसने अपने घर को नर्क बना दिया है। इसकी पत्नी और बच्चों को भरपेट खाना भी नहीं मिलता। इसकी बहू पतिव्रता और सुलक्षणा है, गाँव भर की लड़कियों को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई सहित गृहस्थी का ज्ञान बाँटती है। तुम्हारी बहनें और बेटियाँ अपनी‑अपनी ससुराल में इससे हुनर सीखकर जाती हैं। ज़रा उनसे भी पूछो कि तुम लोगों ने इसे क्या सज़ा दी है। जो जुर्माना तुम कक्कू पर लगा रहे हो, वह कक्कू पर नहीं, उसकी बहू और बच्चों पर लगा रहे हो। जो लोग अपना पेट नहीं भर सकते, वे तुम्हारा जुर्माना कहाँ से भरेंगे?”
बुआ के पंचायत में पहुँचने की खबर जंगल में आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई। बहुत‑सी महिलाएँ दूर से पंचायत की कार्यवाही देखने पहुँच गईं — कोई घूँघट की ओट से, कोई दरवाज़े के पीछे से, कोई छतों के ऊपर से। बिट्टी बुआ लगातार बोलती जा रही थीं —
“जिस अपराध की सज़ा तुम लोग कक्कू को दे रहे हो, वह तो अपराध है ही नहीं। इतने बड़े गाँव में एक छोटा‑सा कुआँ है। किसी ने यहाँ की ज़रूरत पर ध्यान नहीं दिया। पंचों को तो खुश होना चाहिए कि गाँव में एक और कुआँ बन गया है। जो काम चार मज़दूर एक हफ्ते में करते, वह काम अकेले कक्कू ने केवल दो दिन में कर दिया है। तुम लोगों को तो उसे शाबाशी देनी चाहिए थी, लेकिन तुम लोग उसे सज़ा दे रहे हो। तुममें से कौन है जो दो दिन में कुआँ खोद सके?”
“इस गाँव में एक और कुएँ की सख्त आवश्यकता है। जो काम पंच और पंचायत नहीं कर सके, वह कक्कू ने अपने दम पर करके दिखा दिया। तुम लोगों को नहीं मालूम कि कितनी परेशानी होती है गाँव की लड़कियों और औरतों को। दो बाल्टी पानी के लिए एक‑एक घंटा बर्बाद होता है कुएँ पर, ऊपर से गाँव के शोहदे लड़कियों और औरतों पर फब्तियाँ कसते हैं। महतो! तुमने तो कक्कू के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाई। कुएँ पर जाते समय तुम्हारी बहुरिया के साथ गाँव के मनचले रोज़ छेड़खानी करते हैं। कितनों के खिलाफ तुमने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई आज तक? कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी बहू उसी कुएँ में गिरकर जान दे दे या किसी के साथ भाग जाए।”
“तुम्हारे घर के सामने कुआँ बन जाएगा तो तुम्हारी बहुरिया रोज़‑रोज़ की छेड़खानी से बच जाएगी। लेकिन तुम कुआँ पाटने की बात करते हो। इससे लगता है कि तुम भी मनचलों का साथ दे रहे हो।”
पंचों पर घड़ों पानी पड़ गया और महतो की हालत तो ऐसी हो गई कि उसके घर में ही उसकी इज्ज़त तार‑तार हो गई। लेकिन बिट्टी बुआ यहीं नहीं रुकीं, बोलती रहीं।
“सभी लोग कान खोलकर सुन लें — यह कुआँ नहीं पटेगा। अगर महतो को चाहिए तो जुर्माना भी मैं भरूँगी, ज़मीन की कीमत भी मैं दूँगी और इस कुएँ को पक्का भी मैं ही करवाऊँगी ताकि गाँव की लड़कियों और औरतों को इसका फायदा मिले। पंचों ने जुर्माना तय कर दिया है, अब पंचों को चाहिए कि वे ज़मीन की कीमत भी तय कर दें ताकि मैं उसका भुगतान महतो को कर दूँ।”
इससे पहले कि पंच कुछ कहते, महतो खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला —
“बुआ, मुझे माफ़ कर दो। मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप जैसा चाहें वैसा करें।”
पंचों के पास अब कुछ करने को नहीं बचा था। महतो ने फैसले की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी।
बिट्टी बुआ ने आगे कहा —
“लेकिन कक्कू को सज़ा तो अवश्य मिलनी चाहिए और मिलेगी भी।”
यह सुनकर कक्कू और उसकी पत्नी दोनों सशंकित हो उठे कि एक मुसीबत टली नहीं कि दूसरी आ गई।
“पिछले काफी लंबे समय से कक्कू ने अपनी पत्नी और बच्चों का ध्यान नहीं रखा। परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया, जिससे उसकी पत्नी और बच्चों को अनावश्यक रूप से अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। कुआँ का निर्माण पूरा हो जाने के बाद कक्कू मेरे यहाँ हरवाहे (खेतों में हल चलाने वाला) का काम करेगा, गाय और बैलों की चारा‑पानी करेगा। बदले में उसे भोर का चबेना और दोपहर की खुराक मिलेगी। उसकी बहू को 150 रुपये महीना तनख्वाह मिलेगी ताकि घर का खर्चा चल सके और बच्चों की पढ़ाई‑लिखाई भी हो सके। कक्कू को जब कभी इससे अच्छी नौकरी मिले तो जा सकता है।”
“कक्कू, तुम्हें क्या यह सज़ा स्वीकार है?”
कक्कू की आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा —
“हाँ बुआ, मैं करूंगा और आपको अच्छा व्यक्ति बनकर दिखाऊँगा।”
बिट्टी बुआ ने कक्कू द्वारा खोदे गए कुएँ को पक्का करवा दिया और मोहल्ले के सारे लोग इसका भरपूर इस्तेमाल करने लगे। अब न बिट्टी बुआ इस दुनिया में हैं और न ही कक्कू, लेकिन कक्कू का कुआँ आज भी है और गाँव के लिए एक बड़ा पहचान चिन्ह है।
कक्कू का बेटा सेना में काम करता था। सेवानिवृत्ति के बाद अब वह गाँव के उसी पुश्तैनी मकान में रहता है। गाँव में भी काफी परिवर्तन आ गया है। पक्की सड़क बन गई है। कस्बे के बस अड्डे से गाँव में कक्कू के कुएँ तक ऑटो और टेंपो चलते हैं। सवारियों को देखकर टेंपो वाले चिल्लाते हैं —
“कक्कू का कुआँ, कक्कू का कुआँ।”
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- शिव प्रकाश मिश्रा ©
मूलकृति - 15 अगस्त 2020
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प्रकाशित - माधव भूमि २७ फरवरी २०२१
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~Shiv Mishra~~~~~~~~~~~
वैसे तो उसका नाम गोवर्धन सिंह था, लेकिन बड़े भाइयों के बच्चे उसे कक्कू कहकर बुलाते थे। यह नाम उसके साथ ऐसा चिपक गया कि मोहल्ले के सारे बच्चों के साथ‑साथ उसके अपने बच्चे भी उसे कक्कू कहकर पुकारते थे। अब पूरे गाँव में वह कक्कू के नाम से ही लोकप्रिय था।
लगभग छह फुट लंबे कक्कू की आँखें जैसे बोलती थीं, लेकिन शर्म से हमेशा झुकी रहती थीं। शरीर हष्ट‑पुष्ट था, पर बेतरतीब बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी के कारण चेहरे पर अजीब‑सी रिक्तता और दरिद्रता का आभास होता था। यह बात सही भी थी — गरीबी जैसे उसे वरदान में मिली थी।
जाने कितने काम‑धंधे उसने आज़माए, लेकिन कभी फायदा नहीं हुआ। हमेशा अपनी पूँजी गंवा बैठता। आखिर किस्मत, बुरी संगत और जल्दी पैसे कमाने की लालसा ने उसे जुआरी बना दिया। कोड़ी खेलने में माहिर कक्कू छह कौड़ी फेंकता था। जुए की लत ने उसे एड़ी से चोटी तक कर्जदार बना दिया था। खेत, टपरिया और पत्नी के गहने सब बिक चुके थे, फिर भी जुए की आदत नहीं छूटी थी। उसे विश्वास था कि कभी न कभी उसकी किस्मत ज़रूर बदलेगी। कई‑कई दिन तक उसका कुछ अता‑पता नहीं रहता; कभी इस गाँव तो कभी उस गाँव, वह दूर‑दूर तक जुआ खेलने जाया करता था। उसके इन कारनामों ने उसकी पत्नी और बच्चों की ज़िंदगी बदहाल कर दी थी। घर में फाँकों की नौबत आ गई थी। बच्चों की पढ़ाई तो छोड़िए, दो समय का खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया था।
जाने कितने काम धंधे करके आजमाए लेकिन फायदा नहीं हुआ । हमेशा ही अपनी पूंजी भी गंवा बैठता । आखिर किस्मत, बुरी संगत और कुछ जल्दी पैसे कमाने के लालच ने उसे जुआरी बना दिया । कोड़ी खेलने में माहिर कक्कू 6 कौड़ी फेंकता था । जुए की लत ने उसे एड़ी से चोटी तक कर्जदार बना दिया था । खेत, टपरिया और पत्नी के गहने सभी बिक चुके थे फिर भी जुए की लत नहीं छूटी थी । उसे विश्वास था कि कभी न कभी उसकी किस्मत जरूर बदलेगी कई कई दिन तक उसका कुछ अता पता नहीं रहता कभी इस गांव तो कभी उस गांव, वह बहुत दूर-दूर तक जुआ खेलने जाया करता था । उसके इन कारनामों ने उसकी पत्नी और बच्चों की जिन्दगी बदहाल कर दी थी. घर में फाँकों की नौबत आ गई थी । बच्चों की पढ़ाई तो छोड़िए दो समय खाने के ही लाले पड़ जाते थे ।
उसकी पत्नी बहुत सुशीला स्त्री थी । सब कुछ बर्दाश्त करती थी किंतु अपनी परेशानियां कभी भी अपने मायके और गांव में किसी से नहीं बताती थी। सबसे बड़ी बात पट्टी से झगड़ती भी नहीं थी । कक्कू की पत्नी होने की वजह से मोहल्ले के लड़के लड़कियां उसे भी कक्कू की चाची कहते थे। वह सिलाई, कढ़ाई, बुनाई में निपुण थी ।एक बार किसी का स्वेटर देख ले तो बस बुनाई डाल देती थी। क्रोशिया पर तो ऐसा हाथ चलता था कि देखने वाले दंग रह जाएं। गांव भर की शादी योग्य लड़कियां उसे घेरे रहती थी ताकि ससुराल में जाकर अपना हुनर दिखा सकें। किसी को सिलाई सीखनी होती थी, किसी को बुनाई तो किसी को क्रोशिया में हाथ साफ करना होता था। लेकिन इस सब से पेट कहां भरता है । मोहल्ले वालों से उनकी स्थिति छिपी नहीं थी। इसलिए कक्कू की चाची मोहल्ले वालों के छोटे-मोटे काम भी करती रहती थी। किसी के सत्तू पीस दिए तो किसी का वेसन, किसी के मसाले पीस दिए, किसी की साड़ी में फाल लगा दिया तो किसी का ब्लाउज सिल दिया। इन सब कामों के बदले कुछ न कुछ मिलता रहता था लेकिन फिर भी वह इतना नहीं होता था कि बच्चों का पेट भी आराम से भर सके। जब वह घर में किसी के सत्तू पीस रही होती थी तो बच्चे ललचाई निगाहों से देखते थे, जमीन पर गिरे हुए दाने उठा उठा कर खाते थे, तब उसका कलेजा मुंह को आ जाता था लेकिन फिर भी वह हमेशा सोचती थी कि जब अच्छे दिन नहीं रहे तो खराब दिन भी नहीं रहेंगे। बच्चे मोहल्ले के किसी न किसी घर से प्रतिदिन मट्ठा मांग कर लाते थे, यही उन तीनों का सुबह का नाश्ता होता था। कभी अगर कुछ नहीं होता तो वह बच्चों के लिए बाजरा उबाल कर उसके पानी से बच्चों का पेट भरती । बँगला देश युद्ध का समय था, महगाई आसमान पर थी और मोटे आनाज तक की बहुत किल्लत थी. मोहल्ले की किसी स्त्री के यहां भी पूजा का उद्यापन होता था तो उनके बच्चों को हर कोई बहुत याद से कन्या और लंगूर के रूप में खाने के लिए बुलाता था। कोई स्त्री अगर सुहागिनें खिलाने का व्रत तोड़ती तो कक्कू की चाची को अवश्य आमंत्रित किया जाता था और घर ले जाने के लिए भी कुछ न कुछ दे दिया जाता था ताकि इसी बहाने परिवार का पेट कम से कम एक दिन तो भर सके।
वैसे समय हर किसी की हर कदम पर परीक्षा लेता रहता है लेकिन शायद गरीब की परीक्षा बहुत कठिन होती है। कक्कू की चाची को मलेरिया हो गया और उन्होंने चारपाई पकड़ ली । बच्चों की तो हर तरफ से मुसीबत थी। लेकिन संयोग से कक्कू का उस दिन घर में पदार्पण हो गया लेकिन घर में पानी तक नहीं था। कुए से पानी निकाल कर लाता भी कौन कक्कू की चाची तो बीमार थी और बच्चे इतने बड़े थे नहीं कि वह पानी निकाल कर ला पाते। चाची ही मुहँ अंधेरे चादर ओढ़ कर घूँघट निकाल कर पानी भर लाती थी। आज कक्कू ने भी सहृदयता दिखाई या मजबूरी में ही सही पानी लेने के लिए उसे बाल्टी लेकर कुएं पर जाना पड़ा।
गांव में एक ही कुआं था। कुआं क्या छोटी से कुइयां थी और एक बार में एक ही व्यक्ति पानी निकाल सकता था । इसलिए अक्सर पानी भरने वालों की लंबी कतार लग जाती थी और पानी लाने में घंटों लग जाते थे। कक्कू का यह नया अनुभव था। वह भी कतार में आ गया लेकिन हद तो तब हो गई जब एक घंटा इंतजार के बाद उनका नंबर आने ही वाला था लेकिन मोहल्ले की जो लड़की पानी भर रही थी वह केवल एक घड़ा और एक बाल्टी लेकर आई थी लेकिन जैसे ही वह घड़ा भरती उसकी बहन दूसरा खाली घड़ा लाकर रख देती और भरा घड़ा लेकर चली जाती। यह उपक्रम एक घंटा चलता रहा और जब यह कक्कू को असहनीय हो गया तो वह पैर पटकते हुए खाली बाल्टी लेकर घर वापस आ गया और खड़े खड़े बाल्टी फेंक दी। इतना संकेत परिवार के लिए बहुत था । बच्चे दुबक गए और पत्नी भीषण बुखार के बाद भी चारपाई से उठ कर आ गई और पूछा "क्या हुआ" । लेकिन कक्कू ने जबाब नहीं दिया यह फावड़ा उठा कर घर से बाहर चले गया । इतने दिन बाद पति घर आया और उसे पानी भी नहीं मिला यह सोच कर चाची मन ही मन बहुत आहत हो रही थीं ।बाहर आकर देखा तो कक्कू घर के सामने कुछ दूर पर खुदाई कर रहे थे। चाची ने तेज बुखार के बाद भी हिम्मत करके चादर ओढ़ी और घूंघट निकाल कर कुएं से पानी निकाल लायी और पानी लेकर कक्कू को पिलाने गई। लेकिन कक्कू ने तो साफ कह दिया कि वह अपना कुआं खोदकर ही पानी पिएंगे। चाची ने बहुत अनुरोध किया पर वह नहीं माने।
कहावत है कि जवान आदमी अगर धरती पर ठीक से पैर पटक दे तो पानी निकल आता है, और फिर कक्कू तो फावड़ा लेकर जुटे हुए थे। देर रात तक खोदते रहे। शायद रात ठीक से नींद भी नहीं आई इसलिए सुबह तड़के ही फिर खुदाई शुरू कर दी । कहा जाता है कि मेहनत का फल मीठा होता है और फिर कक्कू ने तो शायद पहली बार इतना दृढ़ प्रतिज्ञ होकर मेहनत से कोई काम किया था। दूसरे दिन दोपहर के बाद कक्कू द्वारा खोदे जा रहे कुएं में पानी निकल आया । कक्कू के लिए यह बहुत संतोष की बात थी लेकिन उससे भी ज्यादा संतोष की बात उसकी पत्नी के लिए थी क्योंकि उसके पति ने पहली बार इतनी लगन और कड़ी मेहनत से अकेले दम पर इतना बड़ा काम किया था । मोहल्ले के बच्चे इकट्ठे हो गए , जश्न का माहौल हो गया । अपने अपने घर से जिससे जो हो सका - गुड, बताशा, गुडधानी आदि ले आए और खुशी का आदान प्रदान किया गया । मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाएं भी आ गई और कक्कू को गुड खिलाकर आशीर्वाद दिया। सभी बहुत खुश थे क्योंकि मोहल्ले में पहली बार कोई कुआं खोदा गया था जिससे सभी को बहुत फायदा होने वाला था।जवान लड़कियां इसलिए खुश थी कि कुँए आते जाते शोहदों की छींटाकसी से मुक्ति मिल जाएगी और समय भी बचेगा. मोहल्ले के कुछ बड़े बुजुर्ग भी आ गए और सभी ने कक्कू की बहुत तारीफ की, थोड़ी देर के लिए सब भूल गए कि कक्कू एक जुआरी है. ढोलक आ गयी और देर रात तक महिलाएं लालटेन की रोशनी में देवी गीत और भजन गाती रही . कक्कू को पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत की लोग इज्जत करते हैं । बहुत दिनों बाद रात में उसे बहुत अच्छी नींद आई।
कुएं को पक्का कराया जाए . उसके दिमाग में उधेड़बुन चल ही रही थी कि तभी अचानक एक घटना हुई. कक्कू को पकड़ने के लिए पुलिस आ गई. पुलिस ने बताया कि कक्कू के नाम रिपोर्ट दर्ज कराई गई है कि उसने दूसरे की जमीन पर कब्जा किया है और अब वहां कुआं खोद रहा है। रिपोर्ट लिखाने वाले कोई और नहीं उसका पड़ोसी महतो हैं और उनके अनुसार जिस जमीन पर कुआं खोदा गया है वह उनकी है. पुलिस के कारण कक्कू के बच्चे रोने लगे लेकिन मोहल्ले में सन्नाटा छा गया । किसी को असलियत मालूम नहीं थी। ज्यादातर लोग समझ रहे थे कि कक्कू को जुआ खेलने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। कोई भी पड़ोसी यहां तक कि उसके अपने वंश परिवार के लोग भी सामने नहीं आये। पुलिस कक्कू को पकड़ कर ले गई ।
कक्कू की चाची पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गरीबी की हजार मुसीबतें होती हैं। कभी भी, कोई भी आ सकती है। अब क्या करें? कहां जाएं ? कौन उनकी सहायता करेगा? उन्हें लगा कि बिट्टी बुआ उनकी सहायता कर सकती हैं. इसलिए बिना कोई समय गवाएं चादर ओढ़ और बच्चों की उंगली पकड़कर विट्टी बुआ के पास पहुंच गई। बुआ के पांव पकड़कर रो-रो कर सारी आप बीती सुना दी। बुआ ने उसे आश्वासन दिया कि कक्कू को कुछ नहीं होगा वह छोड़ा कर लाएंगी उसे पुलिस से। बिट्टी बुआ ने अपने भतीजे को बुलाया और आदेश दिया कि जाकर कक्कू की जमानत करवा करवा लाओ । जो भी पैसा खर्च हो उसकी चिंता मत करो।
बिट्टी बुआ जैसा कि नाम से मालूम होता है, इसी गांव की बेटी थीं और बाल विधवा थीं । बचपन में ही शादी हो गई थी और 13 - 14 साल की उम्र में गौना हो गया था। उनके पहुंचते ही पति को बड़ी माता निकली और उसे अपने साथ ले गई। सास ननद ने जीना दुश्वार कर दिया। बात-बात में ताने मारे जाते कि उसने अपने पति को खा लिया। एक दिन बात जब बर्दाश्त से बाहर हो गई तो बिट्टी ने आपा खो दिया और उसने रसोई से बबूल की मोटी लकड़ी लेकर सास और ननद की जमकर धुनाई की। फिर अपनी जान बचाने के लिए मायके की तरफ दौड़ पड़ी। मायका इतना नजदीक तो था नहीं, रास्ते में रात हो गई । तब बिट्टी ने यह सोच कर कि मनुष्य रूपी जानवरों से जंगली जानवरों के साथ रात बिता कर वह ज्यादा सुरक्षित रहेगी । इसलिए जंगल में एक पेड़ के ऊपर चढ़कर रात गुजारी। सुबह होते ही फिर दौड़ पड़ी और अपने घर पहुंच कर ही दम लिया । पिता के गले लग कर रोते-रोते सारी आप बीती सुना दी। उसके पिता भी बहुत दुखी हुए और उन्होंने कहा कि बिट्टी अब यही रहेगी और उन्होंने अपनी खेती से एक हिस्सा बिट्टी के नाम कर दिया। वह दिन और आज का दिन, बिट्टी उस गांव में रहते रहते बिट्टी से जीजी और फिर बुआ बन गई। पिता और बड़े भाई अभी दुनिया में नहीं थे पर वह अपने दोनों भतीजों के साथ रहती थीं और अपने घर की मुखिया थीं । गांव में भी लोग उनकी उम्र और नेक नियती का बहुत सम्मान करते थे और कोई भी उनकी बात टालने की हिम्मत नहीं कर सकता था । जीवन ने उन्हे जो दर्द दिया उसी का मरहम बनाकर वह गांव की महिलाओं को अक्सर लगाती थी । गांव की बहुओं का खासा ध्यान रखती थी , सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की पूजा हो, होली, दिवाली, तीज, त्यौहार कोई भी अवसर हो वह उनके लिए कुछ न कुछ जरूर करती थी ।
बिट्टी बुआ के बीच में पड़ने से कक्कू की जमानत हो गई और पुलिस ने यह भी कह दिया कि अगर आपस में समझौता हो जाए तो वह रिपोर्ट बंद कर देगी। कक्कू घर आ गए और दूसरे दिन समझौते के लिए पंचायत बैठी। पंचायत में तय हुआ कि कक्कू कुआं पाट देंगे और महतो की जमीन खाली कर देंगे। पुलिस कार्यवाही में महतो द्वारा खर्च किए गए ₹2000 भी कक्कू हर्जाने के रूप में महतो को देंगे।कक्कू के परिवार के लिए तो यह और भी बड़ी मुसीबत थी । कक्कू की चाची दौड़ कर फिर बुआ के पास गई । बिट्टी बुआ ने जब सुना तो उनकी त्योरियां चढ़ गई । और वह छड़ी के सहारे पंचायत में पहुंच गई। बुआ को देखते ही पंच खड़े हो गए.
बुआ ने कहा-
"मैंने तो सुना था कि पंच परमेश्वर होते हैं, लेकिन तुम लोगों के फैसले से तो ऐसा लगता है कि तुम लोग तो इंसान भी नहीं हो।"
कक्कू की तरफ इशारा करते हुए कहा "इसे देखो, अपने कर्मों से इसने अपने घर को नर्क बना दिया है, इसकी पत्नी और बच्चों को भरपेट खाना भी नहीं मिलता, इसकी बहू पतिव्रता और सुलक्षणा है, गांव भर की लड़कियों को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई सहित घर गृहस्थी का ज्ञान बांटती हैं. तुम्हारी बहने और बेटियां अपनी अपनी ससुराल में इस से हुनर सीख कर जाती हैं, जरा उनसे भी पूछ कर देखना कि आप लोगों ने इसे क्या सजा दी है। जो जुर्माना तुम कक्कू पर लगा रहे हो, वह कक्कू पर नहीं इस बहू पर लगा रहे हो, इसके बच्चों पर लगा रहे हो। जो लोग अपना पेट नहीं भर सकते वह तुम्हारा जुर्माना कहां से भरेंगे ?"
बुआ के पंचायत में पहुंचने की खबर जंगल में आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई थी, और बहुत सी महिलाएं दूर से पंचायत की कार्यवाही देखने पहुंच गई। कोई घूंघट की ओट से, कोई दरवाजे के पीछे से, कोई छतों के ऊपर से। बिट्टी बुआ लगातार बोले जा रही थी -
"जिस अपराध की सजा तुम लोग कक्कू को को दे रहे हो, वह तो अपराध है ही नहीं। इतने बड़े गांव में एक छोटा सा कुआ है। किसी ने यहां की जरूरत पर ध्यान नहीं दिया। पंचों को तो खुश होना चाहिए कि गांव में एक और कुआं बन गया है। जो काम 4 मजदूर एक हफ्ते में करते वह काम अकेले कक्कू ने केवल 2 दिन में कर दिया है। तुम लोगों को तो उसे शाबाशी देनी चाहिए थी, लेकिन तुम लोग उसको सजा दे रहे हो। जब तुम लोगों में कोई ऐसा है जो 2 दिन में कुआं खोद सके ?
इस गांव में एक और कुए की सख्त आवश्यकता है, जो काम पंच और पंचायत नहीं कर सकी वह कक्कू ने अपने दम पर करके दिखा दिया। तुम लोगों को नहीं मालूम कि कितनी परेशानी होती है गांव की लड़कियों और औरतों को. दो बाल्टी पानी के लिए एक-एक घंटा बर्बाद होता है कुएं पर, ऊपर से गांव के शोहदे लड़कियों और औरतों पर फब्तियां कसते हैं। महतो ! तुमने तो कक्कू के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी। कुएं पर जाते समय तुम्हारी बहुरिया के साथ गांव के मनचले रोज छेड़खानी करते हैं, कितनों के खिलाफ तुमने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई आजतक ? कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी बहू उसी कुएं में गिर के जान दे दे या किसी के साथ भाग जाए ।
तुम्हारे घर के सामने कुआं बन जाएगा तो तुम्हारी बहुरिया रोज-रोज की छेड़खानी से बच जाएगी लेकिन तुम कुआं पाटने की बात करते हो, इससे लगता है कि तुम भी मनचलों का साथ दे रहे हो."
पंचों पर घड़ों पानी पड़ गया और महतो की हालत तो ऐसी हो गई कि उसके घर में ही उसकी इज्जत तार-तार हो गई लेकिन बिट्टी बुआ यहीं नहीं रुकीं बोलती रहीं।
सभी लोग कान खोलकर सुन लें यह कुआं नहीं पटेगा। अगर महतो को चाहिए तो जुर्माना भी मैं भरूँगी, जमीन की कीमत भी मैं दूंगी और इस कुएं को पक्का भी मैं ही करवाऊंगी ताकि गांव की लड़कियों और औरतों को इसका फायदा मिले। पंचों ने जुर्माना तय कर दिया है अब पंचों को चाहिए कि वे जमीन की कीमत भी तय कर दे ताकि मैं उसका भुगतान महतो को कर दूं।
इससे पहले कि पंच कुछ कहते महतो तो खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला " बुआ मुझे माफ़ कर दो, मुझे कुछ नहीं चाहिए , आप जैसा चाहें वैसा करें " पंचों को अब कुछ करने के लिए नहीं बचा था। महतो ने फैसले की कोई गुंजाइस ही नहीं छोड़ी थी।
बिट्टी बुआ ने आगे फिर कहा " लेकिन कक्कू को सजा तो अवश्य मिलनी चाहिए और मिलेगी भी " यह सुनकर कक्कू और उसकी पत्नी दोनों सशंकित हो उठे कि एक मुशीबत टली नहीं कि दूसरी या गई ।
"पिछले काफी लंबे समय से कक्कू ने अपनी पत्नी और बच्चों का ध्यान नहीं रखा , परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया जिससे उसकी पत्नी और बच्चों को अनावश्यक रूप से अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा । कुआं का निर्माण पूरा हो जाने के बाद कक्कू मेरे यहां हरवाहे (खेतों में हल चलाने वाला) का काम करेगा, गाय और बैलों की चारा पानी करेगा। बदले में उसे भोर का चबेना और दोपहर की खुराकी मिलेगी और उसकी बहू को १५० रुपया महीना तनख्वाह का मिलेगा ताकि उसके घर का खर्चा चल सके और बच्चों की पढ़ाई लिखाई भी हो सके. कक्कू को जब कभी इससे अच्छी नौकरी मिले तो जा सकता है।
"कक्कू तुम्हें क्या यह सजा स्वीकार है ? कक्कू की आंखों से आंसू बह निकले, उसने कहा " हाँ बुआ मैं करूंगा और आपको अच्छा व्यक्ति बन के दिखाऊंगा"
बिट्टी बुआ ने कक्कू द्वारा खोदे गए कुए को पक्का करवा दिया और मोहल्ले के सारे लोग इसका भरपूर इस्तेमाल करने लगे. अब न बिट्टी बुआ अब इस दुनिया में है और न हीं कक्कू लेकिन कक्कू का कुआं आज भी है और गांव के लिए एक बहुत बड़ा पहचान चिन्ह है. कक्कू का बेटा सेना में काम करता था जो सेवानिवृत्त के बाद अब गांव के उसी पुश्तैनी मकान में रहता है. गांव में भी काफी परिवर्तन आ गया है पक्की सड़क बन गई है . कस्बे के बस अड्डे से गांव में कक्कू के कुआँ तक ऑटो और टेंपू चलते हैं, सवारियों को देखकर टेंपो वाले चिल्लाते हैं, कक्कू का कुआँ , कक्कू का कुआं।
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- शिव प्रकाश मिश्रा ©
मूलकृति - 15 अगस्त 2020
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प्रकाशित - माधव भूमि २७ फरवरी २०२१