शनिवार, 27 दिसंबर 2025

🌙 चन्द्रमा की विनम्रता

 


🌙 चन्द्रमा की विनम्रता 

एक समय की बात है — जब देवता और असुर, दोनों ही शक्तिशाली थे,
पर आपस में मतभेद भी थे। फिर भी एक काम ऐसा था
जो अकेले कोई नहीं कर सकता था —

समुद्र मंथन।

मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया,
और वासुकी नाग को रस्सी।

देव एक ओर, असुर दूसरी ओर —
और समुद्र मंथन शुरू हुआ।

समुद्र गर्जने लगा…
लहरें ऊपर उठीं…
और ऐसा लगा जैसे कोई
विशाल ब्रह्माण्डीय चक्की घूम रही हो!

मंथन से एक-एक कर
अद्भुत रत्न, दिव्य वस्तुएँ और शक्तियाँ बाहर आने लगीं।

तभी —
नीले प्रकाश की शीतल किरणों के साथ
एक सुन्दर, शांत, दिव्य रूप प्रकट हुआ —

चन्द्रमा।

उसकी चाँदी जैसी चमक
समुद्र की लहरों पर नाच रही थी।

देवता चकित होकर बोले —

“कितना उज्ज्वल! कितना सुंदर!”

असुर बोले —

“यह तो आकाश का रत्न है!”

सब उसकी प्रशंसा करने लगे —
पर चन्द्रमा शांत था… विनम्र… सरल।

उसने सिर झुकाकर कहा —

“यह सौंदर्य… यह प्रकाश… मेरा नहीं।
सब भगवान शिव की कृपा है।”

वह बोला —

“मैं जो चमकता हूँ…
वह मेरी शक्ति नहीं —
उनकी कृपा है।”

देव और असुर — दोनों ही स्तब्ध थे।

इतना सौंदर्य…
इतनी प्रशंसा…
फिर भी अभिमान नहीं।

तभी भगवान शिव प्रकट हुए।

उन्होंने प्रेमभरी मुस्कान के साथ कहा —

“चन्द्रमा, तुम्हारी विनम्रता
तुम्हारी सबसे बड़ी ज्योति है।”

“जो अपने गुणों का घमंड नहीं करता —
वही सच्चा महान होता है।”

शिवजी ने वरदान दिया —

“तुम मेरे मस्तक पर विराजोगे,
और संसार को शांति, प्रकाश और शीतलता दोगे।”

चन्द्रमा ने folded hands में कहा —

“प्रभु, यदि आपकी अनुमति हो…
तो मैं मनुष्यों को भी कुछ देना चाहता हूँ।”

“रातों को उजाला दूँगा,
यात्रियों को राह दिखाऊँगा,
और बच्चों के सपनों में
चाँदनी बरसाऊँगा।”

शिव मुस्कराए —

“यही तुम्हारी सच्ची भक्ति है —
दूसरों के लिए उपयोगी बनना।”

उस दिन से —

चन्द्रमा शिव के मस्तक का अलंकार बन गया,
और आकाश का प्रकाश भी।

रात जब शांत होती है,
हवा धीमे से बहती है,
और लोग ऊपर देखते हैं —

तो चाँद उन्हें याद दिलाता है —

“सौंदर्य से बड़ी शक्ति — विनम्रता की होती है।”
“जो ज्ञान और कृपा को अपना मानता है — वही वास्तव में उज्ज्वल होता है।”


🎯 शिक्षाप्रद सीख (बच्चों के लिए)

✔️ सुंदरता का घमंड नहीं करना चाहिए
✔️ सफलता का श्रेय गुरु / ईश्वर / सहयोग को देना चाहिए
✔️ विनम्रता व्यक्ति को और महान बनाती है
✔️ सच्ची चमक — वह है जो दूसरों के काम आए
✔️ ज्ञान और गुण — बाँटने से बढ़ते हैं

🌿 धैर्य के बीज

 


🌿 धैर्य के बीज 

हरे-भरे खेतों वाला एक गाँव था, जहाँ किसान रामू हर साल प्रेम से अपनी फ़सल उगाता था।
लेकिन इस बार उसके मन में अधीरता भरी थी —
वह चाहता था कि बीज जल्दी से जल्दी उग आएँ

वह सुबह-शाम खेत में जाता…
कभी ज़्यादा पानी डालता…
कभी मिट्टी कुरेदकर देखता कि अंकुर निकले या नहीं।

वह खुद से बुदबुदाता —
“इतना पानी, इतनी मेहनत… फिर भी बीज दिख क्यों नहीं रहा?”

उसे देख उसकी बेटी लक्ष्मी बोली —
“पिताजी, बीज पर गुस्सा मत करिए… उसे समय दीजिए।”

रामू ने थके स्वर में कहा —
“लक्ष्मी, मैं तो हर दिन कोशिश कर रहा हूँ… फिर भी कुछ नहीं हो रहा।”

लक्ष्मी घुटनों के बल मिट्टी पर बैठी और प्यार से बोली —

“पिताजी, बीज बाहर नहीं उगता…
सबसे पहले वह मिट्टी के अंदर जड़ें फैलाना सीखता है।
वह हमें दिखाई नहीं देता —
पर उसका विकास शुरू हो चुका होता है।”

रामू चुप हो गया।

लक्ष्मी आगे बोली —

“ज़मीन को हवा चाहिए…
मिट्टी को खाद चाहिए…
बीज को नमी चाहिए…
और किसान को — धैर्य।”

वह मुस्कराई —

“बार-बार मिट्टी खोदेंगे…
तो जड़ें टूट जाएँगी।
बीज को भरोसा चाहिए… संदेह नहीं।”

यह बात रामू के दिल में उतर गई।

उसने मिट्टी को ढीला किया,
खाद मिलाई,
पानी नियमित मात्रा में दिया।

इस बार वह रोज़ मिट्टी नहीं कुरेदता था —
बस आसमान देखता…
बादलों की चाल समझता…
और इंतज़ार करता।

कुछ दिन बीते…
फिर कुछ हफ़्ते…

एक सुबह सूरज की किरणें पड़ीं —
और मिट्टी से नन्हा-सा हरा अंकुर झाँक उठा।

रामू की आँखें चमक उठीं।

वह बोला —
“इतना छोटा… पर इतना मजबूत!”

लक्ष्मी बोली —

“पिताजी, यही प्रकृति का नियम है —
जितनी गहरी जड़… उतना ऊँचा वृक्ष।

समय बीतता गया…

अंकुर पौधा बना…
पौधा वृक्ष…
और कुछ वर्षों बाद
वही बीज एक विशाल छायादार पेड़ बन गया।

अब उस पेड़ के नीचे
पक्षी घोंसले बनाते…
बच्चे खेलते…
यात्री विश्राम करते।

लक्ष्मी ने मुस्कराकर कहा —

“देखिए पिताजी —
बीज ने हमें क्या सिखाया?”

रामू ने शांत स्वर में कहा —

“कि मेहनत ज़रूरी है…
पर परिणाम का समय प्रकृति तय करती है।
धैर्य — ही सच्ची ताकत है।”

उसने वृक्ष को प्रणाम किया।


अंतिम संदेश

👉 हर सपने का भी एक मौसम होता है।
👉 हर प्रयास को जड़ें फैलाने का समय चाहिए।
👉 जो धैर्य रखता है — वही सच्ची सफलता पाता है।

धैर्य का बीज जब विश्वास की मिट्टी में बोया जाए…
तो वह जीवन का सबसे बड़ा वृक्ष बन जाता है।

सागर का उपहार / Ocean’s Gift

 


सागर का उपहार / Ocean’s Gift

समुद्र तट के किनारे बसे एक छोटे-से मछुआरा गाँव में हर दिन की शुरुआत सागर की गूँज से होती थी। सुबह सूर्य जैसे ही उगता, दर्जनों नावें नीले पानी में उतर जातीं, और शाम को जब आसमान लाल हो जाता, वही नावें मछलियों और उम्मीदों से भरी लौट आतीं।

उसी गाँव में रहती थी माया — आँखों में जिज्ञासा और मन में ज्वार जैसी उमंग। उसके पिता, हरिनारायण, गाँव के सबसे अनुभवी मछुआरे थे। वे कहते थे —
“सागर हमारा मित्र है, अगर उसका आदर करो तो वह हमेशा लौटने का रास्ता दिखा देता है।”

हर दिन माया किनारे खड़ी होकर अपने पिता की नाव को क्षितिज पर गायब होते देखती, और शाम ढलते ही सबसे पहले उनकी नाव पहचान लेती।

लेकिन उस दिन... सब बदल गया।

दोपहर से ही काले बादल छा गए थे, हवा की गति बढ़ी, और सागर में अजीब-सी बेचैनी थी। लोग जल्दी-जल्दी अपनी नावें लौटाने लगे, पर हरिनारायण ने कहा था —
“थोड़ी देर और... बस ये आख़िरी जाल डालकर लौटते हैं।”

शाम ढली, लहरें गूँज उठीं, पर उनकी नाव वापस न आई।


गाँव की चिंता

रात बढ़ती गई। माया बार-बार किनारे दौड़कर जाती। हर बार झाग से ढकी लहरें उस पर पड़तीं, मगर कोई नाव नहीं दिखती। गाँव के लोग लालटेन लेकर जुटे हुए थे।

“अब सागर बहुत गुस्से में है,” बूढ़े रामैया बोले,
“कोई नाव बाहर नहीं जानी चाहिए, भले ही सुबह तक इंतज़ार करना पड़े।”

दूसरी ओर, कुछ स्त्रियाँ भी बोलीं,
“बेटी, तू बाहर मत जा। ये रात खतरनाक है, तू क्या कर पाएगी अकेली?”

माया की आँखों से आँसू छलक पड़े, पर उसकी आवाज़ दृढ़ थी —
“पिता अकेले नहीं हैं... सागर ने उन्हें हमेशा लौटाया है... और आज मैं भी जाऊँगी।”

गाँव वाले चुप हो गए। रामैया बोले, “बेटी, ये हिम्मत है या पागलपन?”
माया ने उत्तर दिया, “जब किसी अपने की जान दाँव पर हो, तो डरने का हक़ नहीं होता।”


तूफ़ानी रात

माया ने अपनी नाव बाँधी, हाथ में टोर्च उठाई और किनारे पर उसी पुराने दीपक को जलाकर रख दिया — ताकि लौटते समय वो रोशनी रास्ता दिखा सके।
उसने आसमान की ओर देखा — गहरे बादलों में बिजली चमक रही थी, और सागर का शोर उसके दिल की धड़कन से मिल रहा था।

“पिता सागर से कभी नहीं डरे, तो मैं क्यों डरूँ?” उसने खुद से कहा और नाव पानी में उतार दी।

पहली ही लहर ने नाव को झकझोर दिया। हवा में पानी की बूँदें उड़ रहीं थीं, पर माया ने चप्पू थामे रखा।
“मैं आ रही हूँ, पिताजी!” वह चिल्लाई, और नाव अंधेरे में आगे बढ़ गई।

लहरें उसके विरुद्ध उठतीं, तूफ़ान गरजता, पर तभी हवा में जैसे किसी ने whisper किया —
“The ocean rewards the brave... सागर साहसी को पुरस्कृत करता है।”

उसके भीतर डर की जगह ताक़त भर गई।


मिलन और सागर का उपहार

थोड़ी ही देर में उसे टूटी हुई नाव का टुकड़ा दिखाई दिया। उसने टॉर्च से रोशनी डाली —
“पिताजी!”

उनकी आवाज़ लहरों में डूबी, “माया!... बेटा...!”

माया ने नाव को नज़दीक लाया, रस्सी फेंकी, और पूरी ताकत से उन्हें खींच लिया।
दोनों भीगे, थके, मगर ज़िंदा थे।

“मैं जानती थी, आप लौट आएँगे।”
हरिनारायण ने बेटी को सीने से लगाया, “और तू... तू मेरी सबसे बड़ी ताक़त निकली।”

सुबह तक तूफ़ान थम गया। पहली किरण जैसे ही सागर पर पड़ी, उस दीपक की लौ अब भी किनारे जल रही थी —
रास्ता दिखाने वाली, उम्मीद की तरह।

जैसे ही वे तट पर पहुँचे, एक लहर किनारे आई और धीरे से फेन में कुछ छोड़ गई — एक नीला, चमकता हुआ शंख

माया ने उसे उठाया। उसमें हल्की रोशनी थी, जैसे सागर का आशीर्वाद।
वह मुस्कुराई और बोली —
“The ocean rewards the brave... सागर साहसी को पुरस्कृत करता है।”


गौरैया का रहस्य

 


गौरैया का रहस्य

हरे-भरे खेतों से घिरे एक छोटे से गाँव में एक पुराना आम का पेड़ था। उसी पेड़ पर एक नन्ही, चंचल गौरैया रहती थी। उसका रंग भूरा था, पर उसकी आँखें सुबह की ओस की तरह चमकती थीं।

हर सुबह जब स्कूल की घंटी बजती, बच्चे पेड़ के नीचे थोड़ा दाना डालते और मिट्टी के बर्तन में पानी भरते थे। थोड़ी ही देर में कई पक्षी वहाँ आने लगते — लाल चोंच वाले तोते, चमकीली मैना, मोटे कबूतर और नन्ही सी गौरैया।

लेकिन गौरैया बाकी पक्षियों की तरह पहले दाने नहीं चुगती थी। वह शांति से एक ओर खड़ी रहती, जब सब खा लेते, तो वह कुछ दाने अपनी छोटी चोंच में भरकर उड़ जाती — हमेशा उसी दिशा में, पुराने कुएँ के पीछे वाले झाड़ियों की ओर।

एक दिन बच्चों ने सोचा, "ये गौरैया रोज़ ऐसा क्यों करती है?"
किसी ने कहा, "शायद अपने लिए दाने छिपाती होगी।"
दूसरे ने कहा, "नहीं, कुछ तो रहस्य है इसमें!"

अगले दिन सबने चुपचाप उसका पीछा किया। जब वह झाड़ियों के पीछे पहुँची, बच्चों ने झाँककर देखा — और उनकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं।

गौरैया कुछ छिपा नहीं रही थी! वह तो घायल पक्षियों को खाना खिला रही थी — एक टूटी पंख वाली कबूतर, कुछ छोटे-छोटे बुलबुल के बच्चे जो उड़ नहीं सकते थे, और एक डरी–सहमी गिलहरी, सब वहीं बैठे थे। गौरैया प्यार से सबको दाने खिला रही थी।

बच्चों का मन भर आया। इतनी छोटी चिड़िया, पर दिल कितना बड़ा!

अगले दिन से बच्चों ने भी मदद शुरू की। वे झाड़ियों के पास और दाने रखते, कुछ फल लाते और घायलों के लिए छोटी लकड़ी की झोपड़ी बना दी। धीरे-धीरे वह जगह पक्षियों और बच्चों की प्यारी जगह बन गई — हर सुबह वहाँ चहचहाहट और खुशियों की गूंज रहने लगी।

गाँव वाले भी यह बदलाव देखकर हैरान हुए। जब बच्चों ने उन्हें गौरैया का रहस्य बताया, तो सबने तय किया कि अब वे भी हर दिन पक्षियों और जानवरों के लिए थोड़ा भोजन और पानी रखेंगे।

धीरे-धीरे गाँव की हवा में करुणा और प्रेम घुल गया। सबके चेहरों पर मुस्कान थी — और यह सब एक छोटी-सी गौरैया की निःस्वार्थ दया से शुरू हुआ था।

उस रात, जब बच्चे सितारे देख रहे थे, उनकी शिक्षिका ने कहा —
“बच्चो, दया हमेशा शोर नहीं करती। कभी–कभी वह चुपचाप काम करती है — गौरैया के पंखों की तरह — लेकिन उसकी गूँज हमेशा सुनाई देती रहती है।”

नीति: दयालुता अक्सर मौन में काम करती है, पर उसकी गूंज हमेशा बनी रहती है।

ज्ञान का दीपक








 ज्ञान का दीपक 

पहाड़ों से घिरी एक शांत घाटी में कावी नाम का एक बालक रहता था। न घर, न परिवार — बस एक बेचैन मन और खोजती हुई निगाहें। वह गाँव-गाँव घूमकर छोटे-मोटे काम करता और पेट भर लेता, पर उसकी असली भूख रोटी की नहीं थी — वह जीवन का अर्थ जानना चाहता था।

वह अकसर सोचता —
“लोग उजाले का पीछा तो करते हैं, पर अपने भीतर के अंधेरे से क्यों डरते हैं?”

एक दिन थककर वह एक पुराने, जर्जर मंदिर के आँगन में बैठ गया। दीवारों पर गहरी दरारें थीं, बेलें लटक रही थीं, और धूल ने सब कुछ फीका कर दिया था। बैठने की जगह साफ़ करते समय उसका हाथ किसी धातु से टकराया। मिट्टी हटाई तो वहाँ एक पुराना पीतल का दीपक था — धूल, मकड़ी के जाल और समय से ढका हुआ।

कावी ने अपने फटे दुपट्टे से उसे धीरे-धीरे साफ़ किया। जैसे ही उसकी हथेलियाँ दीपक पर फिरीं, उसमें एक सुनहरी लौ प्रज्ज्वलित हो उठी। मंदिर का अंधकार सहसा पीछे हट गया। वह चकित था — इस लौ में एक अनकही शांति और गहरी शक्ति थी।

उस रात वह दीपक साथ लेकर चला। राह उजली थी, और उसे लगा मानो उसे अपना सच्चा साथी मिल गया हो। वह बोला —
“अब मैं कभी अंधेरे में नहीं रहूँगा।”

परन्तु घने जंगल में प्रवेश करते ही कोहरा छा गया। हवा तेज़ हुई और दीपक की लौ डगमगाने लगी। प्रकाश इतना मंद हो गया कि पाँव तले का रास्ता भी मुश्किल से दिख रहा था। क्रोध और निराशा में कावी बोला —
“तेरी रोशनी का क्या अर्थ, यदि अंधेरे में तू स्वयं ही बुझने लगे?”

वह पास बहती एक पतली जलधारा के किनारे बैठ गया। पानी में दीपक की काँपती परछाईं उसे अपने ही भीतर के भ्रम जैसी लगी। तभी उसके मन में एक विचार कौंधा —
“शायद दोष रोशनी का नहीं… मेरी समझ का है।”

सुबह होते ही वह फिर उसी मंदिर लौटा। वहाँ एक वृद्ध पुजारी शांत भाव से बैठे थे। उन्होंने मुस्कराकर कहा —
“लगता है, तुम्हें बुद्धि का दीप मिल गया है।”

कावी चकित होकर बोला —
“पर यह तो रात में मेरा साथ भी नहीं दे पाया।”

पुजारी ने मृदु स्वर में कहा —
“पुत्र, केवल प्रकाश पर्याप्त नहीं होता।
यदि मन अंधा हो, तो दीप भी मार्ग नहीं दिखाता।
प्रकाश केवल दिखाता है —
पर बुद्धि बताती है कि चलना किस ओर है।”

उन बातों ने कावी को भीतर तक झकझोर दिया।

अब वह फिर यात्राओं पर निकला — पर इस बार जिज्ञासा के साथ संयम, और खोज के साथ समझ
वह किसानों से बीज के धैर्य को समझता, बढ़इयों से समय और सटीकता सीखता, यात्रियों से दूर देशों के अनुभव सुनता।
जैसे-जैसे वह सीखता और बाँटता गया, दीपक की लौ धीरे-धीरे स्थिर और उज्ज्वल होती गई।

सालों बाद, कावी ने उसी गाँव में मंदिर के पास एक छोटा विद्यालय बनाया। हर शाम वह पुराना दीपक जलाता और बच्चों से कहता —
“इस दीप की लौ से अपनी बाती जलाओ —
ज्ञान बाँटो, ताकि यह प्रकाश जीवित रहे।”

धीरे-धीरे मंदिर में सैकड़ों दीप जलने लगे।
पर आश्चर्य — पुराना दीपक बुझा नहीं…
उसकी लौ और तेज़, और प्रखर हो गई।

कावी मुस्कुराया और बोला —
“प्रकाश बाँटने से घटता नहीं —
और बुद्धि भी वैसी ही है…
जितनी बाँटो, उतनी बढ़ती जाती है।”

लोगों ने उस स्थान को नाम दिया —
“दीप-ज्ञान मंदिर”
वह मंदिर जहाँ दीप केवल उजाला नहीं देता था — दिशा भी देता था

और वहाँ आने वाला हर यात्री यह सीख लेकर लौटता —
“प्रकाश रास्ता दिखाता है,
पर बुद्धि सिखाती है कि चलना कैसे है।”


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