शनिवार, 27 दिसंबर 2025

गौरैया का रहस्य

 



गौरैया का रहस्य: एक छोटी उड़ान, एक बड़ा बदलाव

हरे-भरे खेतों और सुनहरी धूप के बीच बसे 'चंदनपुर' गाँव में एक सदियों पुराना आम का पेड़ था। उस पेड़ की घनी छाँव में एक नन्ही, चंचल गौरैया रहती थी। यूँ तो वह साधारण भूरे रंग की थी, लेकिन उसकी आँखों में सुबह की पहली किरण जैसी चमक और एक अजीब-सा दृढ़ निश्चय था।

गाँव के स्कूल की घंटी बजते ही, बच्चे रोज़ पेड़ के नीचे मुट्ठी भर बाजरा और चावल के दाने डालते और एक मिट्टी के सकोरे में ताज़ा पानी भर देते। दाना गिरते ही पेड़ पर जैसे मेला लग जाता — लाल चोंच वाले शोर मचाने वाले तोते, नीले पंखों वाली चमकीली मैना, और गुटरगूं करते गोल-मटोल कबूतरों की भीड़ लग जाती।

लेकिन वह नन्ही गौरैया उन सब से अलग थी। वह कभी दाने के लिए छीना-झपटी नहीं करती। वह शांति से एक ऊँची डाली पर बैठी इंतज़ार करती। जब बाकी सभी ताकतवर और बड़े पक्षी अपना पेट भरकर उड़ जाते, तब वह नीचे उतरती। वह खुद खाने के बजाय, अपनी छोटी सी चोंच में सबसे बड़े और अच्छे दाने चुनकर भरती और फुर्र से उड़ जाती। उसकी उड़ान हमेशा एक ही दिशा में होती — गाँव के पुराने, सूखे कुएँ के पीछे वाली घनी कँटीली झाड़ियों की ओर।

यह सिलसिला हफ्तों तक चला।

एक दिन 10 साल के रोहन ने अपनी दोस्त मीरा से कहा, "तुमने ध्यान दिया? यह गौरैया खुद कुछ नहीं खाती, बस दाने लेकर भाग जाती है। पक्का यह बहुत लालची है और अपना खजाना जमा कर रही है!" मीरा ने सिर हिलाते हुए कहा, "नहीं रोहन, मुझे नहीं लगता वह लालची है। उसकी आँखों में लालच नहीं, कोई रहस्य है। कल हम इसका पीछा करेंगे।"

अगले दिन, स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चों की एक टोली ने जासूसों की तरह दबे पाँव उस नन्ही गौरैया का पीछा किया। वे झाड़ियों से बचते-बचाते, बिना आवाज़ किए पुराने कुएँ तक पहुँचे। जब उन्होंने कँटीली झाड़ियों के बीच से झाँककर देखा, तो उनके कदम वहीं ठिठक गए और आँखें फटी की फटी रह गईं।

वहाँ कोई खजाना नहीं था। वहाँ तो एक छोटी सी 'अस्पताल' और 'अनाथालय' चल रहा था!

एक पत्थर के पास एक कबूतर बैठा था जिसका पंख बुरी तरह टूट चुका था। एक टूटे हुए घोंसले में बुलबुल के तीन बेसहारा बच्चे चीं-चीं कर रहे थे, और एक डरी-सहमी, कमज़ोर गिलहरी एक कोने में दुबकी थी।

नन्ही गौरैया अपनी चोंच से लाए हुए दाने एक-एक करके बुलबुल के बच्चों के मुँह में डाल रही थी। उसके बाद, उसने पास पड़े एक चौड़े पत्ते पर ओस और बारिश का जमा हुआ पानी अपनी चोंच में लिया और उस घायल कबूतर और गिलहरी को पिलाया।

इतनी छोटी सी जान, लेकिन उसका काम इतना महान! वह नन्ही गौरैया हर दिन अपने हिस्से का भोजन छोड़ देती थी ताकि वे बेसहारा जीव ज़िंदा रह सकें जो खुद उड़कर खाना नहीं खोज सकते थे।

यह दृश्य देखकर बच्चों के गले भर आए। रोहन को अपने 'लालची' वाले शब्द पर बहुत पछतावा हुआ।

अगले ही दिन से रहस्यमयी झाड़ियों के पास का नज़ारा बदल गया। बच्चों ने सिर्फ दाने ही नहीं, बल्कि फलों के टुकड़े और रुई भी वहाँ रखनी शुरू कर दी। कुछ बड़े लड़कों ने मिलकर लकड़ियों और सूखी घास से घायलों के लिए एक छोटी, सुरक्षित झोपड़ी बना दी।

बच्चों के इस काम को देखकर गाँव वाले भी हैरान रह गए। जब सरपंच और बाकी बड़ों को 'गौरैया का रहस्य' पता चला, तो पूरे गाँव की सोच ही बदल गई। जो लोग पहले सिर्फ अपने खेतों और घरों में व्यस्त रहते थे, उन्होंने तय किया कि गाँव के हर घर के बाहर पक्षियों और जानवरों के लिए भोजन और पानी रखा जाएगा।

धीरे-धीरे उस गाँव की हवा में करुणा, दया और प्रेम घुल गया। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। और यह पूरा बदलाव एक छोटी सी, भूरे रंग की गौरैया की निःस्वार्थ दया से शुरू हुआ था।

कुछ दिनों बाद, उसी आम के पेड़ के नीचे सितारों से भरे आसमान को देखते हुए स्कूल की शिक्षिका ने बच्चों से एक बहुत गहरी बात कही:

“बच्चों, याद रखना... असली दयालुता कभी शोर नहीं मचाती। वह अपना काम खामोशी से करती है — बिल्कुल हमारी इस नन्ही गौरैया के पंखों की तरह। लेकिन जब वह खामोश दयालुता काम करती है, तो उसकी गूँज पीढ़ियों तक और पूरे समाज में सुनाई देती है।”

🌟 इस कहानी से मिलने वाली अहम सीख (Learning Lessons):

  1. आकार नहीं, इरादे मायने रखते हैं: गौरैया बहुत छोटी थी, लेकिन उसका दिल और उसके काम किसी भी बड़े और ताकतवर इंसान से कहीं ज्यादा बड़े थे। आप कितने भी छोटे क्यों न हों, आपका एक अच्छा कदम बड़ा बदलाव ला सकता है।

  2. सच्चा नेतृत्व (True Leadership) और निःस्वार्थ सेवा: गौरैया ने अपने हिस्से का खाना दूसरों के लिए छोड़ दिया। सच्चा लीडर वह है जो अपनी ज़रूरतों से पहले दूसरों की तकलीफों को समझे।

  3. दूसरों को जज करने में जल्दबाज़ी न करें: बच्चों ने पहले सोचा कि गौरैया लालची है। हमें किसी के काम का पूरा सच जाने बिना उसके बारे में गलत राय नहीं बनानी चाहिए।

  4. अच्छाई संक्रामक (Infectious) होती है: गौरैया की एक छोटी सी दयालुता ने पहले बच्चों को और फिर पूरे गाँव को बदल दिया। जब आप कुछ अच्छा करते हैं, तो लोग आपको देखकर प्रेरित होते हैं।

  5. खामोश करुणा: दिखावे के लिए की गई मदद से कहीं ज्यादा असरदार वह मदद होती है जो बिना किसी शोर-शराबे और स्वार्थ के, चुपचाप की जाती है।

ज्ञान का दीपक








 ज्ञान का दीपक 

पहाड़ों से घिरी एक शांत घाटी में कावी नाम का एक बालक रहता था। न घर, न परिवार — बस एक बेचैन मन और खोजती हुई निगाहें। वह गाँव-गाँव घूमकर छोटे-मोटे काम करता और पेट भर लेता, पर उसकी असली भूख रोटी की नहीं थी — वह जीवन का अर्थ जानना चाहता था।

वह अकसर सोचता —
“लोग उजाले का पीछा तो करते हैं, पर अपने भीतर के अंधेरे से क्यों डरते हैं?”

एक दिन थककर वह एक पुराने, जर्जर मंदिर के आँगन में बैठ गया। दीवारों पर गहरी दरारें थीं, बेलें लटक रही थीं, और धूल ने सब कुछ फीका कर दिया था। बैठने की जगह साफ़ करते समय उसका हाथ किसी धातु से टकराया। मिट्टी हटाई तो वहाँ एक पुराना पीतल का दीपक था — धूल, मकड़ी के जाल और समय से ढका हुआ।

कावी ने अपने फटे दुपट्टे से उसे धीरे-धीरे साफ़ किया। जैसे ही उसकी हथेलियाँ दीपक पर फिरीं, उसमें एक सुनहरी लौ प्रज्ज्वलित हो उठी। मंदिर का अंधकार सहसा पीछे हट गया। वह चकित था — इस लौ में एक अनकही शांति और गहरी शक्ति थी।

उस रात वह दीपक साथ लेकर चला। राह उजली थी, और उसे लगा मानो उसे अपना सच्चा साथी मिल गया हो। वह बोला —
“अब मैं कभी अंधेरे में नहीं रहूँगा।”

परन्तु घने जंगल में प्रवेश करते ही कोहरा छा गया। हवा तेज़ हुई और दीपक की लौ डगमगाने लगी। प्रकाश इतना मंद हो गया कि पाँव तले का रास्ता भी मुश्किल से दिख रहा था। क्रोध और निराशा में कावी बोला —
“तेरी रोशनी का क्या अर्थ, यदि अंधेरे में तू स्वयं ही बुझने लगे?”

वह पास बहती एक पतली जलधारा के किनारे बैठ गया। पानी में दीपक की काँपती परछाईं उसे अपने ही भीतर के भ्रम जैसी लगी। तभी उसके मन में एक विचार कौंधा —
“शायद दोष रोशनी का नहीं… मेरी समझ का है।”

सुबह होते ही वह फिर उसी मंदिर लौटा। वहाँ एक वृद्ध पुजारी शांत भाव से बैठे थे। उन्होंने मुस्कराकर कहा —
“लगता है, तुम्हें बुद्धि का दीप मिल गया है।”

कावी चकित होकर बोला —
“पर यह तो रात में मेरा साथ भी नहीं दे पाया।”

पुजारी ने मृदु स्वर में कहा —
“पुत्र, केवल प्रकाश पर्याप्त नहीं होता।
यदि मन अंधा हो, तो दीप भी मार्ग नहीं दिखाता।
प्रकाश केवल दिखाता है —
पर बुद्धि बताती है कि चलना किस ओर है।”

उन बातों ने कावी को भीतर तक झकझोर दिया।

अब वह फिर यात्राओं पर निकला — पर इस बार जिज्ञासा के साथ संयम, और खोज के साथ समझ।
वह किसानों से बीज के धैर्य को समझता, बढ़इयों से समय और सटीकता सीखता, यात्रियों से दूर देशों के अनुभव सुनता।
जैसे-जैसे वह सीखता और बाँटता गया, दीपक की लौ धीरे-धीरे स्थिर और उज्ज्वल होती गई।

सालों बाद, कावी ने उसी गाँव में मंदिर के पास एक छोटा विद्यालय बनाया। हर शाम वह पुराना दीपक जलाता और बच्चों से कहता —
“इस दीप की लौ से अपनी बाती जलाओ —
ज्ञान बाँटो, ताकि यह प्रकाश जीवित रहे।”

धीरे-धीरे मंदिर में सैकड़ों दीप जलने लगे।
पर आश्चर्य — पुराना दीपक बुझा नहीं…
उसकी लौ और तेज़, और प्रखर हो गई।

कावी मुस्कुराया और बोला —
“प्रकाश बाँटने से घटता नहीं —
और बुद्धि भी वैसी ही है…
जितनी बाँटो, उतनी बढ़ती जाती है।”

लोगों ने उस स्थान को नाम दिया —
“दीप-ज्ञान मंदिर” —
वह मंदिर जहाँ दीप केवल उजाला नहीं देता था — दिशा भी देता था।

और वहाँ आने वाला हर यात्री यह सीख लेकर लौटता —
“प्रकाश रास्ता दिखाता है,
पर बुद्धि सिखाती है कि चलना कैसे है।”


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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

कक्कू का कुआं




 वैसे तो उसका नाम गोवर्धन सिंह था, लेकिन बड़े भाइयों के बच्चे उसे कक्कू कहकर बुलाते थे। यह नाम उसके साथ ऐसा चिपक गया कि मोहल्ले के सारे बच्चों के साथ‑साथ उसके अपने बच्चे भी उसे कक्कू कहकर पुकारते थे। अब पूरे गाँव में वह कक्कू के नाम से ही लोकप्रिय था।

लगभग छह फुट लंबे कक्कू की आँखें जैसे बोलती थीं, लेकिन शर्म से हमेशा झुकी रहती थीं। शरीर हष्ट‑पुष्ट था, पर बेतरतीब बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी के कारण चेहरे पर अजीब‑सी रिक्तता और दरिद्रता का आभास होता था। यह बात सही भी थी — गरीबी जैसे उसे वरदान में मिली थी।

जाने कितने काम‑धंधे उसने आज़माए, लेकिन कभी फायदा नहीं हुआ। हमेशा अपनी पूँजी गंवा बैठता। आखिर किस्मत, बुरी संगत और जल्दी पैसे कमाने की लालसा ने उसे जुआरी बना दिया। कौड़ी खेलने में माहिर कक्कू छह कौड़ी फेंकता था। जुए की लत ने उसे एड़ी से चोटी तक कर्जदार बना दिया था। खेत, टपरिया और पत्नी के गहने सब बिक चुके थे, फिर भी जुए की आदत नहीं छूटी थी। उसे विश्वास था कि कभी न कभी उसकी किस्मत ज़रूर बदलेगी। कई‑कई दिन तक उसका कुछ अता‑पता नहीं रहता; कभी इस गाँव तो कभी उस गाँव, वह दूर‑दूर तक जुआ खेलने जाया करता था। उसके इन कारनामों ने उसकी पत्नी और बच्चों की ज़िंदगी बदहाल कर दी थी। घर में फाँकों की नौबत आ गई थी। बच्चों की पढ़ाई तो छोड़िए, दो समय का खाना जुटाना भी मुश्किल हो गया था।

उसकी पत्नी बहुत सुशीला स्त्री थी। सब कुछ बर्दाश्त कर लेती थी, किंतु अपनी परेशानियाँ कभी भी अपने मायके या गाँव में किसी से नहीं बताती थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह पति से भी झगड़ती नहीं थी। कक्कू की पत्नी होने की वजह से मोहल्ले के लड़के‑लड़कियाँ उसे भी कक्कू की चाची कहते थे।

वह सिलाई, कढ़ाई और बुनाई में निपुण थी। किसी का स्वेटर एक बार देख ले तो तुरंत बुनाई शुरू कर देती थी। क्रोशिया पर तो उसका हाथ ऐसा चलता था कि देखने वाले दंग रह जाते थे। गाँव भर की शादी योग्य लड़कियाँ उसे घेरे रहती थीं ताकि ससुराल जाकर अपना हुनर दिखा सकें। किसी को सिलाई सीखनी होती थी, किसी को बुनाई, तो किसी को क्रोशिया में हाथ साफ करना होता था।

लेकिन इन सब से पेट कहाँ भरता है! मोहल्ले वालों से उनकी स्थिति छिपी नहीं थी। इसलिए कक्कू की चाची मोहल्ले वालों के छोटे‑मोटे काम भी करती रहती थी — किसी के लिए सत्तू पीस देती, किसी का बेसन, किसी के मसाले, किसी की साड़ी में फाल लगाती या किसी का ब्लाउज सिल देती। इन कामों के बदले कुछ न कुछ मिल जाता था, पर इतना नहीं कि बच्चों का पेट आराम से भर सके।

जब वह घर में किसी के सत्तू पीस रही होती, तो बच्चे ललचाई निगाहों से देखते और जमीन पर गिरे हुए दाने उठाकर खाते। तब उसका कलेजा मुँह को आ जाता, लेकिन फिर भी वह सोचती — “जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे।”

बच्चे मोहल्ले के किसी न किसी घर से प्रतिदिन मट्ठा माँगकर लाते, यही उनका सुबह का नाश्ता होता। कभी कुछ न मिलता तो वह बाजरा उबालकर उसके पानी से बच्चों का पेट भर देती। उस समय बांग्लादेश युद्ध चल रहा था, महँगाई आसमान पर थी और मोटे अनाज तक की भारी किल्लत थी।

मोहल्ले की किसी स्त्री के यहाँ पूजा का उद्यापन होता, तो उनके बच्चों को कन्या और लंगूर के रूप में खाने के लिए बुलाया जाता। कोई स्त्री अगर सुहागिनों को खिलाने का व्रत तोड़ती, तो कक्कू की चाची को अवश्य आमंत्रित करती और घर ले जाने के लिए भी कुछ न कुछ दे देती, ताकि इसी बहाने परिवार का पेट कम से कम एक दिन तो भर सके।

समय हर किसी की हर कदम पर परीक्षा लेता है, लेकिन शायद गरीब की परीक्षा सबसे कठिन होती है। कक्कू की चाची को मलेरिया हो गया और उन्होंने चारपाई पकड़ ली। बच्चों पर हर तरफ से मुसीबत टूट पड़ी। संयोग से उसी दिन कक्कू घर आ गया, लेकिन घर में पानी तक नहीं था।

कुएँ से पानी निकालकर लाता भी कौन? चाची बीमार थीं और बच्चे इतने बड़े नहीं थे कि पानी निकाल सकें। चाची ही रोज़ सुबह‑सुबह चादर ओढ़कर, घूँघट निकालकर पानी भर लाती थीं। उस दिन कक्कू ने भी सहृदयता दिखाई — या मजबूरी में ही सही — पानी लेने के लिए वह बाल्टी लेकर कुएँ पर गया।

गाँव में एक ही कुआँ था। कुआँ क्या, छोटी‑सी कुइयाँ थी और एक बार में केवल एक ही व्यक्ति पानी निकाल सकता था। इसलिए अक्सर पानी भरने वालों की लंबी कतार लग जाती और पानी लाने में घंटों लग जाते।

कक्कू का यह नया अनुभव था। वह भी कतार में खड़ा हो गया, लेकिन हद तो तब हो गई जब एक घंटे इंतजार के बाद उसका नंबर आने ही वाला था। मोहल्ले की जो लड़की पानी भर रही थी, वह केवल एक घड़ा और एक बाल्टी लेकर आई थी। जैसे ही वह घड़ा भरती, उसकी बहन दूसरा खाली घड़ा लाकर रख देती और भरा हुआ घड़ा लेकर चली जाती। यह क्रम एक घंटे तक चलता रहा। जब यह कक्कू को असहनीय हो गया, तो वह पैर पटकते हुए खाली बाल्टी लेकर घर लौट आया और खड़े‑खड़े बाल्टी फेंक दी।

इतना संकेत परिवार के लिए बहुत था। बच्चे दुबक गए और पत्नी भीषण बुखार के बाद भी चारपाई से उठकर आ गई और पूछा — “क्या हुआ?” लेकिन कक्कू ने कोई जवाब नहीं दिया, बस फावड़ा उठाकर घर से बाहर चला गया। इतने दिन बाद पति घर आया और उसे पानी भी नहीं मिला — यह सोचकर चाची मन ही मन बहुत आहत हो रही थीं। बाहर आकर देखा तो कक्कू घर के सामने कुछ दूर पर खुदाई कर रहा था।

चाची ने तेज बुखार के बाद भी हिम्मत करके चादर ओढ़ी, घूँघट निकालकर कुएँ से पानी भर लायी और पानी लेकर कक्कू को पिलाने गई। लेकिन कक्कू ने साफ कह दिया कि वह अपना खुद का कुआँ खोदकर ही पानी पिएगा। चाची ने बहुत अनुरोध किया, पर वह नहीं माने।

कहावत है कि जवान आदमी अगर धरती पर ठीक से पैर पटक दे तो पानी निकल आता है। और कक्कू तो फावड़ा लेकर पूरी लगन से जुटा हुआ था। देर रात तक खोदता रहा। शायद रात ठीक से नींद भी नहीं आई, इसलिए सुबह तड़के ही फिर खुदाई शुरू कर दी। कहा जाता है कि मेहनत का फल मीठा होता है, और कक्कू ने शायद पहली बार दृढ़ संकल्प के साथ मेहनत से कोई काम किया था।

दूसरे दिन दोपहर बाद कक्कू द्वारा खोदे जा रहे कुएँ में पानी निकल आया। यह उसके लिए बहुत संतोष की बात थी, लेकिन उससे भी ज्यादा संतोष उसकी पत्नी को था — क्योंकि उसके पति ने पहली बार इतनी लगन और कड़ी मेहनत से अकेले दम पर इतना बड़ा काम किया था।

मोहल्ले के बच्चे इकट्ठे हो गए, जश्न का माहौल बन गया। अपने‑अपने घर से जो भी हो सका — गुड़, बताशा, गुड़धानी आदि ले आए और खुशी का आदान‑प्रदान किया गया। मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाएँ भी आ गईं और कक्कू को गुड़ खिलाकर आशीर्वाद दिया। सभी बहुत खुश थे क्योंकि मोहल्ले में पहली बार कोई कुआँ खोदा गया था, जिससे सबको बहुत फायदा होने वाला था।

जवान लड़कियाँ इसलिए खुश थीं कि कुएँ पर आते‑जाते शोहदों की छींटाकशी से मुक्ति मिल जाएगी और समय भी बचेगा। मोहल्ले के कुछ बड़े बुजुर्ग भी आ गए और सभी ने कक्कू की बहुत तारीफ की। थोड़ी देर के लिए सब भूल गए कि कक्कू एक जुआरी है। ढोलक आ गई और देर रात तक महिलाएँ लालटेन की रोशनी में देवी गीत और भजन गाती रहीं।

कक्कू को पहली बार महसूस हुआ कि मेहनत की लोग इज्जत करते हैं। बहुत दिनों बाद रात में उसे बहुत अच्छी नींद आई।

कुएँ को पक्का कराने की उधेड़बुन उसके दिमाग में चल ही रही थी कि तभी अचानक एक घटना हुई। कक्कू को पकड़ने के लिए पुलिस आ गई। पुलिस ने बताया कि कक्कू के नाम रिपोर्ट दर्ज कराई गई है कि उसने दूसरे की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है और अब वहाँ कुआँ खोद रहा है। रिपोर्ट लिखाने वाला कोई और नहीं, उसका पड़ोसी महतो था। उनके अनुसार जिस ज़मीन पर कुआँ खोदा गया है, वह उनकी है।

पुलिस के आने से कक्कू के बच्चे रोने लगे और मोहल्ले में सन्नाटा छा गया। किसी को असलियत मालूम नहीं थी। ज़्यादातर लोग समझ रहे थे कि कक्कू को जुआ खेलने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। कोई भी पड़ोसी, यहाँ तक कि उसके अपने वंश परिवार के लोग भी सामने नहीं आए। पुलिस कक्कू को पकड़कर ले गई।

कक्कू की चाची पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गरीबी की हजार मुसीबतें होती हैं, कभी भी, कहीं से भी आ सकती हैं। अब क्या करें? कहाँ जाएँ? कौन उनकी सहायता करेगा? उन्हें लगा कि बिट्टी बुआ ही मदद कर सकती हैं। इसलिए बिना समय गँवाए, चादर ओढ़कर और बच्चों की उँगली पकड़कर वह बिट्टी बुआ के पास पहुँच गईं। बुआ के पाँव पकड़कर रो‑रोकर सारी आपबीती सुना दी।

बुआ ने उसे आश्वासन दिया कि कक्कू को कुछ नहीं होगा, वह उसे पुलिस से छुड़ाकर लाएँगी। बिट्टी बुआ ने अपने भतीजे को बुलाया और आदेश दिया कि जाकर कक्कू की ज़मानत करवा लाओ। जो भी पैसा खर्च हो, उसकी चिंता मत करो।

बिट्टी बुआ, जैसा कि नाम से मालूम होता है, इसी गाँव की बेटी थीं और बाल विधवा थीं। बचपन में ही शादी हो गई थी और 13–14 साल की उम्र में गौना हो गया था। उनके पहुँचते ही पति को बड़ी माता निकली और उसे अपने साथ ले गई। सास‑ननद ने जीना दुश्वार कर दिया। बात‑बात पर ताने मारे जाते कि उसने अपने पति को खा लिया।

एक दिन जब बात बर्दाश्त से बाहर हो गई तो बिट्टी ने आपा खो दिया और रसोई से बबूल की मोटी लकड़ी उठाकर सास और ननद की जमकर धुनाई कर दी। फिर अपनी जान बचाने के लिए मायके की तरफ दौड़ पड़ी। मायका इतना नज़दीक नहीं था, रास्ते में रात हो गई। तब बिट्टी ने यह सोचकर कि मनुष्य रूपी जानवरों से जंगली जानवरों के साथ रात बिताना ज़्यादा सुरक्षित होगा, जंगल में एक पेड़ पर चढ़कर रात गुज़ारी। सुबह होते ही फिर दौड़ पड़ी और अपने घर पहुँचकर ही दम लिया।

पिता के गले लगकर रोते‑रोते सारी आपबीती सुना दी। पिता बहुत दुखी हुए और बोले कि बिट्टी अब यहीं रहेगी। उन्होंने अपनी खेती से एक हिस्सा बिट्टी के नाम कर दिया। वह दिन और आज का दिन — बिट्टी उस गाँव में रहते‑रहते जीजी और फिर बुआ बन गईं। पिता और बड़े भाई अब दुनिया में नहीं थे, पर वह अपने दोनों भतीजों के साथ रहती थीं और अपने घर की मुखिया थीं। गाँव में भी लोग उनकी उम्र और नेक नियति का बहुत सम्मान करते थे। कोई भी उनकी बात टालने की हिम्मत नहीं करता था।

जीवन ने उन्हें जो दर्द दिया, उसी का मरहम बनाकर वह गाँव की महिलाओं को अक्सर लगाती थीं। गाँव की बहुओं का खासा ध्यान रखती थीं। सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की पूजा हो, होली, दिवाली, तीज‑त्योहार — हर अवसर पर वह उनके लिए कुछ न कुछ ज़रूर करती थीं।

गाँव की बहुओं का वह खासा ध्यान रखती थीं। सावन में झूला डालना हो, नवरात्रि की पूजा हो, होली, दिवाली, तीज‑त्योहार — किसी भी अवसर पर वह उनके लिए कुछ न कुछ ज़रूर करती थीं।

बिट्टी बुआ के बीच में पड़ने से कक्कू की ज़मानत हो गई और पुलिस ने यह भी कह दिया कि अगर आपस में समझौता हो जाए तो रिपोर्ट बंद कर दी जाएगी। कक्कू घर आ गया और दूसरे दिन समझौते के लिए पंचायत बैठी। पंचायत में तय हुआ कि कक्कू कुआँ पाट देगा और महतो की ज़मीन खाली कर देगा। पुलिस कार्यवाही में महतो द्वारा खर्च किए गए ₹2000 भी कक्कू हर्जाने के रूप में देगा। यह कक्कू के परिवार के लिए और भी बड़ी मुसीबत थी।

कक्कू की चाची दौड़कर फिर बुआ के पास गईं। बिट्टी बुआ ने जब सुना तो उनकी त्योरियाँ चढ़ गईं और वह छड़ी के सहारे पंचायत में पहुँच गईं। बुआ को देखते ही पंच खड़े हो गए।

बुआ ने कहा —

“मैंने तो सुना था कि पंच परमेश्वर होते हैं, लेकिन तुम लोगों के फैसले से तो ऐसा लगता है कि तुम लोग इंसान भी नहीं हो।”

कक्कू की तरफ इशारा करते हुए बोलीं —

“इसे देखो, अपने कर्मों से इसने अपने घर को नर्क बना दिया है। इसकी पत्नी और बच्चों को भरपेट खाना भी नहीं मिलता। इसकी बहू पतिव्रता और सुलक्षणा है, गाँव भर की लड़कियों को सिलाई, बुनाई, कढ़ाई सहित गृहस्थी का ज्ञान बाँटती है। तुम्हारी बहनें और बेटियाँ अपनी‑अपनी ससुराल में इससे हुनर सीखकर जाती हैं। ज़रा उनसे भी पूछो कि तुम लोगों ने इसे क्या सज़ा दी है। जो जुर्माना तुम कक्कू पर लगा रहे हो, वह कक्कू पर नहीं, उसकी बहू और बच्चों पर लगा रहे हो। जो लोग अपना पेट नहीं भर सकते, वे तुम्हारा जुर्माना कहाँ से भरेंगे?”

बुआ के पंचायत में पहुँचने की खबर जंगल में आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई। बहुत‑सी महिलाएँ दूर से पंचायत की कार्यवाही देखने पहुँच गईं — कोई घूँघट की ओट से, कोई दरवाज़े के पीछे से, कोई छतों के ऊपर से। बिट्टी बुआ लगातार बोलती जा रही थीं —

“जिस अपराध की सज़ा तुम लोग कक्कू को दे रहे हो, वह तो अपराध है ही नहीं। इतने बड़े गाँव में एक छोटा‑सा कुआँ है। किसी ने यहाँ की ज़रूरत पर ध्यान नहीं दिया। पंचों को तो खुश होना चाहिए कि गाँव में एक और कुआँ बन गया है। जो काम चार मज़दूर एक हफ्ते में करते, वह काम अकेले कक्कू ने केवल दो दिन में कर दिया है। तुम लोगों को तो उसे शाबाशी देनी चाहिए थी, लेकिन तुम लोग उसे सज़ा दे रहे हो। तुममें से कौन है जो दो दिन में कुआँ खोद सके?”

“इस गाँव में एक और कुएँ की सख्त आवश्यकता है। जो काम पंच और पंचायत नहीं कर सके, वह कक्कू ने अपने दम पर करके दिखा दिया। तुम लोगों को नहीं मालूम कि कितनी परेशानी होती है गाँव की लड़कियों और औरतों को। दो बाल्टी पानी के लिए एक‑एक घंटा बर्बाद होता है कुएँ पर, ऊपर से गाँव के शोहदे लड़कियों और औरतों पर फब्तियाँ कसते हैं। महतो! तुमने तो कक्कू के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाई। कुएँ पर जाते समय तुम्हारी बहुरिया के साथ गाँव के मनचले रोज़ छेड़खानी करते हैं। कितनों के खिलाफ तुमने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई आज तक? कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी बहू उसी कुएँ में गिरकर जान दे दे या किसी के साथ भाग जाए।”

“तुम्हारे घर के सामने कुआँ बन जाएगा तो तुम्हारी बहुरिया रोज़‑रोज़ की छेड़खानी से बच जाएगी। लेकिन तुम कुआँ पाटने की बात करते हो। इससे लगता है कि तुम भी मनचलों का साथ दे रहे हो।”

पंचों पर घड़ों पानी पड़ गया और महतो की हालत तो ऐसी हो गई कि उसके घर में ही उसकी इज्ज़त तार‑तार हो गई। लेकिन बिट्टी बुआ यहीं नहीं रुकीं, बोलती रहीं।

“सभी लोग कान खोलकर सुन लें — यह कुआँ नहीं पटेगा। अगर महतो को चाहिए तो जुर्माना भी मैं भरूँगी, ज़मीन की कीमत भी मैं दूँगी और इस कुएँ को पक्का भी मैं ही करवाऊँगी ताकि गाँव की लड़कियों और औरतों को इसका फायदा मिले। पंचों ने जुर्माना तय कर दिया है, अब पंचों को चाहिए कि वे ज़मीन की कीमत भी तय कर दें ताकि मैं उसका भुगतान महतो को कर दूँ।”

इससे पहले कि पंच कुछ कहते, महतो खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला —

“बुआ, मुझे माफ़ कर दो। मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप जैसा चाहें वैसा करें।”

पंचों के पास अब कुछ करने को नहीं बचा था। महतो ने फैसले की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी।

बिट्टी बुआ ने आगे कहा —

“लेकिन कक्कू को सज़ा तो अवश्य मिलनी चाहिए और मिलेगी भी।”

यह सुनकर कक्कू और उसकी पत्नी दोनों सशंकित हो उठे कि एक मुसीबत टली नहीं कि दूसरी आ गई।

“पिछले काफी लंबे समय से कक्कू ने अपनी पत्नी और बच्चों का ध्यान नहीं रखा। परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया, जिससे उसकी पत्नी और बच्चों को अनावश्यक रूप से अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। कुआँ का निर्माण पूरा हो जाने के बाद कक्कू मेरे यहाँ हरवाहे (खेतों में हल चलाने वाला) का काम करेगा, गाय और बैलों की चारा‑पानी करेगा। बदले में उसे भोर का चबेना और दोपहर की खुराक मिलेगी। उसकी बहू को 150 रुपये महीना तनख्वाह मिलेगी ताकि घर का खर्चा चल सके और बच्चों की पढ़ाई‑लिखाई भी हो सके। कक्कू को जब कभी इससे अच्छी नौकरी मिले तो जा सकता है।”

“कक्कू, तुम्हें क्या यह सज़ा स्वीकार है?”

कक्कू की आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा —

“हाँ बुआ, मैं करूंगा और आपको अच्छा व्यक्ति बनकर दिखाऊँगा।”

बिट्टी बुआ ने कक्कू द्वारा खोदे गए कुएँ को पक्का करवा दिया और मोहल्ले के सारे लोग इसका भरपूर इस्तेमाल करने लगे। अब न बिट्टी बुआ इस दुनिया में हैं और न ही कक्कू, लेकिन कक्कू का कुआँ आज भी है और गाँव के लिए एक बड़ा पहचान चिन्ह है।

कक्कू का बेटा सेना में काम करता था। सेवानिवृत्ति के बाद अब वह गाँव के उसी पुश्तैनी मकान में रहता है। गाँव में भी काफी परिवर्तन आ गया है। पक्की सड़क बन गई है। कस्बे के बस अड्डे से गाँव में कक्कू के कुएँ तक ऑटो और टेंपो चलते हैं। सवारियों को देखकर टेंपो वाले चिल्लाते हैं —

“कक्कू का कुआँ, कक्कू का कुआँ।”



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  - शिव प्रकाश मिश्रा  © 

  मूलकृति - 15 अगस्त 2020 

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प्रकाशित - माधव भूमि २७ फरवरी २०२१ 



मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

स्वामी संपूर्णानंद सरस्वती

 


बद्रीनाथ मंदिर में दर्शन के बाद मन बहुत प्रसन्न था. मंदिर के गरम पानी के कुंड में नहाने जैसा  आनंद तो किसी पांच सितारा होटल के स्विमिंग पूल में भी कभी नहीं आया था. भगवान बद्री विशाल के दर्शन के बाद जैसे मन  बहुत शांत हो गया था. इसके बाद मुझे  दोस्तों के साथ व्यास व गणेश मंदिर तथा भीम पुल देखने जाना था . इसके आगे माना गांव था जो  सीमा पर भारत का आखिरी गांव था और उसके बाद चीन की सीमा प्रारंभ होती है. मंदिर के सामने से निकलते हुए  बद्रीनाथ मंदिर के कुछ  फोटो लेते हुए धीमे-धीमे आगे बढ़ रहा था कि अचानक मेरी निगाह एक सन्यासी और सन्यासिन पर पड़ी जो सामान्य सन्यासियों से सर्वथा भिन्न लग रहे थे. 

लगभग 6 फुट के स्वामी जी और 6 फुट से कुछ ही कम साध्वी. ऊपर से नीचे तक सलीके से पहने गए भगवा वस्त्र, गोरा चिटटा रंग और आकर्षक चेहरा सब मिलाकर उन दोनों के व्यक्तित्व को अत्यधिक प्रभावशाली और गरिमामयी  बना रहे थे. सन्यासी की  आंखों पर   काले - पतले फ्रेम का चश्मा, और मस्तक  पर लाल पीले चंदन का तिलक, बढे  हुए खिचड़ी बाल और बिना दाढ़ी मूछ का साफ सुथरा चेहरा. साध्वी ने बिना फ्रेम का चश्मा लगाया  था और माथे पर लाल पीले चंदन का तिलक. सिर के लगभग सफेद हो चुके बालों के साथ गंभीर और मोहक छवि. दोनों की उम्र 60 से 65 वर्ष के बीच होगी. मुझे लगा कि शायद किसी फिल्म या टीवी सीरियल की शूटिंग हो रही है, इसलिए मैं ठिठक गया और इधर उधर निगाह दौड़ाई लेकिन कहीं कुछ नजर नहीं आया. सन्यासी का चेहरा मुझे परिचित जैसा क्यों  लग रहा था? सोचा किसी धार्मिक टीवी चैनल पर प्रवचन करते देखा होगा.  लेकिन अचानक जैसे मुझे सब कुछ  याद आ रहा था और मैं तेज कदमों से उन सन्यासियों की तरफ चल पड़ा .....

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(२)

मैं और शंटी सहपाठी तो थे ही,  हॉस्टल में भी एक ही कमरे में रहते थे इसलिए हम लोगों के रिश्ते दोस्ती से ज्यादा पारिवारिक हो गए थे. मेरा उसके घर बहुत ज्यादा आना जाना था और परीक्षा के पहले उसके घर पर ही हम लोग साथ-साथ तैयारी करते थे. शंटी के पापा बैंक में बड़े अधिकारी थे और उसके बाबा  साथ रहते थे जो पोस्ट मास्टर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए थे.  घर के सभी सदस्यों से मेरी  घनिष्ठता थी, इसलिए पारिवारिक बातें भी मेरे सामने होती रहती थी. 

मुझे एक बात बहुत असामान्य लगती थी कि शंटी की मम्मी, उसके पापा से कभी  अच्छे ढंग से पेश नहीं आती थी और बात बात में ताने  मारा करती थी.  कभी-कभी ऐसा लगता था कि वह जानबूझकर उन्हें व्यथित करने के लिए ऐसा करती हैं. पता नहीं क्या दुश्मनी थी ? घर का पूरा नियंत्रण उन्हीं के हाथों में था. 

 जो भी हो, शंटी के पापा  संपूर्णानंद त्रिपाठी उनसे किसी भी तरह उलझते नहीं थे. वह बेहद शालीन और शांत स्वभाव के उच्च शिक्षित व्यक्ति थे और घर की प्रत्येक जिम्मेदारी बखूबी निभाते थे. उनके व्यक्तित्व की एक विशेष बात थी कि न वह कभी हंसते थे न मुस्कुराते थे और न ही अनावश्यक बात करते थे. वह अपने काम से काम रखते थे और बहुत ही नपी तुली बात करते थे. मैंने महसूस किया था कि वह अपनी पत्नी की बातों से इतना दुखी रहते थे कि दुख की चादर हमेशा उनके व्यक्तित्व पर छाई रहती थी. ऐसा लगता था कि वह अपनी नीरस  जीवन को, बिना उफ किये  सजा की तरह काट रहे थे. 

जब कहीं किसी सामाजिक कार्यक्रम में सपरिवार जाना होता था, तो मानो वह अपने बच्चों की मां को या अपने पिता की बहू को साथ ले जाते  थे, पत्नी को नहीं. जब तक उनके पिता जिंदा थे तब तक तो कुछ गनीमत थी क्योंकि वह अपनी बहू को टोकते रहते थे और सुखी दांपत्य जीवन के बारे में समझाते रहते थे. आखिर वह उनके बहुत ही घनिष्ट दोस्त की बेटी जो  थी. उनके निधन के बाद यह नियंत्रण भी खत्म हो गया और  बढ़ती कलह  के कारण संपूर्णानंद त्रिपाठी के लिए घर का माहौल और ज्यादा कष्टकारी और असहनीय हो गया. उन्होंने इसके लिए एक उपाय  ढूंढ निकाला और वह था शहर से दूर  की पोस्टिंग ताकि वह पत्नी  की नियमित यातना  से बच सकें. केवल बड़े तीज त्यौहार में ही घर आते थे. मुझे याद है कि एक बार वह  दिवाली में भी  नहीं आ सके थे क्योंकि उनकी ब्रांच में ऑडिट चल रहा था.  शंटी की मम्मी ने आसमान सिर पर उठा लिया था " वह उसी कुलक्षनी  के घर  गए होंगे या उस कुल्टा को वहीं बुला लिया होगा .. पता नहीं क्या क्या ...अनाप ..शनाप " 

मैंने एक बार हिम्मत करके शंटी से पूछा ही लिया "कि यह कुलक्षिनी और  कुलटा कौन है ?" शंटी भी अपनी  मम्मी के आचरण से बहुत  दुखी रहता था लेकिन कुछ कर नहीं सकता था. उसने बताया कि उसके पिता का कॉलेज के दिनों में किसी लड़की से प्रेम प्रसंग था और दोनों ही शादी करने के लिए कृत  संकल्पित थे लेकिन बाबा उनकी शादी अपने दोस्त की बेटी के साथ करने के लिए वचनबद्ध थे और उनके दबाव के कारण ही उसके पिता को ये  शादी करनी पड़ गई. लेकिन उस लड़की ने अपने परिवार के दबाव को दरकिनार करते हुए कभी शादी न करने का फैसला किया और वह  आज भी अविवाहित है. वह  लखनऊ विश्वविद्यालय में इंग्लिश की प्रोफेसर हैं डॉक्टर सरस्वती शर्मा.  किन्तु दोनों  के बीच में आजकल कोई भी संपर्क नहीं है. शंटी ने बताया कि उसने अपनी मां के लिए कई बार इन लोगों की जासूसी भी की, जिसका उसे बहुत दुख है लेकिन मां के बे सिर पैर के आरोपों में कोई सच्चाई नहीं निकली. 

बाद में मुझे पता चला कि मेरी मौसेरी बहन जिसके मार्गदर्शन  में पीएचडी कर रही है, वह कोई और नहीं डॉक्टर सरस्वती शर्मा ही है. मेरी बहन ने डॉक्टर शर्मा के बारे में जो कुछ भी बताया, उससे उनके त्याग और तपस्या ही परिलक्षित हुई . पूरे विश्व विद्यालय के शिक्षक संकाय में उनका बहुत मान   सम्मान था  वह सबकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहती  थीं . परिवार न होने के कारण प्राय विश्वविद्यालय प्रशासन त्योहारों और छुट्टियों के मौके पर विभिन्न परियोजनाओं में उनकी ड्यूटी लगा देता था , और वह चुपचाप खुशी-खुशी यह सब करती रहती थीं .  विश्वविद्यालय की वह इकलौती ऐसी प्रोफेसर थीं  जो अतिरिक्त कक्षाएं लेती थीं,  छात्रों की समस्याओं के लिए सदैव तत्पर रहती थी , और कितने  ही सामाजिक कार्यों से जुड़ी  थीं . अपने आप को व्यस्त रखना शायद उनकी आदत  थी . 

कालांतर में उस  बैंक में मेरा चयन हो गया, जहां  संपूर्णानंद त्रिपाठी वरिष्ठ अधिकारी थे और यह सुखद संयोग ही था कि परीक्षाधीन अवधि में सामान्य बैंकिंग की ट्रेनिंग के लिए वही  शाखा मिली  जहां वह  मुख्य प्रबंधक थे. चार-पांच महीनों की इस अवधि में मेरा उनसे रोज ही मिलना होता था और वहां मैंने उन्हें एक नए इंसान के रूप में पाया. बैंक मैं उनकी गिनती बेहद कार्य कुशल, जानकार और सक्षम अधिकारियों में होती थी. कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ उनके संबंध बेहद अपनत्व भरे थे और सबसे बड़ी बात थी कि वह किसी भी स्थिति में किसी से नाराज नहीं होते थे. एक दिन  शाखा के एक कर्मचारी ने एक ग्राहक के साथ बेहद गैर जिम्मेदारी भरा काम किया जिस पर स्वाभाविक रूप से कोई भी  मुख्य प्रबंधक बहुत नाराज होता, लेकिन  उन्होंने उसे  बुलाया और समझा कर वापस भेज दिया. 

मैंने उनसे पूछा "सर इतनी बड़ी गलती और आपने नाराजगी तक प्रकट नहीं की, डांटना तो दूर की बात" 

उन्होंने बहुत शांत मुद्रा में कहा " मैं सिलेक्टिव कैसे हो सकता हूं ? कितनी ही विषम परिस्थितियों में मैं घर पर भी  किसी से नाराज नहीं होता या नहीं हो सकता , तो बाहर कैसे नाराज हो जाऊं. मैं दोहरे मापदंड कैसे अपना सकता हूं? नाराज न होना  अब मेरा आत्मसमर्पण नहीं,  आदत  है." 

मैंने महसूस किया की शाखा में कर्मचारी उनकी इस आदत से परिचित थे, इसलिए ज्यादातर में उनके समझाने का व्यापक सुधारात्मक असर पड़ता था और यही सभी से उनकी आत्मीय संबंधों की कुंजी थी. मैंने कभी उन्हें खाली नहीं देखा, दफ्तर में काम में व्यस्त रहते थे और छुट्टी के समय अपने निवास पर  पुस्तकें पढ़ते थे जिनमें बहुतायत  आध्यात्मिक   होती थी. 

शाखा में रहते हुए इतने कम समय में मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला.  वहां से स्थानांतरण के पश्चात भी मैं अक्सर सोचता था कि ईश्वर ने उनके साथ ऐसा इतना अन्याय क्यों किया?  उनका दाम्पत्य जीवन इतना  पीडादायक था कि  उनके प्रति मेरी सहानुभूति,  सम्मान और श्रद्धा में  बदल गई थी. मैं अक्सर सोचता था कि काश उनकी शादी उसी लडकी से हुई होती  .... शायद उनका जीवन बिलकुल अलग होता . कैसा होता ? पता नहीं,  लेकिन मेरे मन में  ये बात बहुत  गहराई से बैठ गयी थी कि ये सब न होने की लिए संपूर्णानंद पूरी तरह से जिम्मेदार थे. क्यों उन्होंने  इसे स्वीकार किया और विरोध नहीं किया? इसलिए उनका दाम्पत्य जीवन अगर सजा है तो उन्हें सजा मिलनी ही चाहिए थी .   

जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, दोस्तों की आवश्यकता तो बहुत  बढ़ती है, पर दोस्तों की संख्या नहीं बढ़ती, ज्यादातर दोस्त वही रहते हैं जो बचपन से लेकर छात्र जीवन तक बनते हैं और उनसे भी धीरे-धीरे अपनी अपनी व्यस्तताओं  के कारण संपर्क कम होता रहता है, लेकिन मैं और शंटी हमेशा संपर्क में रहते थे. वह उत्तर प्रदेश सचिवालय में समीक्षा अधिकारी  था जहां अच्छी बात यह थी कि  स्थानांतरण नहीं होते थे. मैं स्थानांतरण के कारण एक शहर से दूसरे शहर और अब दूसरे राज्य में पहुंच गया था. 

एक दिन अचानक शंटी ने घबराते हुए फोन किया और  बताया कि पापा घर छोड़ कर पता नहीं कहाँ चले  गए हैं? मैं स्तब्ध रह गया. उसने बताया कि   सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने भविष्य निधि, ग्रेच्युटी सहित कुल जमा पूंजी मम्मी को दे दी थी, शायद उनके दिमाग में कोई योजना थी. वह एक पत्र छोड़ गए हैं जिसमें उन्होंने लिखा है कि उन्होंने अपने जीवन की सारी जिम्मेदारियां पूरी कर दी है, बच्चों की पढ़ाई लिखाई नौकरी और शादी सब कुछ व्यवस्थित ढंग से हो गया है. मम्मी के लिए मकान, नौकरी की सारी बचत  और सेवानिवृत्ति पर मिले सभी रुपए छोड़कर जा रहे हैं. पेंशन का खाता मम्मी के साथ संयुक्त खाता है, जिसकी चेक बुक एटीएम कार्ड सब मम्मी के पास है. उन्होंने लिखा है कि जब तक जीवित रहेंगे वह जीवन प्रमाण पत्र देते रहेंगे और पेंशन मम्मी को मिलती  रहेगी. मर जाने पर व्यवस्था करेंगे की मृत्यु प्रमाण पत्र भी सही जगह पहुंच जाएं ताकि फैमिली पेंशन आती रहे. इसलिए मम्मी के जिंदा रहने तक उन्हें  कोई वित्तीय समस्या नहीं आएगी. वह अपने बचे हुए जीवन में मन और चित्त के लिए शांति की  खोज के लिए  भ्रमण करेंगे, इसलिए उन्हें ढूंढने और संपर्क करने के  प्रयास में  समय बर्बाद न किया जाए. 

 मैं स्तब्ध रह गया. मैंने पूछा कि "कहीं पता किया क्या ?" तो उसने कहा 'नहीं'  लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा लेकिन न जाने क्यों मै पता नहीं करना चाहता क्योंकि यही पापा की इच्छा है. मुझे लगता है कि शायद यही उनके हित में है. मैं उस समय शांत हो गया  लेकिन मन अशांत हो गया.  

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(३) 

सन्यासी और साध्वी के पास पहुंचने के बाद मैंने सन्यासी की तरफ देखते हुए कहा "अंकल प्रणाम"

सन्यासी ने एक टक मुझे देखा जरूर लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. मैं भी लगातार उन्हें देखे जा रहा था, लगा कोई गलतफहमी हो गई है क्या?

थोड़ी देर के लिए सभी निशब्द हो गए. मैं उन्हें देख रहा था और वह मुझे देख रहे थे.

साध्वी ने हस्तक्षेप किया और हम दोनों की तरफ देखते हुए पूछा " क्या आप लोग एक दूसरे को जानते हैं?"

"स्वामी जी का तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं इन्हें अच्छी तरह से जानता हूं" मैंने जवाब दिया, लेकिन सन्यासी ने  फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, इसलिए मैंने फिर बात को आगे बढ़ाते हुए कहा-

" अंकल मैं शंटी का दोस्त हूं, राज  .... राज वर्मा "  सन्यासी की आंखों में मैंने झांक कर देखा तो लगा कि प्रश्न परिचित होने का नहीं है बल्कि परिचित होने की स्वीकारोक्ति का है. यह हां और न के बीच का असमंजस है. लेकिन मैं आश्वस्त था कि यह वही है, इसलिए अधीर  हो रहा था. मैंने झुक  कर उनके पांव छुए और  फिर बात आगे बढ़ाई -

" सर, मैं जनरल बैंकिंग के लिए आपका ट्रेनी  था, राज वर्मा.... ८७ बैच, चंदौसी ब्रांच." मैं जैसे उन्हें याद दिलाने की कोशिश कर रहा था.

चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लाकर वह  बोले 

"कैसे हो..... राज?"

 मेरी खुशी का ठिकाना न रहा "अच्छा हूं सर" मैंने कहा

" यहाँ  कैसे ?" उन्होंने पूछा

" ट्रैकिंग के लिए 'फूलों की घाटी' गया था, लौटते हुए दर्शन करने के लिए रुका था और अब माना गांव जा रहा हूं" मैंने बताते हुए पूछा -

"लेकिन आप ? और यह सन्यासी की वेशभूषा?" 

उन्हें गहरी सांस खींचते हुए बहुत ही निश्चिंत भाव से  कहा-

"मैंने अपनी सभी जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद घर छोड़ दिया है,... और सन्यास ले लिया है".  कुछ रुक कर वह बोले -  

"तुम कुछ भी अर्थ निकाल सकते हो..........घर छोड़ने के लिए संयास ले लिया या फिर.......  सन्यास लेने के लिए घर छोड़ दिया"

फिर उन्होंने साध्वी की तरफ इशारा करते हुए कहा-

" यह है डॉ सरस्वती शर्मा, लखनऊ विश्वविद्यालय में इंग्लिश की प्रोफेसर, अभी हाल ही में रिटायर हुई हैं ."

 मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा .  मैंने  उत्सुकता पूर्वक  साध्वी  की और देखते हुए  कहा -

" मैंने पहले कभी आपको देखा तो नहीं है लेकिन आपके बारे में थोड़ा बहुत जानता जरूर हूं.  सर को तो मैंने घर  और ऑफिस  दोनों जगह देखा समझा और महसूस किया. मैं जितना भी आप के बारे में  जानता  और समझता था  उससे मेरे दिल में आप  के  लिए बहुत ही सम्मान था  लेकिन आज आप दोनों के लिए मेरे दिल में बहुत श्रद्धा उत्पन्न हो गयी है ." 

थोड़ा संभलने की कोशिश करते हुए भी  मेरे मुहं से मेरे दिल की बात निकल   गई .  

" मुझे नहीं मालूम क्यों? लेकिन आप दोनों  को, इस रूप में ही सही, उम्र के इस पड़ाव पर ही सही, साथ-साथ देखने से मेरे मन की गहराइयों में बसी एक अकुलाहट आज समाप्त हो गई है. इसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूं और यह मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं" यह कहते हुए मैंने साध्वी के भी चरण स्पर्श किये. पर  पता नहीं क्यों मेरी आंखें भर आई, गला रुंध गया.

रुक रुक कर बोलते हुए मैंने कहा -

"मैं आपका बेटा तो नहीं, लेकिन बेटा जैसा ही हूं. अगर कभी आप लोग मुझे सेवा का मौका देंगे तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी और मैं इसे अपना सौभाग्य  समझूंगा "

साध्वी के चहरे पर जैसे वात्सल्य उमड़ आया था. दोनों ने बारी बारी  अपना हाथ मेरे सिर पर रखा और बड़े प्यार से  सहलाया और फिर  चल पड़े नीचे घाटी की ओर एक साथ एक रास्ते पर , स्वामी सम्पूर्णानंद  सरस्वती और  साध्वी सरस्वती सम्पूर्णा   .

यहां से मेरा रास्ता अलग था लेकिन मैं  उन्हें यूं ही जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक कि वे  मेरे आंखों से ओझल नहीं हो गए.

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- शिव प्रकाश मिश्रा ( Shive Prakash Mishra )

           मूल कृति -  १५ अगस्त २०१८ (Copy Right)


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बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

उड़ान




सैन फ्रांसिस्को का  यह मौसम बहुत ही सुहाना था. काफी देर से हल्की बूंदाबांदी हो रही थी. दक्ष बर्कले यूनिवर्सिटी से वापस आया  था और बार्ट ( बे एरिया रैपिड ट्रांसपोर्ट) स्टेशन  से पैदल चलते हुए अपने फ्लैट की तरफ जा रहा था. छाता लगाने के बाद भी बारिश की बूंदे हवा के झोंके से रह रह कर उसके शरीर को स्पर्श कर  रही थी और दिन भर की स्मृतियां जैसे एक बार फिर उसके मन मस्तिष्क में तरोताजा हो जा रही थी. बर्कले विश्वविद्यालय में " स्टार्टअप्स इन इंडिया" शीर्षक पर आज उसका व्याख्यान था . भारतीय समुदाय के छात्रों के अलावा दुनिया के अन्य देशों के भी छात्र एवं शोधकर्ता विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में खचाखच भरे थे और उसके पूरे व्याख्यान के समय तालियों की गड़गड़ाहट से लोग उसके ओजपूर्ण भाषण को बहुत ध्यान से सुनते रहे.

 उसके भाषण का  केंद्रबिंदु था कि भारत में स्टार्टअप्स के लिए अपार संभावनाएं हैं, लोग इस पर काम भी कर रहे हैं.  प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में नए स्टार्टअप्स का रजिस्ट्रेशन होता है लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि उसमें से अधिकांश हर साल बंद हो जाते हैं.

 भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों से निकले हुए मेधावी छात्र सीधे विदेशों का रुख करते हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अच्छे पैकेज में नौकरी करना शुरू कर देते हैं.  यह लोग स्टार्टअप्स में जोखिम लेने की बजाय  अच्छे पैकेज के कारण नौकरी करना ही पसंद करते हैं  और सोने के पिंजरे में कैद हो जाते हैं. शायद भारत में स्टार्टअप्स को  अधिक सफलता न मिल पाने के पीछे एक यह भी कारण है. लोग दूसरों से   कुछ और कहते हैं, और खुद कुछ और करते हैं. वह स्वयं इसका एक उदाहरण है. उसका मन आत्म ग्लानि से भरने लगा . भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलुरु से एमबीए करने के बाद उसे ओरेकल  का ऑफर मिला और  वह  आज कल ओरेकल की स्ट्रेटजी टीम का हिस्सा है.

 "उसने खुद जोखिम क्यों नहीं लिया ? " उसने अपने आप से प्रश्न किया .

"भारतीय संसाधनों का उपयोग करके वह जिस  काबिल  बना उसका फायदा तो अमेरिका को हो रहा है, भारत को क्या मिला?"

 वह  अपने आपसे प्रश्न कर रहा था और उनके उत्तर भी स्वयं ढूढ रहा था और इसी बीच डाउनटाउन  स्थित उसका फ्लैट भी आ गया. वह आज बर्कले यूनिवर्सिटी में छात्रों को सफलता के सूत्र और स्टार्टअप्स की स्ट्रेटजी बताने गया था लेकिन लौटकर आते आते वह स्वयं अपने सवालों में जैसे गुम हो गया.

 फ्लैट के अंदर आकर भी वह अपने सवालों के उत्तर ढूंढ रहा था. उसे याद है कि  हैदराबाद के हाईटेक इलाके में विप्रो सर्किल पर उसके पिता ठेले पर इडली और डोसा की चलती फिरती दुकान लगाते थे.  पास में ही कई आईटी कंपनियों सीए टेक्नोलॉजी, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और और ओरेकल जैसी  नामी-गिरामी कंपनियों के कार्यालय थे. वह पढ़ाई तो करता था लेकिन अपने पिता की सहायता के लिए अक्सर उनकी दुकान पर जाता था. यह काम ही ऐसा था जिसमें पूरा परिवार लगा रहता था. घर पर मां रात में इडली और डोसे का सामान तैयार करती थी, उसकी छोटी बहन भी उनका हाथ बंटाती  थी और सुबह सुबह पिता अपनी चलती फिरती दुकान लेकर निकल जाते थे. रा मैट्रियल से उत्पाद तैयार करना और फिर उनकी बिक्री करना यह तीनों काम एक ही परिवार करता था. यह अपने आप में कम लागत पर सामान तैयार करने और कम कीमत पर बेचने का एक सशक्त उदाहरण था.

 आईटी कंपनियों में काम करने वाले युवा  कम कीमत पर अच्छी गुणवत्ता के इडली और डोसे  मिलने  के कारण उनके पिता की दुकान के स्थाई ग्राहक थे. वह इन युवाओं को देखता था और इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बड़े-बड़े कार्यालयों को देखता था और सोचता  था कि इन  में काम करने वाले लोग भी कितने सौभाग्यशाली होते हैं. वह भी इन आने वाले युवा ग्राहकों से अपनी जिज्ञासाओं के बारे में पूछता और उनमें से कुछ लोग बहुत सहजता से उसे समझाते थे. इसी कारण वह अपने पिता को बीटेक की पढ़ाई करने के लिए तैयार कर सका था. पढ़ाई में थोड़ी मेहनत, इन युवाओं का मार्गदर्शन और सौभाग्य से हैदराबाद स्थित जेएनटीयू (जवाहरलाल नेहरू टेक्निकल यूनिवर्सिटी) में बीटेक कंप्यूटर साइंस मैं उसे एडमिशन मिल गया.

 इसके बाद भी वह पिता के काम में सहयोग करता रहा. उसने बिक्री, पैकिंग और डिलीवरी के कुछ नए प्रयोग भी किए जो काफी सफल रहे, जिससे पिता की व्यवसाय में थोड़ा वृद्धि भी हुई.  जब कैट में उसका 99.9० परसेंटाइल आया तो इन युवाओं ने ही उसके पिता को समझाया और उसके पिता ने भी हिम्मत करके उसे भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलुरु में प्रवेश दिलवाया. उसे बी टेक और एमबीए के लिए बैंक से लोन मिल गया था. फिर उसकी उड़ान भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलुरु से सीधे ओरेकल  पार्कवे,  सैन  फ्रांसिस्को आकर रुकी. पिछले 4 सालों में यहां रहते हुए उसने सारे बैंक ऋण चुकता कर दिए हैं. अपने पिता की व्यवसाय को भी व्यवस्थित कर दिया है. उसकी बहन भी हैदराबाद के अच्छे कॉलेज में पढ़ रही है. यह सब संभव हो रहा है उसके वेतन और बचत से और शायद इसीलिए वह अपना कोई व्यवसाय करने का जोखिम नहीं ले सकता था. संभवत यही कारण है की औसत भारतीय निश्चित आय के लिए नौकरी करना ही ज्यादा पसंद करता है, अपना खुद का व्यवसाय नहीं . 

 उसने स्वयं की  स्टार्टअप्स बनाने के लिए योजना तो  बनाई है, आईटी एप्लीकेशन भी  बनाया है लेकिन हिम्मत नहीं कर सका, जिसका सबसे बड़ा कारण रहा है  असफलता का डर ( fear of  failure). उसने जो स्टार्टअप्स की योजना बनाई थी उसके  केंद्र में भी उसके पिता का व्यवसाय ही था जिसके पीछे उसकी मंशा थी कि  उसके पिता का यह  व्यवसाय  ऐसा नया आयाम ले जिससे उसके पिता को भी उस व्यवसाय पर गर्व हो सके.  उसने आईपैड में उस योजना को एक बार फिर शुरू से आखिर तक देखा उसे लगा यह प्रोजेक्ट चल सकता है. उसने अपने मजबूत होते आत्मविश्वास को एक बार फिर टटोला जैसे अपने आप से कहा कि "अगर पंछी पिंजरे में बंद रहेगा तो उड़ान कैसे भर सकेगा?"

और .... फिर उसने भारत वापस आने का फैसला कर लिया और शुरू हो गयी उड़ान, सैन फ्रांसिस्को - मुंबई और मुंबई - हैदराबाद .

                                                                           (२) 

भारत वापस आकर दक्ष ने दिन रात मेहनत की, आईटी एप्लीकेशन को अंतिम रूप दिया और फिर लॉन्च हो गया एक नया बिजनेस प्लान.

दक्ष के स्टार्टअप की हैदराबाद और बेंगलुरु दोनों जगह बहुत प्रशंसा हो रही है. यह अपनी तरह का एक अलग ही बिजनेस मॉडल है जिसका आधार है लोगों का विश्वास. हैदराबाद और बेंगलुरु की बड़ी गेटेड कम्युनिटी में "अनलॉक्ड फूड स्टोरेज" रखने का अनुबंध किया गया है. इस फूड स्टोरेज में इडली, डोसा, बड़ा और बिरयानी के पैक  रखे जाते हैं, जिन्हें बेचने  के लिए किसी व्यक्ति की जरूरत नहीं होती है.  लोग स्वयं आकर अपनी जरूरत के पैक किए हुए आइटम ले जा सकते हैं और स्टोरेज के साथ लगी पास  मशीन पर पेमेंट कर सकते हैं,जिसमें कॉन्टैक्टलेस पेमेंट की सुविधा भी है. फीडबैक और आइटम वापस करने के लिए भी सुविधा है. शुरुआत में लगा था कि शायद लोग सामान ले जाएंगे और भुगतान नहीं करेंगे. 1- 2 मामलों को को छोड़कर कभी ऐसा नहीं हुआ और अब लोग स्वयं सामान ले जाते हैं और भुगतान कर जाते हैं. ऐसा नहीं होता है कि कोई सामान ले जाए और भुगतान न कर जाए. इसका थीम कि "लोगों का विश्वास किया जाएगा तो वह  विश्वास नहीं तोड़ेंगे" सफल रहा है.

फूड स्टोरेज में उपलब्ध सामान को ऑनलाइन देखा जा सकता है.  इस तरह शहर के सारे फूड स्टोरेज में एक केंद्रीकृत प्रणाली से सामान की बिक्री और उत्पादन को नियंत्रित किया जाता है. 

दक्ष के स्टार्टअप में इस फूड स्टोरेज के अलावा "एनी थिंग एनी टाइम एनी व्हेर" . यानी स्टार्टअप के मोबाइल ऐप पर खाने का कोई आइटम बुक करने के बाद किसी भी समय, पूर्व निश्चित स्थान या लोकेशन पर डिलीवरी ली जा सकती है. यह डिलीवरी कार में बैठे हुए, चौराहे पर, सड़क किनारे खड़े हुए, बस स्टॉप पर, यह किसी पार्क में भी ली जा सकती है.

 आज दक्ष के पिता के पास उनका पुराना काम है लेकिन उसका बिजनेस मॉडल एक  दम नया (इनोवेटिव)  है. वह इस नई कंपनी के चेयरमैन है और बेहद खुश हैं. लोग उनकी  कहानी सुनाते हैं  कि कैसे  सड़क पर  ठेला लगा कर इडली डोसा बेचने वाला व्यक्ति इतनी बड़ी कंपनी का मालिक बन गया ?

 दक्ष को भी अपने परियोजना प्रबंधन पर बहुत संतोष है. आज उसकी  कंपनी की चर्चा होती है, उसका वैल्यूएशन किया जा रहा है और लोग आईपीओ लाने की सलाह दे रहे हैं.

 दक्ष को  सबसे ज्यादा खुशी इस बात को लेकर है कि  अनेक  प्रबंध संस्थान में  उसके स्टार्टअप की सफलता की कहानी तमाम कार्यक्रमों  का हिस्सा होती है, और बर्कले यूनिवर्सिटी सैन  फ्रांसिस्को में जहां कभी वह व्याख्यान के लिए जाता था उसकी सफलता की कहानी  के वीडियो छात्रों और शोधकर्ताओं को दिखाये जाते हैं.

 बिल्कुल सच है कि पिंजरे में बंद रह कर कोई उड़ान नहीं भर सकता है.

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- शिव प्रकाश मिश्र 

मूल कृति - १४ अक्टूबर २०२० 

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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

पितृ सत्ता



पितृसत्ता

विनय गुप्ता किदवई नगर के अपने छोटे से घर की बालकनी में बैठे हुए थे। रोज सुबह यहाँ बैठकर चाय पीते हुए समाचार-पत्र पढ़ना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा था, पर न जाने क्यों आज की सुबह एकदम अलग थी। चाय तिपाई पर रखी ठंडी हो चुकी थी। कुर्सी पर बैठे हुए उनके हाथों में समाचार-पत्र ज्यों का त्यों रखा था। सामने हनुमान मंदिर की तरफ से आने वाली सड़क पर चलते हुए वाहन और लोग रोज की तरह आ-जा रहे थे। सूर्य की रोशनी काफी फैल चुकी थी, लेकिन फिर भी सुबह कुछ अलसाई-सी थी। उनकी आँखें जैसे अनंत में टँकी हुई थीं। निष्क्रिय-से वे न जाने कब से इसी एक मुद्रा में बैठे थे, जिसका उन्हें शायद अहसास भी नहीं था।

जब उनकी तंद्रा टूटी तो उन्हें लगा कि कानपुर का मौसम अचानक बदल गया है। बरसात हो चुकी है, चारों तरफ पानी ही पानी है। सड़कें भीगी हैं, पेड़-पौधे भीगे हैं और आसपास पानी ही पानी दिखाई दे रहा है। सब कुछ पानी से तरबतर है। कुछ भी साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था।

उन्हें आश्चर्य हुआ कि कानपुर के मौसम में इतना परिवर्तन अचानक तो नहीं होता। नाक पर नीचे खिसक गए अपने चश्मे को ऊपर खिसकाते हुए उन्होंने ठीक से देखने की कोशिश की, लेकिन फिर भी कुछ साफ दिखाई नहीं दिया। उन्होंने साफ करने के लिए चश्मा उतारा तो दिखाई पड़ा कि बाहर तो सब कुछ ठीक है, पानी उनके चश्मे में है।

शायद उनके अंतर्मन में उमड़ते-घुमड़ते हुए बादल आँखों के रास्ते बरसकर चश्मे को पूरी तरह तरबतर कर चुके थे। इसीलिए उन्हें सब कुछ भीगा-भीगा-सा और अस्त-व्यस्त दिख रहा था। उन्होंने चश्मा भी पोंछा और आँखें भी, और जल्दी से दाएँ-बाएँ देखा कि किसी ने उनकी भीगी आँखें तो नहीं देखीं। फिर उन्हें याद आया कि घर में तो उनके अलावा कोई है ही नहीं। वे तो अकेले हैं।

यही पितृसत्ता है, जो पुरुष को रोने नहीं देती और भूले-भटके आँसू भी आ जाएँ तो छिपाना पड़ता है कि कोई देख न पाए। पुरुष चाहे पुत्र हो, पति हो या पिता हो, उसे बचपन से ही इस मानसिकता का बोध कराया जाता है और मजबूत होने का आभास देते रहने का अभ्यास कराया जाता है।

जैसे-जैसे जीवन एक पुत्र, पति और पिता की ओर अग्रसर होता है, पितृसत्ता का क्रमिक विकास होता रहता है। दुखद से दुखद, विषम से विषम परिस्थितियों में भी न रोना और न आँसू बहाना उसके मजबूत दिखने का आधार बन जाता है। पुरुष अंदर से मजबूत भले ही न हो, लेकिन मजबूत दिखना उसकी मजबूरी है और शायद जिम्मेदारी भी, क्योंकि अगर पिता ही रोएगा तो और लोग क्या करेंगे? उनको ढाँढस कौन बँधाएगा? यही कारण है कि सामान्यतः किसी ने किसी पुरुष को रोते-बिलखते हुए नहीं देखा होगा।

पितृसत्ता की यही मजबूती और स्वभाव की इतनी दृढ़ता, भले ही दिखावटी हो, मातृसत्ता को भरपूर संबल देती है और इसीलिए माँ अपनी करुणा में निर्बाध रूप से बह सकती है या स्वयं ममता के सागर में स्वच्छंद हिलोरे ले सकती है। लेकिन जब कभी करुणा के इन तारों को कोई उसके अपने अस्वाभाविक रूप से झंकृत कर देता है तो माँ के आँसू निकल आते हैं। माँ रोती भी है, बिलखती भी है और फिर आँचल से स्वयं ही आँसू पोंछ लेती है और जैसे यह सब कुछ स्वाभाविक रूप से खुद सामान्य करने का प्रयास होता है।

लेकिन पिता तो पिता है, रो नहीं सकता, आँसू नहीं बहा सकता। कभी-कभी बाँध में अनायास अत्यधिक पानी आ जाता है और बाँध के ऊपर से निकलने लगता है तो यह बहुत ही असामान्य होता है। बाँध की ऊँचाई बढ़ाते जाना ही विकल्प होता है, जो उचित भले ही न हो, लेकिन मजबूरी है। बाँध चाहे कितने ही वैज्ञानिक तरीके से बने हों, ऊँचाई कितनी भी अधिक क्यों न हो, नमी तो फिर भी आ ही जाती है। सेफ्टी वाल्व से कभी-कभी बूँदें तो टपकती ही हैं। यदि पानी बाँध तोड़कर निकलने लगे तो परिस्थितियाँ बहुत विषम और असाधारण ही होती हैं।

विनय सोचने लगे कि अतीत में वे कब ऐसे आँसुओं के सैलाब में डूबे थे? शायद... कोई 15 साल पहले की बात होगी, जब वे अपने बड़े बेटे को इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दिलाने दिल्ली ले गए थे। बेटे को परीक्षा केंद्र छोड़ आने के बाद पहाड़गंज के एक छोटे से होटल के एक छोटे से कमरे में खुद को बंद कर बहुत आँसू बहाए थे।

यह वह समय था, जब कुछ समय पहले ही उन्हें लिवर कैंसर होने का पता चला था। काफी देर हो चुकी थी और अब उनके पास समय बहुत कम बचा था। उन्हें तो सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भगवान उनके साथ ऐसा भी कर सकता है और इसी विश्वास के साथ एक से दूसरे और तीसरे डॉक्टर को दिखाते रहे कि शायद कोई कह दे कि उन्हें कुछ भी नहीं है। लेकिन सबकी राय एक जैसी थी कि वे तेजी से बढ़ने वाले लिवर कैंसर से पीड़ित हैं और जितनी जल्दी हो सके, उन्हें ऑपरेशन करवा लेना चाहिए।

वे इसके लिए मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्हें मालूम था कि यदि ऑपरेशन करवाया गया तो उसके बाद कैंसर के इलाज की एक लंबी प्रक्रिया है। जितने भी आर्थिक संसाधन उनके पास हैं, सब उनके आसपास ही सिमट जाएँगे। फिर उनके बच्चों का क्या होगा? उनकी पत्नी का क्या होगा? वे आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध नहीं हैं।

उनकी बेचैनी का कारण था उनके अपने घर का इतिहास, जो एक बार फिर दोहराने के कगार पर खड़ा था। बचपन में ही उनके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी। कितनी मुश्किल और तंगहाली से उनकी माँ ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया। दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा और चौका-बर्तन का काम किया। खुद उन्होंने भी छोटे-मोटे काम किए और स्नातक के बाद नौकरी शुरू कर दी। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का समय भी नहीं मिला। किसी इंजीनियरिंग या मेडिकल कोर्स के बारे में सोचना भी मुश्किल था।

शायद उनकी माँ ने जो तपस्या की थी, उसी का यह सुखद परिणाम था कि उन्हें नौकरी मिल गई थी। वे सोचते थे कि अब सब अच्छा ही होगा और शायद सदा-सर्वदा के लिए उनका परिवार गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएगा। फिर पता नहीं भगवान क्यों इतना निष्ठुर है? बार-बार उनकी परीक्षा क्यों हो रही है?

इस समय उनका बेटा 12वीं में पढ़ रहा था और बेटी नौवीं कक्षा में। वे यह सोचकर परेशान हो रहे थे कि इस समय यदि उन्हें कुछ हो जाता है तो उनका पूरा आशियाना बिखर जाएगा। उनका अपना मकान नहीं और नौकरी में पेंशन नहीं, आमदनी का और कोई साधन नहीं। ऐसी स्थिति में बेटे की पढ़ाई तो छूटेगी ही। घर चलाने के लिए उसे छोटे-मोटे काम करने पड़ेंगे। बेटी भी पता नहीं क्या करेगी? उसे भी कुछ-न-कुछ करना पड़ेगा और पत्नी को भी हो सकता है कुछ छोटा-मोटा काम करना पड़े। यह सोचकर ही उनका कलेजा मुँह को आ रहा था।

जिन परिस्थितियों से निकलने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया है, एक बार फिर वही परिस्थितियाँ, समय का वही चक्र, फिर उनके दरवाजे पर दस्तक दे रहा था।

वे ईश्वर से चाहते थे कि उन्हें कम-से-कम पाँच वर्ष का समय दे दे तो शायद उनका परिवार बर्बादी से बच जाए। पाँच साल का समय इसलिए कि बेटा इंजीनियरिंग पूरी करके किसी नौकरी में आ जाएगा और अगर उसने माँ और बहन को सहायता दी तो बेटी भी पढ़-लिख जाएगी और कोई नौकरी कर सकेगी। तब शायद घर-परिवार चलाने में बहुत मुश्किल नहीं आएगी।

पूरे जीवन में उन्होंने कभी किसी का अहित नहीं किया। भरपूर मेहनत की और भगवान पर पूरी आस्था रखी। सिर्फ इसलिए कि अच्छे व्यक्ति को अच्छे कार्य करने चाहिए, वैसा ही करने की कोशिश करते रहे। वे हारना नहीं चाहते थे, इसलिए आखिरी दम तक कोशिश करना चाहते थे।

वे लगातार एक के बाद एक डॉक्टर को दिखाते रहे, लेकिन लखनऊ में संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में एक डॉक्टर ने उनकी फाइल में एक ही मर्ज के लिए अनेक डॉक्टरों की रिपोर्ट और एक ही निष्कर्ष देखकर कहा, “क्या तुम किसी ऐसे डॉक्टर को खोज रहे हो, जो यह कह दे कि तुम्हें कुछ नहीं हुआ है और तुम्हें कुछ नहीं होगा? तो वह मैं नहीं हूँ। तुम्हें कैंसर है और अच्छा तो यह होगा कि तुम तुरंत ऑपरेशन करा लो। लेकिन चूँकि तुम मामले को टाल रहे हो, यहाँ के बाद फिर कहीं किसी डॉक्टर के पास जाओगे तो मैं इस पर पूर्ण विराम लगा देता हूँ।

“तुम अभी ऑपरेशन नहीं कराना चाहते हो तो मत कराओ। हफ्ते में एक बार अल्ट्रासाउंड करवाना होगा और वह एक ही पैथोलॉजी सेंटर में। लिवर में कैंसर की गाँठ का माप लेना होगा, ताकि यह पता लग सके कि कैंसर की वृद्धि कितनी तेज है। अगर वृद्धि बहुत तेजी से हो रही है तो ऑपरेशन का निर्णय लेंगे, अन्यथा जब तक टाला जा सकता है, टालते रहेंगे।

“ऑपरेशन के बाद भी ठीक होने की कोई गारंटी तो होती नहीं, इसलिए थोड़ा रिस्क लेकर इंतजार करना बुरा नहीं। जो दवाएँ लिखी हैं, लेते रहो। खान-पान का ध्यान रखो। कभी-कभी चमत्कार भी होते हैं, उनका इंतजार करो।”

यह सुनकर उन्हें बहुत शांति मिली, जैसे कि वे यही चाहते थे और फिर वैसा ही किया। हर हफ्ते एक पैथोलॉजी सेंटर में अल्ट्रासाउंड कराने का क्रम शुरू हो गया। घर में तो किसी को मालूम भी नहीं था कि उन्हें कैंसर की बीमारी है। जैसे-जैसे समय गुजर रहा था, कैंसर की वृद्धि हो रही थी, लेकिन जो सीमा उन्हें दी गई थी, उसमें अभी समय था। उनकी इच्छा अंतिम क्षण तक प्रतीक्षा करने की थी।

इसी समय स्वामी रामदेव का योग प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ। उन्होंने भी प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया और जैसा कि स्वामी दावा करते थे कि योग से कैंसर भी ठीक हो जाता है, इस आशा से अनुलोम-विलोम और कपालभाति से लेकर योग की जितनी भी क्रियाएँ वे कर सकते थे या करना उनके लिए संभव था, करना शुरू कर दिया।

उन्हें मालूम था कि उनके पास समय बहुत कम है। इसलिए बच्चों की पढ़ाई, घर में पैसे की बचत और सारे कार्य समय पर पूरे करने का बहुत ही कठोर परियोजना-प्रबंधन शुरू कर दिया, ताकि सब कुछ जितना भी संभव हो, समय से हो।

बच्चों की पढ़ाई में छोटी-मोटी त्रुटियों को भी वे बहुत गंभीरता से लेते थे और कई बार न चाहते हुए डाँटते भी थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि थोड़ी-सी असावधानी उनके पूरे प्रोजेक्ट का सत्यानाश कर देगी।

कुछ महीनों बाद पैथोलॉजी के डॉक्टर ने हर सप्ताह के बजाय महीने में एक बार अल्ट्रासाउंड करवाना शुरू किया और एक साल बाद यह क्रम मासिक के स्थान पर त्रैमासिक हो गया। अल्ट्रासाउंड करने वाला डॉक्टर भी उन्हें बहुत दिलासा देता था कि अभी समय है, चिंता की बात नहीं है।

ऐसा लगता था कि जैसे ईश्वर उन्हें कुछ समय दे रहा है और फिर समय मिलता गया। इस बीच बड़े बेटे की इंजीनियरिंग पूरी हो गई। उसे अच्छा काम भी मिल गया। शादी भी हो गई और बेटी की भी पढ़ाई पूरी होकर उसे भी नौकरी मिल गई और शादी भी हो गई। तो उन्हें लगा, शायद अब उनका प्रोजेक्ट पूरा हो गया है।

उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और प्रार्थना की कि ईश्वर चाहे तो अब अपना काम कर सकता है। उन्होंने जो समय माँगा था, वह पूरा हो गया है और सारे काम भी पूरे हो गए हैं।

अब तो उनकी जिंदगी जैसे बोनस की जिंदगी थी। सब कुछ हो चुका था और एक और जो इच्छा माँ-बाप की होती है, वह भी पूरी होने वाली थी। वे दादा बनने वाले थे।

एक सप्ताह पहले ही वे और उनकी पत्नी बेंगलुरु में बेटे के पास गए हुए थे, क्योंकि बहू की डिलीवरी होने वाली थी। इस समय पितृपक्ष चल रहा था। सामान्यतः इस समय वे किसी यात्रा से बचते थे, क्योंकि इस समय वे अनिवार्य रूप से रोज सुबह अपने पूर्वजों का तर्पण करते थे।

पिता को तो उन्होंने देखा जरूर था, लेकिन ठीक से याद नहीं। लेकिन माँ जरूर उनके लिए आराध्य थीं और पूर्वजों के लिए तर्पण शायद माँ को धन्यवाद ज्ञापित करने का एक तरीका था।

इस पितृपक्ष में एक बहुत असामान्य घटना हुई। एक दिन सपने में उन्हें माँ दिखाई दीं और बताया कि वह उनके घर आ रही हैं। इशारा था कि घर में पोती के रूप में आ रही थीं।

एक सप्ताह पहले ही पति-पत्नी बेंगलुरु पहुँच गए थे और उस शुभ घड़ी का बड़ी उत्सुकता से इंतजार करने लगे। विनय के लिए खास उत्सुकता की वजह थी कि उनकी बोनस की जिंदगी में और कितनी खुशियाँ मिलती चली जा रही हैं।

आखिर वह घड़ी आ गई, जब बहू को अस्पताल में भर्ती कराया गया। बेटा, बहू और उसकी एक दोस्त उसके साथ थी। चूँकि सारे लोग अस्पताल में नहीं रुक सकते थे, इसलिए वे पति-पत्नी, बेटे के कहने के अनुसार घर पर ही रहे।

रात भर वे लोग जागते रहे और बेटे के फोन की प्रतीक्षा करते रहे। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि किसी खुशी का इंतजार करना कितना उत्सुकतापूर्ण होता है, जिसमें धैर्य रख पाना भी बहुत मुश्किल होता है। इसलिए उन्होंने बीच-बीच में एक-दो बार बेटे को फोन कर पूछा भी।

जब सुबह होने को आई, फिर भी उसका फोन नहीं आया तो एक बार फिर उन्होंने फोन किया। बेटे ने झुंझलाते हुए कहा, “बार-बार फोन करके मुझे परेशान मत करो। मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ। जब कुछ होगा तो आपको सूचना मिल जाएगी।”

अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन दिल को तसल्ली दी कि शायद ठीक ही कह रहा था। पूरी रात अस्पताल में जाग रहा था। पता नहीं क्या-क्या परेशानी हुई होगी। कहीं ऑपरेशन वगैरह का चक्कर तो नहीं। आजकल डॉक्टर बिना जरूरत के कुछ भी कर सकते हैं।

इसी तरह सोचते-सोचते सुबह हो गई। स्नान-ध्यान के बाद अपने पूर्वजों के तर्पण की प्रक्रिया शुरू की। अब तक कोई समाचार नहीं मिला था। चिंता हो रही थी, लेकिन दोबारा बेटे को फोन करने की हिम्मत नहीं हो सकी।

आज उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि बाप अपने बच्चों से भी कितना डरता है—उन बच्चों से, जिन्हें अपने हाथों बड़ा किया, कभी हाथों में लेकर झूले झुलाए, गोद में लेकर बगीचे में लगे गुलाब के फूल की खुशबू का अहसास कराया, जिनके हाथ पकड़कर चलना सिखाया और कंधे पर बैठाकर घुमाया, सोने से पहले हर दिन कहानी सुनाई, जिनको जुकाम-बुखार होने पर पूरी-पूरी रात जागकर बिताई।

उन्हें इस तरह के जवाब की अपेक्षा सपने में भी नहीं थी।

तभी अचानक मोबाइल की घंटी बजी और लपककर उन्होंने फोन उठाया। जिस बहुत बड़ी खुशखबरी की प्रतीक्षा थी, अब वह समय आ गया था। सोचा, बेटे का फोन होगा, लेकिन यह क्या! यह तो कोई विदेशी, अनजान नंबर था।

बात हुई तो पता चला, समधी जी लाइन पर थे। दुबई से उन्हें बधाई देने के लिए फोन किया था कि घर में पोती आ गई है।

काश, यह बात उन्हें बेटे ने बताई होती तो कितना अच्छा लगता! सात समुंदर पार दूरदराज बैठे हुए व्यक्ति को यह खबर मिल चुकी है और वे एक सप्ताह से यहाँ हैं, सिर्फ और सिर्फ इसी सूचना के लिए, और उन्हें अपनी पोती के आने की सूचना किसी अन्य से मिल रही है।

उन्होंने संतोष किया कि हो सकता है बेटा पूरी रात जागता रहा होगा, परेशान होगा। पता नहीं कितनी मुश्किलों का सामना किया होगा। इस तरह की तमाम संभावित बातों से उन्होंने अपने आप को संतोष दिया।

जल्दी से तैयार होकर दोनों पति-पत्नी अस्पताल के लिए निकल पड़े।

अस्पताल पहुँचकर भी उनकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई, क्योंकि अस्पताल में विजिटिंग आवर्स होते हैं। तभी मरीज से मिला जा सकता है। वे इंतजार करने लगे और यह समय भी कैसे कटा, उन्हें नहीं मालूम।

इतनी उत्सुकता अपनी पोती के रूप में माँ को देखने के लिए हो रही थी, इतनी तो अपने बच्चों के लिए भी नहीं हुई थी। आज जो बेचैनी अपनी बेटी समान बहू को देखने के लिए थी, उसे धन्यवाद देने के लिए भी थी, जिसने उनके परिवार को आगे बढ़ाया।

अंदर जाने का समय भी आ गया और वे पूछते हुए उस प्राइवेट रूम में पहुँचे, जहाँ उनकी बहू थी। उन्होंने धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी और उनका बेटा बाहर आ गया। उसने उन्हें अंदर ले जाने के बजाय बाहर आकर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।

विनय एकटक देख रहे थे और कुछ समझ नहीं पा रहे थे। इस समय का एक-एक पल उनके लिए बहुत भारी हो रहा था। वे जल्दी से जल्दी अंदर जाना चाहते थे और अपनी पोती को देखना चाहते थे, उससे मिलना चाहते थे।

लेकिन बेटा दरवाजा बंद करके ऐसे खड़ा था, जैसे अभी भी अंदर जाने के लिए कुछ औपचारिकताएँ बाकी हों।

उन्होंने पूछा, “क्या हुआ?”

बेटे ने जवाब दिया, “बहू अभी सो रही है। अंदर जाने से डिस्टर्बेंस होगा और अभी कुछ और लोग भी आ रहे हैं। मेरे दोस्त वगैरह सब लोग एक साथ मिल लेंगे तो अच्छा रहेगा। समय बचेगा और बार-बार बच्ची और उसकी माँ को परेशानी नहीं होगी।”

ये शब्द उनके कानों में पिघले शीशे की तरह अंदर चले गए। ऐसा लगा कि वे बिल्कुल संज्ञाशून्य हो गए हैं। ऐसा नहीं लग रहा था कि यह बात उनके अपने बेटे ने कही है। शायद इस तरह का रूखापन तो किसी अपरिचित के पास जाकर देखने को भी नहीं मिलता।

यही है पितृसत्ता, जहाँ कोई भी पिता, कोई भी पुरुष या कोई भी माँ-बाप चाहे विश्व-विजय कर ले, लेकिन अपनी औलाद से कभी नहीं जीत सकते। वे हमेशा हारते हैं और उन्हें हारना ही पड़ता है। हर बार स्वयं जानबूझकर हारना भी पितृसत्ता की जिम्मेदारी है और मजबूरी भी।

जितनी असहनीय घुटन और पीड़ा उन्होंने इस समय महसूस की, वह कल्पना से परे है।

वे सोचने लगे... कि क्या इस सब के लिए भगवान से समय माँगा था? परिवार बचाने के लिए? किसका परिवार? और क्या पाने के लिए? किसके लिए?

तरह-तरह की बातें उनके दिमाग में आने लगीं। ऐसा लगा कि उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा है और वे चक्कर खाकर गिरने वाले हैं। दीवार का सहारा लेते हुए वे पास ही रखी बेंच पर बैठ गए।

ये सब क्या हो रहा है? इतना सब कुछ बदल चुका है और उन्हें इसका आभास तक नहीं है।

शायद ये नए युग के नए रिश्ते हैं, जो आज बन रहे हैं माँ-बाप और बच्चों के बीच, जिनमें न अपनेपन की गर्माहट है, न संवेदनाएँ हैं, न संस्कार और न ही समझ।

रिश्तों का शायद अब कोई महत्व नहीं है। ऐसा लगता है किसी कॉरपोरेट जगत की एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था है, जिसमें कोई वरिष्ठ है तो कोई कनिष्ठ। बस।

वरिष्ठ सिर्फ इसलिए वरिष्ठ है, क्योंकि उसने परिवार रूपी संस्था में पहले प्रवेश किया है और उसका सेवा-काल लंबा है। कनिष्ठ इसलिए कि वह इस परिवार में बाद में आया है। इसके अलावा और कोई अंतर नहीं। आज का कनिष्ठ कल वरिष्ठ हो जाएगा और वरिष्ठ इस दुनिया से रिटायर हो जाएगा। यह समय का चक्र है, चलता रहेगा। न जाने कब तक।

वे भावनाओं के इस ज्वार-भाटे में डूबते-उतराते रहे और न जाने कब शिथिल होकर अपने आपको लहरों के हवाले कर दिया।

कुछ और लोग मिलने आए और वे भी कमरे के दरवाजे पर पहुँचे, जिनका बेटे ने तपाक से स्वागत किया और अंदर ले गया। शायद उसके कंपनी के अधिकारी या दोस्त होंगे।

बेंच पर बैठे हुए उनकी खुशी और उमंग उस मुकाम पर पहुँच गई थी, जैसे समुद्र की ऊँची उठती लहरें किनारे से टकराकर बहुत ही धीमी गति से वापस हो जाती हैं।

लेकिन अब तो बहुत समय हो गया था। बेटे से मिलने वाले लोग बाहर निकल रहे थे। बेटा उन्हें छोड़ने निकला।

उनकी स्थिति मुंशी प्रेमचंद की ‘बूढ़ी काकी’ की तरह हो रही थी। थोड़े इंतजार के बाद बड़ी बेशर्मी से बेटे के पीछे वे कमरे के अंदर चले गए—बिना उसके बुलाने का इंतजार किए और बिना यह सोचे कि उनका बेटा क्या कहेगा।

कमरे के अंदर पहुँचते ही झूले में लेटी बच्ची को देखकर जैसे उनके पुराने घाव बिल्कुल भर गए। बड़ी उत्सुकता से मुस्कुराते हुए वे अपनी पोती की तरफ बढ़े, उसे पास से देखने, छूने और यह एहसास करने के लिए कि आखिर वह उनकी पोती ही नहीं, उनकी माँ भी है।

इससे पहले कि वे अपनी पोती को हाथ भी लगा पाते, बेटे ने टोकते हुए कहा, “डॉक्टर ने इसे छूने से मना किया है, इंफेक्शन हो सकता है।”

उन्होंने हाथ पीछे खींच लिए और उसको सिर्फ दूर से देखा।

तभी किसी ने पीछे से कहा, “भैया, इनके भी दो बच्चे हैं।”

उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। उनकी बेटी कह रही थी।

जैसे ये उनके अपने ही दिल के शब्द थे।

पहले के समय में तो उनके घर-परिवार के सारे लोग आते थे। कभी किसी को इंफेक्शन नहीं हुआ। उन्होंने बहुत प्यार से पोती को देखा और मन ही मन अपनी माँ को प्रणाम करते हुए पीछे जाकर बेटी के पास खड़े हो गए, जैसे कि उनकी माँ ने उन्हें बता दिया हो कि बच्चे कितने कीमती होते हैं—उतने ही कीमती, जितनी माँ-बाप की हैसियत होती है।

क्या परिवार में जिस समय साधन कम होते हैं, प्यार और ममता ज्यादा होती है?

जैसे-जैसे साधन और संसाधन बढ़ते हैं, ममता और प्यार के बंधन ढीले हो जाते हैं?

अपनापन सूखने लगता है?

अपने परिवार के लिए किया गया संघर्ष कहीं खो जाता है?

ऐसी-ऐसी परियोजनाएँ, जिन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति दीवानगी की हद तक लगा रहता है, अपना सब कुछ दाँव पर लगा देता है। परियोजनाएँ सफल होने के बाद ऐसा पारितोषिक मिलता है—इसकी तो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

एक थके-हारे, पराजित योद्धा की तरह वे कमरे से बाहर आ गए। पत्नी से उन्होंने कहा कि कुछ बहुत जरूरी काम आ गया है, इसलिए उन्हें आज ही कानपुर वापस जाना पड़ेगा।

“रिटायरमेंट के बाद अब कौन-सा जरूरी काम बचा है?” पत्नी ने कहा।

“तुम चाहो तो रुक जाओ, मुझे तो जाना ही पड़ेगा।”

यह कहकर वे वापस चल दिए।

पत्नी तो रुक गई। पता नहीं, वह कुछ समझ भी पाई या नहीं, किंतु उसमें इतनी सहनशीलता तो है कि बड़े से बड़ा अपमान और उपेक्षा आँसुओं में बहा देगी।

लेकिन वे तो पिता हैं, पुरुष हैं, जिनके आँसू नहीं निकल सकते हैं, जो किसी को एहसास भी नहीं होने दे सकते कि उन्हें कितना दुख हुआ है।

वे कल रात ही बेंगलुरु से वापस आए थे। रात में कब आँख लगी थी, उन्हें पता नहीं। आज सुबह उठे और चाय लेकर हमेशा की तरह बालकनी में बैठ गए।

और... तभी घंटी बजी।

दरवाजा खोला तो सामने काम करने वाली बाई खड़ी थी।

आश्चर्य से उन्होंने पूछा, “अरे, तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं आ गया हूँ?”

“भाभी ने सुबह फोन किया था कि भैया रात में पहुँच गए होंगे, जरा देख लेना,” उसने बताया।

“भैया, पोती की बहुत-बहुत बधाई। भाभी कह रही थीं कि सब कुछ बहुत अच्छा हो गया है। बहू भी ठीक है और बच्ची भी ठीक है,” उसने कहा।

वह मुस्कुराकर रह गए। कुछ बोल नहीं पाए।

“भैया, मेरे यहाँ भी बहू को बेटा हुआ है,” उसने बताया।

“अरे, बहुत अच्छा! बेटा और बहू तो ठीक हैं?” उन्होंने पूछा।

“हैं भैया, बिल्कुल ठीक हैं।”

“नाती की नाक, आँखें बिल्कुल सुनील के पापा की तरह हैं। ऐसा लगता है कि वो हम लोगों के बीच फिर आ गए हैं। उन्हें आना ही था। हम सब पहले से ही जानते थे।”

यह बताते हुए उसके चेहरे पर चमक आ गई थी।

“भैया, आज उसकी छठी है,” उसने आगे बताया।

“बहुत अच्छा, खूब धूमधाम से करो छठी,” उन्होंने औपचारिकतावश कह दिया।

“भैया, अब क्या धूमधाम से करें?” कहते हुए उसके आँसू आ गए।

“सुनील के पापा ने सभी बच्चों की छठी, मुंडन, सब कुछ बहुत धूमधाम से किए थे, लेकिन तब की बात और थी। अब हम लोगों के पास है ही क्या?”

“लेकिन भैया, हमारा लड़का और बहू बहुत अच्छे हैं। बिना हमसे पूछे-बताए कुछ नहीं करते। बहुत ध्यान रखते हैं हमारा। सुनील तो अपने पिताजी को याद करके बहुत दुखी हो रहा था। कह रहा था कि पिताजी होते तो बात अलग थी। कह रहा था कि किसी तरह से ऐसे ही कर लो।

“अब उसे कौन समझाए, भैया? वह तो बहुत छोटा था, जब उसके पिताजी गुजर गए थे। किसी तरह से आप सब लोगों के घरों में काम करके बच्चे पाल-पोसकर बड़े किए और जितनी हमें समझ थी, जितना हम कर सकते थे, किया।

“अब दोनों काम करते हैं। सुनील ई-रिक्शा चलाता है और छोटा वाला दवाई की दुकान में काम करता है। अब जो भी है, भैया, किसी तरीके से घर व्यवस्थित हो गया है। सब अपना-अपना काम कर रहे हैं।”

उसने संतोष व्यक्त करते हुए जैसे एक साँस में अपने जीवन का सारांश बता दिया।

“पारिवारिक प्रेम और पारिवारिक खुशी के लिए जो भी किया जाता है, वह बहुत अच्छा ही होता है। ये खुशी का मौका है। परिवार के साथ इसे उत्सव की तरह मनाओ। हर किसी के नसीब में यह सुख नहीं होता।”

यह कहते हुए वे अंदर गए और एक पैकेट लाकर बाई के हाथ में पकड़ा दिया। यह वही कपड़े थे, जो वे अपने होने वाले पोते/पोती के लिए बेंगलुरु ले गए थे, किंतु अचानक चले आने के कारण दे नहीं पाए थे।

“इसमें तुम्हारे नाती के लिए कपड़े हैं और ये ₹10,000 रख लो। यह मौका खुशी का है, इसे हाथ से मत जाने दो,” उन्होंने कहा।

बाई की आँखों में आँसू आ गए। उसने आँचल से आँसू पोंछे और कहा, “भैया, छोटे मुँह, बड़ी बात है, लेकिन अगर एक उपकार आप हमारे परिवार पर कर दें तो हम लोगों को बहुत खुशी होगी।”

“क्या?” उन्होंने पूछा।

“अगर आप आकर हमारे नाती को आशीर्वाद दे दें तो हम लोग धन्य हो जाएँगे।”

बाई ने हाथ जोड़ लिए।

“हाँ, हाँ, क्यों नहीं,” उन्होंने तपाक से जवाब दिया, “मैं जरूर आऊँगा।”

“भगवान आप जैसे लोगों को भी बनाता है, तभी तो ये दुनिया चल रही है।”

बाई ने जब यह कहा तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि वे इसका क्या जवाब दें, लेकिन उन्होंने कहा, “अब तुम जाओ, तैयारियाँ करो। यहाँ का काम छोड़ दो। कल देखा जाएगा।”

धोती के आँचल से अपनी भर आई आँखें पोंछती बाई धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रही थी।

इसके साथ ही उनका मन भी थोड़ा हल्का होने लगा था।

वे सोच रहे थे कि रिश्तों की डोर से बँधे और उसे मजबूत करने के लिए हम सब अपने-अपने माँ-बाप और बुजुर्गों को अपने पोते-पोतियों के रूप में खोजते रहते हैं, ताकि उनसे अटूट संबंध बना रहे। तभी तो हम अपने बच्चों के चेहरों में अपने प्रियजनों की शक्ल ढूँढ़ते हैं। उन चेहरों में अपने माँ-बाप और प्रियजनों की आँख, नाक, कान और पता नहीं क्या-क्या खोज निकालते हैं, ताकि हमारी पीढ़ियों के बीच सामंजस्य बना रह सके।

आज उन्हें यह समझ में गया था कि पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की गर्मजोशी के लिए “क्वालिफिकेशन” और “पोजीशन” बाधक नहीं होती।

परियोजना-प्रबंधन से ये चीजें पाई तो जा सकती हैं, लेकिन पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की प्रगाढ़ता भी मिले, यह जरूरी नहीं।


शिव प्रकाश मिश्रा

मूल कृति — 25 दिसम्बर 2018




"वह कंकड़" बाबा नीम करोडी से सम्बंधित एक सत्य घटना

वह कंकड़ एक ऐसी घटना, जिसका साक्षी आज भी जीवित है कभी-कभी मृत्यु और जीवन के बीच केवल एक साँस का फासला होता है। और कभी-कभी उस एक साँस को बचान...